जर्मन पुलिस को नए अधिकार पर आलोचकों का क्या कहना है?
जर्मनी की सरकार ने संघीय पुलिस को बढ़ाए गए अधिकारों के साथ एक नया कानून पारित कर दिया है। आलोचकों का कहना है कि यह कानून लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रहा है।

सौजन्य से:- DW.com
जर्मन पुलिस को ज्यादा अधिकार दिए जाने पर क्यों मचा है बवाल
१७ जुलाई २०२६जर्मनी की सरकार ने अपनी संघीय पुलिस की ताकत काफी बढ़ा दी है, खासकर निगरानी करने, एआई तकनीक का इस्तेमाल करने, अवैध प्रवासियों को हिरासत में लेने, और ड्रोन से बचाव के मामलों में.
पिछले हफ्ते जर्मनी की संसद ‘बुंडेस्टाग' ने एक नया कानून पास किया. इस कानून के तहत, संघीय पुलिस को पहले से अधिक अधिकार दिए गए हैं. अब पुलिस ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और फोन व अन्य संचार की निगरानी जैसी आधुनिक तकनीकों का ज्यादा इस्तेमाल कर सकेगी. इसके अलावा, इस कानून से उन प्रवासियों को हिरासत में लेना भी आसान हो जाएगा, जिन्हें देश से बाहर निकाला जाना है.
सरकार का कहना है कि 1994 के बाद यह जर्मनी में संघीय पुलिस के लिए पहला नया कानून है. सरकार के मुताबिक, तेजी से बदलती तकनीक और जनता की सुरक्षा के सामने उभर रहे नए खतरों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए यह कानून बेहद जरूरी है.
हालांकि, आलोचकों का कहना है कि इस कानून के बाद संघीय पुलिस बड़े पैमाने पर निगरानी कर सकेगी. इसके कारण वे तकनीकें और डाटाबेस जिनका इस्तेमाल अब तक सिर्फ राज्य पुलिस करती थी या कुछ विशेष अभियानों में होता था, अब पूरे देश में लगातार और व्यापक रूप से इस्तेमाल किए जा सकेंगे.
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मानवाधिकार और डिजिटल प्राइवेसी के लिए काम करने वाले लोगों का कहना है कि यह कानून लोकतांत्रिक आजादी के लिए बड़ा खतरा पैदा करता है और जर्मनी की संवैधानिक अदालत में इसे चुनौती दिए जाने की संभावना है. फिर भी, इन कानूनी चुनौतियों से जुड़े फैसले आने में कई साल लग सकते हैं और इस बीच नया कानून लागू किया जा सकता है.
एआई की मदद से रियल-टाइम में निगरानी
इस नए संघीय पुलिस कानून का सबसे बड़ा और असरदार हिस्सा शायद यह है कि यह उन सार्वजनिक जगहों पर एआई की मदद से चेहरे की पहचान करने वाली निगरानी प्रणाली के इस्तेमाल की इजाजत देता है, जो संघीय पुलिस के दायरे में आती हैं. जैसे, हवाई अड्डे, बड़े रेलवे स्टेशन और जर्मनी की सीमा के आस-पास के इलाके.
संघीय पुलिस को सीसीटीवी फुटेज पर ‘बिहेवियर रिकग्निशन' (व्यवहार पहचानने वाली तकनीक) एआई सिस्टम का इस्तेमाल करने की भी मंजूरी दी जाएगी. इस सिस्टम का काम यह अंदाजा लगाना होता है कि भीड़ में कोई व्यक्ति कुछ संदिग्ध या डराने वाली हरकत तो नहीं कर रहा है. मसलन, किसी को मुक्का मारना. अगर एआई ऐसी किसी हरकत को पकड़ता है, तो वह तुरंत सीधे ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को अलर्ट भेज देगा.
संसद में पिछले हफ्ते हुई बहस के दौरान विपक्षी पार्टियों ने खास तौर पर इसी बात की आलोचना की थी. सोशलिस्ट लेफ्ट पार्टी की क्लारा बुंगर ने कहा, "जरा इसकी कल्पना कीजिए: आपकी ट्रेन दो घंटे लेट है और आप गुस्से में हैं. झुंझलाहट में प्लेटफॉर्म पर इधर-उधर टहल रहे हैं. एआई की नजर में यह ‘संदिग्ध रूप से मंडराना' है. उसे लगेगा कि आप जेबकतरे हैं.” उनकी इस बात पर सत्ताधारी दलों के नेताओं ने जमकर हूटिंग की.
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पुलिस यूनियनों ने इस कदम का स्वागत किया है, क्योंकि इससे कर्मचारियों पर काम का दबाव कम हो सकता है. हालांकि, डिजिटल अधिकारों के लिए काम करने वाले एक्टिविस्ट इसका विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि इससे बड़े पैमाने पर लोगों की निगरानी का ढांचा तैयार हो रहा है.
