साइबर फ्रॉड पर सरकार का बड़ा कदम, संसद में पेश हो सकता है नया बिल
केंद्र सरकार डिजिटल अरेस्ट और AI जनरेटेड डीपफेक को अलग अपराध मानकर संसद में नया बिल पेश कर सकती है, जिसमें सख्त सजा का प्रावधान होगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मौजूदा कानून इन अपराधों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.

सौजन्य से:- Money9live
डिजिटल अरेस्ट और साइबर फ्रॉड पर लगेगी लगाम, केंद्र सरकार संसद में पेश कर सकती है नया बिल
केंद्र सरकार डिजिटल अरेस्ट और AI Generated Deepfake को अलग अपराध की श्रेणी में शामिल करने के लिए संसद में नया बिल पेश कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान सरकार ने संकेत दिए कि इन साइबर अपराधों के लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान और सख्त सजा तय की जाएगी. प्रस्तावित कानून का उद्देश्य बढ़ते साइबर फ्रॉड, फर्जी वीडियो, पहचान की चोरी और ऑनलाइन ठगी पर प्रभावी रोक लगाना है.
Digital Arrest: देश में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट और AI जेनरेटेड डीपफेक मामलों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है. सरकार संसद के मौजूदा सत्र में एक नया बिल पेश कर सकती है, जिसमें डिजिटल अरेस्ट और AI जेनरेटेड डीपफेक को अलग और स्वतंत्र अपराध के रूप में परिभाषित किया जाएगा. इसके साथ ही इन अपराधों के लिए सख्त सजा और स्पष्ट कानूनी प्रावधान भी तय किए जाएंगे. यह जानकारी मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सामने आई. अदालत ने कहा कि मौजूदा आपराधिक कानूनों में डिजिटल अरेस्ट और डीपफेक जैसे अपराधों की स्पष्ट परिभाषा नहीं है. ऐसे में इनसे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए अलग कानून बनाने की जरूरत है.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों पर स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी. सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि वह पहले भी डिजिटल अरेस्ट गिरोहों के खिलाफ सख्त रुख अपना चुकी है और ऐसे मामलों में आरोपियों को आसानी से जमानत नहीं दी गई है. हालांकि, अदालत ने सवाल उठाया कि क्या मौजूदा दंड कानूनों में डिजिटल अरेस्ट को एक अलग अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है. अदालत ने कहा कि सरकार को इसे औपचारिक रूप से कानून में शामिल करने पर विचार करना चाहिए.
सरकार ने क्या कहा
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता से काम कर रही है. उन्होंने कहा कि संसद के मौजूदा सत्र में इस संबंध में बिल पेश किए जाने की संभावना है. उन्होंने बताया कि प्रस्तावित कानून का उद्देश्य डिजिटल अरेस्ट और AI जेनरेटेड डीपफेक को अलग अपराध की श्रेणी में रखना है, ताकि इनके लिए स्पष्ट कानूनी प्रावधान और सख्त दंड तय किए जा सकें.
क्यों जरूरी है नया कानून
अदालत ने कहा कि डिजिटल अरेस्ट केवल ऑनलाइन धोखाधड़ी का मामला नहीं है. इसमें जबरन वसूली, लूट और संगठित अपराध जैसे कई तत्व शामिल होते हैं. सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पूछा कि क्या ऐसे मामलों में आरोपियों की संपत्ति फ्रीज करने जैसे कड़े प्रावधान भी नए कानून का हिस्सा होने चाहिए. अदालत का मानना है कि मौजूदा कानून इन नए प्रकार के साइबर अपराधों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.
डीपफेक भी बना बड़ी चुनौती
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने AI जेनरेटेड डीपफेक का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि आज डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल लोगों को गुमराह करने, किसी की पहचान का गलत इस्तेमाल करने और वित्तीय धोखाधड़ी के लिए किया जा रहा है. अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के आर्टिकल 142 के तहत उसे नया अपराध बनाने या उसकी कानूनी परिभाषा तय करने का अधिकार नहीं है. यह जिम्मेदारी केवल सरकार और संसद की है.
डिजिटल अरेस्ट क्या है
डिजिटल अरेस्ट एक ऐसा साइबर फ्रॉड है, जिसमें ठग खुद को पुलिस, CBI, ED, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट, कस्टम्स या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को वीडियो कॉल या फोन पर डराते हैं. पीड़ित को बताया जाता है कि उसका नाम किसी अपराध या मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सामने आया है और उसे तुरंत “डिजिटल हिरासत” में रखा गया है. इसके बाद गिरफ्तारी से बचाने या जांच बंद कराने के नाम पर उससे लाखों रुपये ठग लिए जाते हैं. देश में सबसे ज्यादा बुजुर्ग लोग इस तरह की धोखाधड़ी का शिकार हुए हैं.
सुप्रीम कोर्ट पहले ही दे चुका है CBI को जिम्मेदारी
देशभर में लगातार बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट के मामलों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्वत: संज्ञान ले चुका है. अदालत ने इन मामलों की जांच की जिम्मेदारी CBI को सौंपी थी. सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि सरकार द्वारा गठित उच्चस्तरीय अंतर-विभागीय समिति की समन्वित कार्रवाई के कारण डिजिटल अरेस्ट के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है. उन्होंने कहा कि समिति एक व्यापक रिपोर्ट तैयार कर रही है, जिसमें मौजूदा व्यवस्था की कमियों की पहचान की जाएगी और उन्हें दूर करने के उपाय सुझाए जाएंगे.
WhatsApp भी कर रहा सरकार के साथ काम
सुनवाई के दौरान WhatsApp की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत को बताया कि कंपनी सरकार के साथ मिलकर प्लेटफॉर्म के दुरुपयोग को रोकने के लिए लगातार काम कर रही है. उन्होंने कहा कि WhatsApp अपराधियों द्वारा प्लेटफॉर्म के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए सरकार के साथ समन्वय बनाए हुए है और आवश्यक तकनीकी व कानूनी सहयोग भी दे रहा है.
यदि सरकार संसद में यह बिल पेश करती है और उसे मंजूरी मिल जाती है, तो पहली बार भारत में डिजिटल अरेस्ट और AI जेनरेटेड डीपफेक को अलग अपराध का दर्जा मिलेगा. इससे साइबर अपराधों पर कार्रवाई और दोषियों को सजा दिलाने की प्रक्रिया पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट और प्रभावी हो सकेगी.
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