सुप्रीम कोर्ट रोस्टर पर सवाल: नोएडा डीएम मेधा रूपम के मामले की बेंचिंग में अनियमितता
सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा जिलाधीश मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाओं पर जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ में सुनवाई की, जबकि नवीनतम रोस्टर में निवारक हिरासत के मामलों की सूची उन बेंचों में नहीं है। हाईकोर्ट के NSA हिरासत रद्द करने के आदेश को रोकते हुए इस बेंच की सूचीबद्धता को लेकर अदालत के रोस्टर पर चर्चा तेज हो गई है, साथ ही अन्य संबंधित मामलों की प्रगति भी दर्शाई गई।

सौजन्य से:- Hindustan
मेधा रूपम का मामला इस बेंच तक कैसे पहुंचा? ऑडियो भी बंद, सुप्रीम कोर्ट रोस्टर पर उठे सवाल
नोएडा DM मेधा रूपम और यूपी सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। हाईकोर्ट के NSA हिरासत संबंधी आदेश पर रोक लगी, लेकिन याचिका की लिस्टिंग और बेंच को लेकर सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर से जुड़े कई सवाल उठे।
नोएडा (गौतमबुद्ध नगर) की जिलाधिकारी मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल याचिकाओं की सुप्रीम कोर्ट में लिस्टिंग को लेकर सवाल उठे हैं। इन याचिकाओं में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें नोएडा में श्रमिकों के प्रदर्शन से जुड़े मामले में एक छात्र की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत रद्द कर दी गई थी।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एनके सिंह की पीठ ने इन याचिकाओं पर सुनवाई की। हालांकि, 13 जुलाई 2026 से प्रभावी सुप्रीम कोर्ट के रोस्टर के मुताबिक इस पीठ के पास 'निवारक हिरासत' से जुड़े मामलों का रोस्टर नहीं है। मामला इसलिए भी चर्चा में आया है क्योंकि इसी नोएडा श्रमिक प्रदर्शन से जुड़े दूसरे मामले पहले से जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने लंबित हैं।
हाईकोर्ट के आदेश पर लगी रोक
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें NSA के तहत की गई हिरासत को रद्द किया गया था और डीएम के खिलाफ कड़ी टिप्पणियां की गई थीं।
हाईकोर्ट ने छात्र को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया था। यह रकम डीएम मेधा रूपम के निजी वेतन से वसूल की जानी थी। सुप्रीम कोर्ट की ओर से हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाए जाने के बाद यह निर्देश भी फिलहाल प्रभावी नहीं रहेगा। बता दें कि नोएडा डीएम आईएएस अधिकारी मेधा रूपम के पिता ज्ञानेश कुमार हैं। ज्ञानेश कुमार भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं।
रोस्टर में किन बेंचों को निवारक हिरासत के मामले मिले हैं?
सुप्रीम कोर्ट की 13 जुलाई की लेटेस्ट रोस्टर शीट के मुताबिक हैबियस कॉर्पस और निवारक हिरासत से जुड़े मामले वरिष्ठता के क्रम में शुरुआती चार पीठों को सौंपे गए हैं।
इन पीठों की अध्यक्षता ये न्यायाधीश कर रहे हैं-
- चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत
- जस्टिस विक्रम नाथ
- जस्टिस बीवी नागरत्ना
- जस्टिस एमएम सुंदरेश
इसके बावजूद नोएडा डीएम और उत्तर प्रदेश सरकार से जुड़ी याचिकाएं जस्टिस शर्मा की पीठ के सामने सूचीबद्ध हुईं। रिपोर्ट के मुताबिक नोएडा श्रमिक प्रदर्शन से जुड़े कई मामले पहले से जस्टिस बीवी नागरत्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने हैं।
आदित्य आनंद और रूपेश रॉय से जुड़ा मामला
केशव आनंद ने हैबियस कॉर्पस याचिका दाखिल कर अपने भाई आदित्य आनंद और रूपेश रॉय को अदालत के सामने पेश करने की मांग की थी। उन्होंने प्रदर्शन में कथित भूमिका को लेकर दोनों की गिरफ्तारी को भी चुनौती दी थी।