बर्लिन के ‘सेंटर फॉर डिजिटल राइट्स एंड डेमोक्रेसी' के पॉलिसी हेड मिशाएल कोलेन ने डीडब्ल्यू से कहा, "यह बहुत खतरनाक शुरुआत है, क्योंकि यह एक तरह से सार्वजनिक जगहों पर लोगों की पहचान गुप्त रखने के अधिकार को ही खत्म कर देता है. ये ऐसे तरीके हैं जिन्हें हम चीन, ईरान और रूस में देखते हैं, लेकिन जर्मनी के हिसाब से ये बेहद असामान्य हैं.”
मुंस्टर में जर्मन पुलिस यूनिवर्सिटी में पब्लिक लॉ के प्रोफेसर मार्कुस थिएल ने कहा कि वह ऐसी चिंताओं को समझ सकते हैं. उन्होंने कहा, "लेकिन मुझे लगता है कि यह हमेशा एक तरह का रिफ्लेक्स यानी त्वरित प्रतिक्रिया है. जब भी पुलिस की ताकत बढ़ाई जाती है, कुछ संगठन और समूह हमेशा इसका कड़ा विरोध करते हैं. उनकी बात कुछ हद तक सही भी है, क्योंकि खासकर एआई की मदद से किए जाने वाले इन उपायों में हमेशा बुनियादी अधिकारों के गंभीर उल्लंघन का खतरा बना रहता है.”
यह चिंता खासकर इसलिए और बढ़ जाती है, क्योंकि आम नागरिकों के लिए यह जानना नामुमकिन है कि एआई निगरानी तकनीक उनके डाटा को कैसे पढ़ रही है और उसका क्या इस्तेमाल कर रही है. जबकि जर्मनी में लोगों के पास यह अधिकार है कि वे अपने डाटा को ऐक्सेस कर सकें और जान सकें कि उसका इस्तेमाल कैसे हो रहा है.
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प्रोफेसर थिएल ने कहा, "इसीलिए यह बेहद जरूरी है कि ऐसे नियम-कानूनों को इस तरह तैयार किया जाए जो बुनियादी अधिकारों के अनुरूप हों. मैं लोगों के विरोध को समझ सकता हूं, लेकिन मेरा यह भी मानना है कि हमें इन सुरक्षा उपकरणों की जरूरत है. अगर इनके इस्तेमाल को लेकर सही और स्पष्ट ढंग से कानून में लिखा जाए, तो मुझे इनमें कोई बुनियादी समस्या नहीं दिखती.”
हालांकि, एक्टिविस्ट इस बात को लेकर भी डरे हुए हैं कि यह नया कानून पुलिस को आम लोगों के फोन और लैपटॉप जैसे उपकरणों में निगरानी सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करने की ज्यादा छूट देता है, जिसे सरकार ‘प्रिवेंटिव सर्विलांस' (रोकथाम के लिए निगरानी) कहती है.
कोलेन ने कहा, "इससे बेशक यह खतरा पैदा हो जाता है कि आपकी बेहद निजी और संवेदनशील जानकारी अचानक सुरक्षा बलों के हाथ लग सकती है. सबसे बुरे हालात में, ऐसा हो सकता है कि वे आपकी डायरी भी पढ़ लें.”
ड्रोन: कब इस्तेमाल करें, कब नीचे गिराएं
नए कानून में यह भी तय किया गया है कि संघीय पुलिस ड्रोन का इस्तेमाल कब और कैसे कर सकती है.
प्रोफेसर थिएल ने समझाया कि यह नया कानूनी ढांचा बहुत महत्वपूर्ण है, "क्योंकि एक जगह इंस्टॉल किए गए कैमरे की तुलना में, आसमान से सब कुछ देख सकने वाले ड्रोन से बुनियादी अधिकारों में दखल कहीं ज्यादा होता है.” नया कानून रेलवे स्टेशनों पर बहुत ज्यादा भीड़-भाड़ वाले समय में और देश की सीमाओं के पास ड्रोन तैनात करने की मंजूरी देता है.
इसी तरह, इस कानून से यह भी तय होता है कि अगर कोई बिना पायलट वाला ड्रोन (यूएवी) खतरा बनता है, तो पुलिस उसके खिलाफ क्या कार्रवाई कर सकती है. यह बदलाव पिछले साल की उन घटनाओं के बाद बहुत जरूरी माना जा रहा है, जब जर्मनी और यूरोप के कई हवाई अड्डों पर अचानक ड्रोन दिखने से उड़ानों में भारी रुकावट आई थी. अब ऐसे मामलों में पुलिस सिग्नल ब्लॉकर्स, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स (ईएमपी) और यहां तक कि हथियारों का भी इस्तेमाल कर सकती है. हालांकि, जैसा कि प्रोफेसर थिएल ने कहा, ऐसा सिर्फ आखिरी उपाय के तौर पर ही किया जाएगा.
