संविधान की दसवीं अनुसूची: दल-बदल कानून को क्यों चुनौती दे रहे हैं कपिल सिब्बल?
कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की याचिका, दल-बदल कानून की व्याख्या पर सवाल उठाए, क्षेत्रीय दलों को अपने अस्तित्व को लेकर चिंता है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
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संविधान की दसवीं अनुसूची क्या है और क्या है दल-बदल कानून?
- दरअसल सत्तर-अस्सी के दशक में भारतीय राजनीति में आया राम गया राम वाली बात यानि सत्ता के गणित को साधने के लिए दल बदलू नेताओं की संख्या बहुत ज्यादा थी
- फिर 1985 में केंद्र की कांग्रेस की राजीव गांधी की सरकार की कोशिशों से भारतीय संविधान में 52वें संविधान संशोधन, 1985 के जरिए दसवीं अनुसूची जोड़ी गई थी। इसका उद्देश्य आया राम, गया राम जैसी राजनीतिक संस्कृति पर रोक लगाना था।
- इस कानून के तहत यदि कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ देता है या पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करता है तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
- संविधान के अनुच्छेद 102(2) और 191(2) भी इसी व्यवस्था को लागू करते हैं। हालांकि कानून में राजनीतिक दलों के विलय को लेकर पैरा 4 में एक अपवाद Merger Exception रखा गया। जिसके तहत बड़ी बात यह है कि यदि किसी पार्टी के कम से कम 2/3 सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय कर लेते हैं, तो इसे दल बदल नहीं माना जाता है।
- यही अपवाद अब सबसे बड़ा विवाद बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसी प्रावधान का इस्तेमाल कर कई राजनीतिक दलों में टूट और विलय को वैध ठहराने की कोशिश हुई है।
कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में क्या चुनौती दी है?
कपिल सिब्बल जो कि देश के नामी वकील है, और राज्यसभा सांसद भी है दल बदल कानून को गलत मानते हैं। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा है कि दसवीं अनुसूची के पैरा 4 की वर्तमान न्यायिक व्याख्या संविधान की मूल भावना के विपरीत है। उनका कहना है कि केवल दो तिहाई विधायक किसी दूसरे दल में शामिल होकर विलय का दावा नहीं कर सकते, जब तक मूल राजनीतिक दल स्वयं संगठनात्मक स्तर पर विलय का निर्णय न ले। सिब्बल के अनुसार मौजूदा व्यवस्था दलबदल को रोकने के बजाय उसे वैध रास्ता उपलब्ध करा रही है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट संवैधानिक व्याख्या और बड़ी पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई की मांग की है।क्या मुसलमानों को UCC से बाहर रखने की मांग जायज है? जानिए संविधान, अनुच्छेद 44 और सुप्रीम कोर्ट का कानूनी नजरिया
क्षेत्रीय दलों की चिंता क्यों बढ़ी?
हाल के वर्षों में कई राज्यों में बड़े पैमाने पर विधायकों और सांसदों के समूह ने दूसरे दलों में शामिल होने के लिए मर्जर प्रावधान का सहारा लिया। ऐसे में कई बार सत्ता का संकट तो पैदा हुआ ही, पार्टियों के वजूद पर भी खतरा मंडराने लगा। महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गोवा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और हाल के अन्य घटनाक्रमों ने संविधान की दसवीं अनुसूची की व्याख्या पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी कारण क्षेत्रीय दलों को आशंका है कि यदि मौजूदा व्याख्या जारी रही तो उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों को संगठित तरीके से दूसरी पार्टी में ले जाना आसान हो जाएगा।'बुलडोजर एक्शन पर बंटे न्यायधीश', FIR के बाद आरोपी का घर क्यों नहीं गिरा सकती सरकार ? इलाहाबाद हाई कोर्ट जजों में मतभेद
सुप्रीम कोर्ट के सामने कौन से संवैधानिक प्रश्न हैं?
- कपिल सिब्बल की याचिका को शीर्ष अदालत ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कपिल सिब्बल की याचिका को बुधवार को सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है।
- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट को कई महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार करना पड़ सकता है। पहला, क्या मूल राजनीतिक दल और विधायी दल को समान माना जा सकता है?
- दूसरा, क्या दो-तिहाई विधायकों का समर्थन वैध राजनीतिक विलय, संविधान की कसौटी पर खरा माना जाए?
- तीसरा, क्या सच में वर्तमान व्याख्या दलबदल कानून के मूल उद्देश्य को विफल कर रही है?
- चौथा, क्या स्पीकर द्वारा ऐसे विलयों को मान्यता देना संविधान की संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है?
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