8 मई को जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने नोटिस जारी किया था। 15 मई को उत्तर प्रदेश पुलिस को दोनों आरोपियों को अदालत के सामने पेश करने का निर्देश दिया गया था। बाद में दोनों को अदालत में पेश किया गया और 19 मई के आदेश के जरिए उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ा दी गई। यह मामला अभी लंबित है।
पत्रकार सत्याम वर्मा से जुड़ी याचिका
पत्रकार सत्याम वर्मा की पत्नी ने भी अपने पति की NSA के तहत निवारक हिरासत को चुनौती देते हुए हैबियस कॉर्पस के तौर पर याचिका दाखिल की थी। आरोप था कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों को हिंसा के लिए उकसाया। इस मामले में 19 मई को नोटिस जारी हुआ था। हालांकि 7 सितंबर को याचिकाकर्ता ने याचिका वापस ले ली और हाईकोर्ट का रुख करने की स्वतंत्रता मांगी।
लॉ स्टूडेंट योगेश मीणा का मामला
नोएडा श्रमिक प्रदर्शन के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए लॉ स्टूडेंट योगेश मीणा ने भी अपनी गिरफ्तारी और उत्तर प्रदेश पुलिस की कथित प्रताड़ना को चुनौती दी थी। 7 अगस्त को यह मामला जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन के सामने आया था। रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला भी अभी लंबित है।
फिर मेधा रूपम की याचिका जस्टिस शर्मा की बेंच में कैसे पहुंची?
इसी बात को लेकर सवाल उठ रहा है। नोएडा डीएम और उत्तर प्रदेश सरकार की याचिकाओं को हैबियस कॉर्पस और निवारक हिरासत से जुड़े मामलों की कैटेगरी 2202 में रखा गया है। लेकिन यह कैटेगरी जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की रोस्टर सूची में शामिल नहीं है।
आमतौर पर एक ही मामले से जुड़े मामलों को एक ही पीठ के सामने सूचीबद्ध किया जाता है। दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों को ही ले लीजिए। इसमें एक ही मामले के सह-आरोपियों की जमानत याचिकाएं भी उसी पीठ के सामने आई थीं जिसने पहले मामले में फैसला दिया था।
क्या यह मामला विशेष रूप से जस्टिस शर्मा की बेंच को सौंपा गया?
रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस शर्मा की रोस्टर सूची में “any other matters specially assigned” यानी विशेष रूप से सौंपे गए अन्य मामलों की श्रेणी भी है। ऐसे में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नोएडा डीएम से जुड़ा मामला उनकी पीठ को विशेष रूप से सौंपा गया हो। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा आवंटन चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया अपनी प्रशासनिक शक्तियों के तहत कर सकते हैं क्योंकि वे मास्टर ऑफ रोस्टर होते हैं।
लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जब निवारक हिरासत से जुड़े मामले चार अन्य पीठों को विशेष रूप से सौंपे गए हैं और नोएडा श्रमिक प्रदर्शन से जुड़े मामले पहले से जस्टिस नागरत्ना की पीठ के सामने लंबित हैं, तो इस मामले को विशेष रूप से जस्टिस शर्मा की पीठ को क्यों सौंपा गया।
कोर्ट की कार्यवाही के दौरान भी उठा सवाल
सुनवाई के दौरान एक और घटनाक्रम हुआ। पीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए चल रही कार्यवाही का ऑडियो म्यूट करने का निर्देश दिया। रिपोर्ट के मुताबिक इससे वे कोर्ट रिपोर्टर कार्यवाही सुनने में असमर्थ हो गए जो अदालत में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं थे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चूंकि मामला निजी गोपनीयता से जुड़ा नहीं था और एक सार्वजनिक पद से जुड़े फैसलों से संबंधित था, इसलिए खुले कोर्ट की सुनवाई में मीडिया की पहुंच सीमित किए जाने का कारण स्पष्ट नहीं हुआ।
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