प्रवासियों की अचानक जांच और उन्हें हिरासत में लेने का अधिकार
मानवाधिकार संगठन इस कानून को लेकर काफी चिंतित हैं, क्योंकि नया कानून संघीय पुलिस को उन प्रवासियों को हिरासत में लेने के लिए ज्यादा अधिकार देता है जिन्हें देश से बाहर निकाला जाना है. साथ ही, पुलिस को किसी की भी अचानक तलाशी लेने की छूट देता है. एमनेस्टी इंटरनेशनल के एक बयान के मुताबिक, पुलिस को मिली यह छूट ‘नस्लीय भेदभाव' (रंग और हुलिए के आधार पर शक करने) का रास्ता खोलती है.
जर्मनी में एमनेस्टी की जनरल सेक्रेटरी जूलिया डुकरो के मुताबिक, ये बदलाव पुलिस व्यवस्था में आ रहे एक बड़े बदलाव का हिस्सा हैं. संगठन के बयान में कहा गया, "हम बढ़ते और खतरनाक असंतुलन को देख रहे हैं. जहां एक ओर संघीय और राज्य पुलिस एजेंसियों को नियंत्रण और निगरानी के लिए लगातार ज्यादा अधिकार दिए जा रहे हैं, वहीं पारदर्शिता, जवाबदेही और डाटा की सुरक्षा से जुड़े नियमों का विस्तार नहीं किया जा रहा है. इसके विपरीत, बुनियादी अधिकारों की सुरक्षा के लिए जो नियम पहले से मौजूद हैं, उन्हें भी खत्म किया जा रहा है.”
संवैधानिक चुनौतियां और संसदीय पैंतरेबाजी
जर्मन सरकार को पहले भी पुलिस अधिकारों को लेकर मिली कानूनी चुनौतियों के आगे झुकना पड़ा है. साल 2016 में वहां की संवैधानिक अदालत ने फैसला सुनाया था कि संघीय पुलिस को मिली कुछ निगरानी शक्तियां, जिन्हें 2008 में बढ़ाया गया था, वे हद से ज्यादा थीं और उनमें संशोधन करना जरूरी था.
हालांकि, वह फैसला आने में आठ साल लग गए. कोलेन जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार हमेशा पुलिस की शक्तियों को मजबूत करने का फैसला करती है और वकीलों को आने वाले सालों में इस पर बहस करने देती है. कोलेन ने कहा, "हम संवैधानिक अदालत और गृह मंत्रालय के बीच एक तरह का ‘चूहे-बिल्ली का खेल' देख रहे हैं.” हर बार जब अदालत कोई नया फैसला सुनाती है, तो सरकार उसमें बहुत मामूली बदलाव करके जवाब देती है और फिर कानूनी विवादों का एक नया दौर शुरू हो जाता है. कोलेन ने आगे कहा, "यह कभी न खत्म होने वाली कहानी है और हम पिछले 30 सालों से इसे लगातार देख रहे हैं.”
यह खींचतान तो होनी ही है. सरकारी सुरक्षा बल हमेशा ज्यादा ताकतों की मांग करेंगे और संवैधानिक अदालत, आदर्श रूप से, हमेशा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने की कोशिश करेगी. कोलेन का कहना है कि कमी बस इस बात की है कि कानून बनाने वाले नेता (सांसद) इन कानूनों की ठीक से जांच-परख नहीं कर रहे हैं. बतौर कोलेन, "मेरी मुख्य आलोचना यह है कि नागरिकों को उनके बुनियादी अधिकारों की गारंटी मिल रही है या नहीं, यह देखना असल में संसद का काम है. लेकिन बहुत बार, संसदीय दल सरकार के लिखे हुए कानून को बिना सोचे-समझे बस पास कर देते हैं.”
उन्होंने आगे कहा कि इस मामले में, एआई की मदद से रीयल-टाइम में निगरानी के सवाल पर संसद में सार्वजनिक सुनवाई तक का समय नहीं मिला, क्योंकि इस हिस्से को सरकार में शामिल पार्टियों सेंटर-राइट क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) और सेंटर-लेफ्ट सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) ने वोटिंग से महज कुछ दिन पहले ही कानून में जोड़ा था. कोलेन ने कहा, "संसदीय समूहों ने बिना किसी विशेषज्ञ से सलाह लिए या डाटा प्रोटेक्शन कमिश्नर से पूछे बिना ही इसे सीधे कानून में लिख दिया. कानून बनाने का तरीका ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए.”
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