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मतदाता सूची से नाम हटाने से नागरिकता नहीं छिनेगी, सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट तीर

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि मतदाता सूची से नाम हटाने से किसी व्यक्ति की नागरिकता नहीं छिन जाती। अदालत ने चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब मांगा है कि क्यों मतदाता सूची से नाम हटाने के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ भी छीन लिया जाए।

17 जुलाई 2026 को 02:15 pm बजे
मतदाता सूची से नाम हटाने से नागरिकता नहीं छिनेगी, सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट तीर

सौजन्य से:- ETV Bharat

वोटर लिस्ट से नाम कटने पर नहीं छिनेगी नागरिकता, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में वेलफेयर स्कीम के लाभ बंद होने से जुड़ी याचिका पर चुनाव आयोग और सरकार से जवाब मांगा है.

By Sumit Saxena

Published : July 17, 2026 at 7:31 PM IST

नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि मतदाता सूची से नाम हटा दिए जाने से किसी व्यक्ति की नागरिकता नहीं छिन जाती. इसके साथ ही कोर्ट ने साफ किया कि हालांकि मतदाता सूची पर चुनाव आयोग का पूरा नियंत्रण है, लेकिन वह नागरिकता का दर्जा तय नहीं कर सकता.

अदालत, पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की एसआईआर समिति के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने चुनाव आयोग, पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य चुनाव पैनल से याचिका पर जवाब मांगा है.

अधिवक्ता नेहा राठी के माध्यम से दायर इस याचिका में पश्चिम बंगाल विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़े मांगे गए हैं. इसमें दाखिल, स्वीकार और खारिज किए गए फॉर्म 6 और 7 की संख्या के साथ-साथ अपीलीय न्यायाधिकरणों के पास लंबित पड़े मामलों और अपीलों के निपटारे का विवरण भी शामिल है.

पीठ ने कहा कि उसने बिहार एसआईआर मामले के फैसले में यह साफ कर दिया था कि नागरिकता तय करने का अंतिम अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है, और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने मात्र से किसी की नागरिकता नहीं छीनी जा सकती.

सुनवाई के दौरान, बोस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि हटाए गए मतदाताओं के दावों और आपत्तियों की सुनवाई के लिए गठित 18 न्यायाधिकरण जिस तरह से काम कर रहे हैं, उससे जमीनी स्तर पर विसंगतियां और देरी हो रही है.

शंकरनारायणन ने एक और मुद्दा उठाते हुए तर्क दिया कि यदि मतदाता सूची से नाम हटाने के फैसले को बरकरार रखा जाता है, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे. उन्होंने आगे कहा, "निपटाए गए 38,000 मामलों में से 70% अपीलों को स्वीकार कर लिया गया था. अब जिन 30% अपीलों को स्वीकार नहीं किया गया है, वहां नाम हटाने का फैसला कायम रहेगा."

उन्होंने कहा, "वे लोग संभवतः रिट याचिका या अन्य माध्यमों से इसे अदालत में चुनौती दे सकते हैं. लेकिन नाम हटाने का मौजूदा परिणाम यह है कि 17 मई से अब तक तीन ऐसे नोटिफिकेशन आ चुके हैं, जिनमें कहा गया है कि 'यदि आपका नाम एसआईआर (SIR) सूची से हटा दिया गया है, तो आप सार्वजनिक वितरण प्रणाली का लाभ खो देंगे,' जो उन्हें पहले मिल रहा था. उन्होंने इसे सीधे वोटिंग से जोड़ दिया है."

वकील ने दलील दी कि यदि किसी व्यक्ति को सूची से बाहर रखा जाता है, तो उन्हें महिलाओं के लिए बनी 'अन्नपूर्णा योजना', महिला-केंद्रित कैश ट्रांसफर (नकद हस्तांतरण योजना) और जाति प्रमाण पत्र सत्यापन के लाभ से भी वंचित किया जा रहा है. इस पर पीठ ने कहा कि ये चिंताएं पहले भी उसके सामने उठाई गई हैं और कोर्ट इन बातों को लेकर पूरी तरह सजग है.

