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सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट‑जमा राशि के प्रबंधन के लिए विशिष्ट कानून की सिफारिश की, लॉ कमीशन को जांच के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों व ट्रिब्यूनलों में जमा पैसे के प्रबंधन, निवेश और निकासी में मौजूद असमानताओं की जांच हेतु लॉ कमीशन से कहा कि वह विस्तृत रिपोर्ट तैयार करे और अन्य देशों के प्रावधानों पर विचार करे। विभिन्न हाई कोर्टों के अलग‑अलग तरीकों को देखते हुए कोर्ट ने एक समान नियम व एकीकृत मंच की मांग की, जिससे समय‑मूल्य के सिद्धांत के अनुसार ब्याज व निवेश में स्पष्टता आए।

20 सितंबर 2026 को 02:04 am बजे
सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट‑जमा राशि के प्रबंधन के लिए विशिष्ट कानून की सिफारिश की, लॉ कमीशन को जांच के निर्देश

सौजन्य से:- Live Law Hindi

सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट में जमा रकम के मैनेजमेंट के लिए कानून बनाने की सिफारिश की, लॉ कमीशन से जांच करने को कहा

Shahadat

19 Sept 2026 8:34 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने भारत के लॉ कमीशन से कहा कि वह अदालतों और ट्रिब्यूनल में जमा पैसे के मैनेजमेंट, निवेश और उसे जारी करने के तरीकों में एकरूपता की कमी की जांच करे।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा,

"हमारी राय है कि इस विषय पर एक उपयुक्त कानून बनाना और तैयार करना ज़रूरी है।"

यह बेंच दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आर्बिट्रल अवार्ड की रकम जमा करने पर अवार्ड-देनदार (जिस पर भुगतान की जिम्मेदारी थी) की ब्याज देने की जिम्मेदारी को बरकरार रखा गया। यह ब्याज आर्बिट्रल अवार्ड पास होने की तारीख से लेकर जमा रकम को अवार्ड-धारक को ट्रांसफर किए जाने तक देना था।

कोर्ट ने अदालतों और ट्रिब्यूनल के बीच कई अहम अंतर देखे। ये अंतर अवार्ड या डिक्री की कितनी रकम जमा करनी है, पैसा किस बैंक या फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन में रखा जाएगा, निवेश का तरीका क्या होगा, कितना ब्याज मिलेगा, और जमा रकम को निकालने, रिन्यू करने और फिर से निवेश करने से जुड़े थे।

फैसले में कहा गया कि अलग-अलग हाई कोर्ट ने जमा रकम को संभालने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए।

दिल्ली हाईकोर्ट में जमा रकम को उसकी रजिस्ट्री फिक्स्ड डिपॉजिट में रखती है, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में जमा करने की व्यवस्था करता है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्रोथोनोटरी और सीनियर मास्टर से जुड़ी व्यवस्था अपनाई है। साथ ही नेशनल बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट के संबंध में बाद में न्यायिक निर्देश भी दिए।

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एग्जीक्यूटिंग कोर्ट को निर्देश दिया कि वे जमा रकम को नेशनल बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट में रखें। सुप्रीम कोर्ट में जमा रकम को नेशनल बैंकों में सरकारी डिपॉजिट के जरिए रखा जाता है, जबकि कलकत्ता और मद्रास हाई कोर्ट में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से जुड़ी व्यवस्थाएं हैं।

कोर्ट ने कहा,

"हमने... अपने देश में उस असमानता पर ध्यान दिया, जो अपील पर विचार करते समय अदालतों/ट्रिब्यूनल के सामने जमा रकम करने के तरीके और प्रक्रिया के संबंध में मौजूद है। हमने भारत के लॉ कमीशन से उन मुद्दों की जांच करने का अनुरोध किया, जिन पर हमने इस फैसले में प्रकाश डाला। साथ ही, लॉ कमीशन से यह भी अनुरोध किया गया कि वह दूसरे देशों द्वारा बनाए गए कानूनों पर विचार करे और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, वित्त मंत्रालय और कानून और न्याय मंत्रालय (नोडल मंत्रालय) से भी सलाह-मशविरा करे।"

