मंदिरों में नकली सोना-चांदी चढ़ाने पर हो सकती है जेल, कानूनी पहलू जानें
मंदिरों में नकली सोना-चांदी चढ़ाने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है। अगर कोई शख्स जानबूझकर धोखा देने के मकसद से सोना-चांदी में मिलावट करके उसे असली बताकर मंदिरों में अर्पित करता है, तो इसे मंदिर ट्रस्ट के साथ धोखाधड़ी और आपराधिक षडयंत्र का मामला माना जाता है।

सौजन्य से:- ABP News
क्या मंदिर में नकली सोना चांदी चढ़ाने पर हो सकती है जेल, क्या है कानून?
माता वैष्णो देवी मंदिर के चढ़ावे में बड़ी मात्रा में नकली चांदी मिलने के बाद चलिए जान लेते हैं कि मंदिरों में सोना-चांदी चढ़ाना कितना बड़ा जुर्म है. इस मामले में धोखा करने वाले को कितनी सजा हो सकती है.
कुछ वक्त पहले वैष्णों देवी मंदिर में श्रद्धालुओं ने करीब 20 टन चांदी चढ़ाई थी. इस चढ़ावे की जब जांच कराई गई तो पता चला कि उसमें महज 5 से 6 फीसदी ही असली चांदी थी बाकी मटीरियल पूरी तरह से नकली निकला. इसके बाद तो मामले की जांच की जा रही है और भी दोषी पाया जाएगा, कानून के तहत उसे सजा मिलेगी. लेकिन इस खुलासे के बाद यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या मंदिरों में नकली सोना-चांदी चढ़ाने पर कानूनी रूप से कार्रवाई हो सकती है कि नहीं. भारत के कानून में ऐसे मामलों को लेकर क्या व्यवस्था की गई है, चलिए जानें.
आस्था के साथ पर कानूनी कार्रवाई
धार्मिक स्थलों या मंदिरों में नकली सोना-चांदी चढ़ाना सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन माना जाता है. अगर कोई शख्स जानबूझकर धोखा देने के मकसद से सोना-चांदी में मिलावट करके उसे असली बताकर मंदिरों में अर्पित करता है तो इसे मंदिर ट्रस्ट के साथ धोखाधड़ी और आपराधिक षडयंत्र का मामला माना जाता है. ऐसे केस में पुलिस तुरंत मामला दर्ज करके आरोपी के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर सकती है, जिसमें जेल की सख्त सजा और भारी जुर्माना दोनों शामिल हैं.
BNS के तहत क्या हैं सजा के प्रावधान?
ऐसे केस में भारतीय न्याय संहिता के तहत किसी के साथ छल करना या नकली सामान को असली बताकर बेचना धारा 318 के तहत अपराध माना जाता है. इसके अलावा अगर कोई शख्स मंदिर प्रशासन को जानबूझकर धोखा देकर अपनी संपत्ति या चढ़ावा दर्ज करवाता है, तो गबन और धोखाधड़ी के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. अगर इस पूरे खेल में कोई संगठित गिरोह शामिल होता है, तब भी उसका कानूनी शिकंजे से बचना मुश्किल होता है.
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अनजाने में हुई गलती पर क्या कहते हैं नियम?
कई बार श्रद्धालु किसी स्थानीय सुनार की ठगी का शिकार होकर अनजाने में मिलावटी या कम शुद्धता वाला सोना-चांदी खरीद लेते हैं और मंदिरों में चढ़ा देते हैं. ऐसे मामलों में कानून नीयत को सबसे पहला आधार मानता है. जांच एजेंसियां यह भी देखती हैं कि श्रद्धालु का मकसद धोखा देना था या फिर वह खुद किसी सुनार की ठगी का शिकार हुआ है. अगर श्रद्धालु की नीयत साफ पाई जाती है तो कानूनी कार्रवाई का रुख मिलावटी सोना-चांदी बेचने वाले दुकानदार की ओर मुड़ जाता है.
मंदिरों में चढ़ावे की पारदर्शिता और जांच की क्या होती है व्यवस्था?
देश के प्रमुख और बड़े धार्मिक स्थलों जैसे महाकाल, तिरुपति, राम मंदिर या वैष्णो देवी में चढ़ावे में मिलने वाले आभूषणों के मूल्यांकन के लिए विशेष समितियां होती हैं. इन कमेटियों में सरकारी अधिकारियों के साथ-साथ प्रामाणिक सुनार भी शामिल किए जाते हैं. इन मंदिरों में परिसर में लगने वाले हर दान पर सीसीटीवी की पैनी नजर रखी जाती है. इसके अलावा धातु की शुद्धता जांचने के बाद ही रसीद जारी की जाती है, ताकि किसी भी तरह की हेर-फेर या फिर गबन को रोका जा सके.
नकली सोने में क्या-क्या मिलाते हैं जालसाज?
सोने के नाम पर होने वाले फर्जीवाड़े में सबसे ज्यादा इस्तेमाल पीतल, तांबा और जिंक का किया जाता है. आमतौर पर पीतल आधारित नकली सोने में 70 से 80 प्रतिशत तक तांबा और 20 से 30 प्रतिशत जस्ता मिलाया जाता है. इसके अलावा चमक बनी रहे, इसके लिए एल्युमीनिम का भी इस्तेमाल होता है. वहीं हाई-टेक धोखाखड़ी में सोने के वजन की हूबहू नकल करने के लिए अंदर टंगस्टन भरकर ऊपर से सोने की परत चढ़ा दी जाती है.
नकली चांदी और जर्मन सिल्वर में कैसे होती है मिलावट?
बाजार और धार्मिक स्थलों में चांदी के नाम पर जो सबसे बड़ा धोखा होता है, वह है जर्मन सिल्वर. इसमें असली चांदी एक प्रतिशत भी नहीं होत है, बल्कि यह 60 प्रतिशत तांबा, 20 प्रतिशत जस्ता और 20 प्रतिशत निकल का मिश्रण होती है. इसके अलावा कैडमियम, लोहा और रांगा जैसी सस्ती धातुओं का इस्तेमाल करके धातु में भारीपन और चमक लाई जाती है. ऊपरी तौर पर सिल्वर प्लेटिंग करके आम लोगों को चकमा दिया जाता है.
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