जस्टिस बागची ने टिप्पणी की, "हमने बिहार एसआईआर (SIR) से जुड़े अपने फैसले में इसका संकेत दिया था. हमने यह बिल्कुल साफ कर दिया था कि इस मामले में चुनाव आयोग की भी एक जिम्मेदारी बनती है." उन्होंने आगे जोड़ा कि यदि मतदाता सूची से नाम हटा दिया जाता है लेकिन नागरिकता की स्थिति बनी रहती है, तो चुनाव आयोग का यह कर्तव्य है कि वह इस मामले को अंतिम निर्णय के लिए संबंधित केंद्र सरकार के विभाग या मंत्रालय के पास भेजे.

शंकरनारायणन ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि उन्होंने पहले इस बात का खुलासा किया था, और न ही हमें इस बात की आशंका थी कि यहां रहने वाले लोगों के लिए चल रही इन सभी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ को भी वापस ले लिया जाएगा."

वरिष्ठ वकील ने नागरिकों के नागरिक अधिकारों पर जोर दिया और कहा कि जब मामला न्यायाधिकरण के समक्ष विचाराधीन हो, तो इन अधिकारों को नहीं छीना जाना चाहिए. इस पर जस्टिस बागची ने टिप्पणी की, "हमारा फैसला बिल्कुल स्पष्ट है: संविधान के अनुच्छेद 9, 10, 11 और 12 के तहत नागरिकता की स्थिति को लेकर चुनाव आयोग कोई संवैधानिक प्राधिकरण नहीं है."

जस्टिस बागची ने आगे कहा, "यहां दो बातें हैं: पहली कि क्या कानून को लेकर कोई भ्रम है, और दूसरी कि क्या कानून को सही तरीके से लागू किया जा रहा है. जहां तक पहली बात का सवाल है, हमें कोई भ्रम दिखाई नहीं देता. हमारा फैसला साफ है. मतदाता सूची पर चुनाव आयोग का पूरा नियंत्रण और अधीक्षण (Superintendence) है. चुनाव आयोग किसी को सूची में शामिल न करने का निर्णय ले सकता है... जो कि देश का नागरिक है. हालांकि, इसके परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की नागरिकता का दर्जा समाप्त नहीं हो जाता..."

शंकरनारायणन ने दलील दी कि लंबित पड़ी 34 लाख अपीलों में से केवल 38,000 का ही निपटारा किया गया है, जिससे 33.5 लाख अपीलें अब भी लंबित हैं. अपील लंबित रहने के दौरान ही इन लोगों को मिलने वाले लाभों को वापस ले लिया गया है.

शंकरनारायणन ने कहा, "ट्रैक रिकॉर्ड दिखाता है कि 70% अपीलों को स्वीकार किया गया है." उन्होंने आगे जोड़ा कि उनका मुवक्किल पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने और उन 19 न्यायाधिकरणों की मदद के लिए एक व्यवस्था का सुझाव दे रहा है. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यदि किसी के पास पासपोर्ट है, तो उसे नागरिकता का स्पष्ट प्रमाण माना जाना चाहिए.

पीठ इस नई याचिका पर पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा एसआईआर मुद्दे पर दायर याचिकाओं सहित अन्य लंबित याचिकाओं के साथ 25 अगस्त को सुनवाई करने के लिए सहमत हो गई.

यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों को लागू करने की मांग करती है. याचिका में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के कारण मतदाता गणना चरण के दौरान 58 लाख से अधिक मतदाताओं को बाहर कर दिया गया था. इसमें आगे जोड़ा गया कि जहां दावों और आपत्तियों के चरण के दौरान सूची में नाम शामिल करने के लिए 9.64 लाख आवेदन (फॉर्म 6 और 6A) और नाम हटाने के लिए 99,000 से अधिक आवेदन (फॉर्म 7) प्राप्त हुए थे, वहीं 28 फरवरी को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में केवल 1.82 लाख नए नाम ही जोड़े गए.

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