कोर्ट के अनुसार, इस तरह के अंतर के कारण एक जैसी स्थिति वाले मुक़दमेबाज़ों के साथ अलग-अलग व्यवहार होता है। इससे निवेश, अकाउंटिंग और ब्याज से जुड़े और भी मुक़दमे खड़े होते हैं।

कोर्ट ने जमा राशि के 'समय के साथ पैसे के मूल्य' (Time Value of Money) पर ज़ोर दिया और कहा कि कोर्ट में जमा राशि को संभालने के तरीके में स्पष्टता और एकरूपता होनी चाहिए।

कोर्ट ने सुझाव दिया कि एक कॉमन प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए स्टैंडर्डाइज़ेशन (मानकीकरण) हासिल किया जा सकता है, जिसके तहत अलग-अलग कोर्ट और ट्रिब्यूनल में जमा की गई रकम को एक साथ इकट्ठा करके किसी सही फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट में निवेश किया जाए।

कोर्ट ने कहा,

"किसी भी जमा राशि की आर्थिक अखंडता बनाए रखने और उस पर ब्याज देने के लिए, जमा राशि को संभालने के तरीके और प्रक्रिया में स्पष्टता और एकरूपता होनी चाहिए। कोर्ट में जमा रकम को संभालने की प्रक्रिया में स्टैंडर्डाइज़ेशन की कमी 'समय के साथ पैसे के मूल्य' के ज़रूरी सिद्धांत और निश्चित व स्पष्ट तरीके से ब्याज मिलने की प्रक्रिया को कमज़ोर करती है... स्टैंडर्डाइज़ेशन की यह प्रक्रिया एक कॉमन प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए होनी चाहिए, जिसमें अलग-अलग कोर्ट/ट्रिब्यूनल में जमा रकम को एक ही स्कीम में इकट्ठा किया जाए और फिर मुक़दमा लड़ने वाले पक्षों के लिए सबसे फ़ायदेमंद फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट में निवेश किया जाए। यह कॉमन प्लेटफ़ॉर्म न केवल ब्याज दरों में निश्चितता लाएगा और मुक़दमेबाज़ों के लिए आसानी बढ़ाएगा, बल्कि जमा रकम को निवेश करने और संभालने के मामले में कोर्ट/ट्रिब्यूनल पर पड़ने वाले बोझ को भी कम करेगा।"

कोर्ट ने के.एल. सुनेजा बनाम डॉ. (श्रीमती) मंजीत कौर मोंगा (2023 LiveLaw (SC) 68) मामले में अपने पहले के फैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें कोर्ट रजिस्ट्री में जमा पैसे के लिए एक जैसी गाइडलाइंस की ज़रूरत पर ज़ोर दिया गया।

के.एल. सुनेजा मामले में कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया,

"सभी कोर्ट और न्यायिक मंचों को ऐसी गाइडलाइंस बनानी चाहिए, जिनके तहत जब कोर्ट/ट्रिब्यूनल के ऑफिस/रजिस्ट्री में कोई रकम जमा की जाए तो उसे अनिवार्य रूप से किसी बैंक या वित्तीय संस्थान में जमा किया जाए ताकि भविष्य में कोई नुकसान न हो। साथ ही यह भी कहा गया कि ये गाइडलाइंस हर कोर्ट, ट्रिब्यूनल, कमीशन, अथॉरिटी, एजेंसी आदि के उचित नियमों या रेगुलेशन के तौर पर शामिल की जानी चाहिए, जो न्यायिक शक्तियां इस्तेमाल करते हैं।"

नतीजतन, कोर्ट डिपॉजिट के मैनेजमेंट के लिए एक ज़्यादा एक जैसा तरीका अपनाने की ज़रूरत को देखते हुए कोर्ट ने लॉ कमीशन से कहा कि वह फैसले में बताई गई बातों और दूसरे देशों में अपनाए गए कानूनों की जांच करे।

रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि वह इस फैसले की एक कॉपी भारत के लॉ कमीशन के चेयरमैन, RBI के गवर्नर और वित्त तथा कानून और न्याय मंत्रालयों के सचिवों को भेजे।

Cause Title: NATIONAL SEEDS CORPORATION LTD. VERSUS NATIONAL AGRO SEED CORPORATION (INDIA)

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