दिल्ली हाई कोर्ट ने जमीन अधिग्रहण मुआवजे में सरकारी देरी को अस्वीकार किया
कोर्ट ने कहा कि जमीन अधिग्रहण के बाद मुआवजा देने में सरकारी दफ़्तरों की देरी नागरिक के वैध अधिकार में बाधा नहीं बन सकती और कलेक्टर को छह महीने के भीतर दावों की जांच कर कार्रवाई करने का आदेश दिया। यह निर्देश 'महावीर सिंह बनाम दिल्ली सरकार' मामले में दिया गया, जिसमें अधिग्रहित जसोला की जमीन के मालिकों को अभी तक मुआवजा नहीं मिला था। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि केवल देरी को कारण बनाकर राहत से इनकार नहीं किया जा सकता।

सौजन्य से:- Navbharat Times
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि जमीन अधिग्रहण के मुआवजे में सरकारी देरी नागरिकों के वैध अधिकार में बाधा नहीं बन सकती। कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण कलेक्टर को कानूनी उत्तराधिकारियों के दावों की जांच कर छह महीने में कार्रवाई करने का निर्देश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार जमीन अधिग्रहित करने के बाद कानून के मुताबिक मुआवजा देने से बच नहीं सकती।
नई दिल्ली: जमीन अधिग्रहण का मुआवजा देने में सरकारी दफ्तरों की देरी अब नागरिक के हक के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती। दिल्ली हाई कोर्ट ने फैसले में कहा कि सरकार प्रशासनिक देरी या तकनीकी आधार का सहारा लेकर जमीन मालिकों को वैध मुआवजा देने से बच नहीं सकती। कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण कलेक्टर (LAC) को कानूनी उत्तराधिकारियों के दावों की जांच कर छह महीने के अंदर उस पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस विकास महाजन की बेंच ने 25 अगस्त को यह आदेश 'महावीर सिंह व अन्य बनाम दिल्ली सरकार' केस में दिया। मामला जसोला की उस जमीन के मुआवजे से जुड़ा था, जिसे अवॉर्ड नंबर 21/1992-93 के तहत अधिग्रहित किया गया था। इसके बावजूद मालिक और उनके बेटों को मुआवजा नहीं मिल पाया।
जमीन ली तो मुआवजा भी देना होगा
कोर्ट ने दोहराया कि सरकार जमीन अधिग्रहण की वैधानिक प्रक्रिया का पालन करने और मुआवजा देने के लिए बाध्य है। अगर किसी कारण से अधिग्रहण की प्रक्रिया कानून के मुताबिक पूरी नहीं हुई है, तो सरकार को बकाया राशि लौटाने समेत कानून के अनुरूप कदम उठाना होगा।
'न्याय रोकने के लिए नहीं, दिलाने के लिए है'
सरकार की ओर से दावों में हुई देरी का सवाल उठाया गया था। लेकिन हाई कोर्ट ने इस आधार को निर्णायक नहीं माना। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विद्या देवी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2020) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जहां मामला लगातार जारी रहने वाले अधिकार-उल्लंघन से जुड़ा हो या परिस्थितियां अदालत की न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर दें, वहां केवल देरी का हवाला देकर राहत से इनकार नहीं किया जा सकता। बेच ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संवैधानिक अदालतें न्याय को बढ़ावा देने के लिए अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करेंगी, न कि उसे रोकने के लिए।
लेखक के बारे मेंप्राची यादवलगभग 19 साल से पत्रकारिता में हैं। सात साल तक एक दिल्ली-एनसीआर न्यूज चैनल में विभिन्न क्षेत्रों में काम किया। प्रोग्रामिंग और एंकरिंग भी की। टीवी से ही लीगल रिपोर्टिंग की शुरुआत हुई। उस दौरान, जिला अदालतों और दिल्ली हाई कोर्ट के साथ सुप्रीम कोर्ट तक की रिपोर्टिंग की। 2013 में नवभारत टाइम्स से जुड़ीं। यहां पर शुरुआत जिला अदालतों, नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और उपभोक्ता अदालतों की रिपोर्टिंग से हुई। वर्तमान में अन्य सभी अदालतों के साथ दिल्ली हाई कोर्ट भी कवर कर रही हैं।... और पढ़ें
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