जन्म और मृत्यु पंजीकरण के लिए कितने दिनों में रजिस्ट्रेशन कराना है जरूरी?
भारत में जन्म और मृत्यु का पंजीकरण अनिवार्य है। सामान्य रिपोर्टिंग अवधि 21 दिन है। अगर 21 दिन की समय सीमा निकल चुकी है तो पंजीकरण को टालते रहना नुकसानदायक हो सकता है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
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जन्म या मृत्यु का पंजीकरण कितने दिनों में कराना जरूरी है?
दरअसल भारत के कानून के तहत जन्म और मृत्यु का पंजीकरण अनिवार्य है और सामान्य रिपोर्टिंग अवधि 21 दिन है। इसलिए परिवार को कोशिश करनी चाहिए कि जन्म या मृत्यु की सूचना स्थानीय रजिस्ट्रार को 21 दिनों के भीतर दे दी जाए। 21 दिन के भीतर रिपोर्ट करने पर सामान्यतः कोई विलंब शुल्क नहीं लिया जाता। यहां यह बताना जरूरी है कि 2026 का नया कानून 21 दिनों की सामान्य समयसीमा को खत्म नहीं करता। यानी 21 दिन के भीतर रिपोर्ट करना आज भी सबसे सुरक्षित और सरल रास्ता है। जन्म और मृत्यु दोनों के लिए यह मूल समय-सीमा लागू होती है।नागरिकता का फैसला 'निष्पक्ष प्रक्रिया' से ही होगा, सुप्रीम कोर्ट ने खींच दी लकीर, गौहाटी हाईकोर्ट का आदेश रद्द
21 दिन के बाद लेकिन 30 दिन के भीतर क्या होगा?
21 दिन निकल जाने का मतलब यह नहीं है कि जन्म या मृत्यु का प्रमाणपत्र बन ही नहीं सकता। इससे जुड़े प्रावधानों में में 21 दिन से अधिक लेकिन 30 दिन के भीतर की रिपोर्टिंग को अलग श्रेणी में रखा गया है।इस अवधि में मामला सामान्य समयसीमा से बाहर माना जाता है और निर्धारित विलंब शुल्क लागू हो सकता है। इसलिए परिवार को 21 दिन पूरे होने का इंतजार नहीं करना चाहिए। जितनी जल्दी सूचना रजिस्ट्रार को दी जाए, उतना बेहतर है।देश की आंतरिक सुरक्षा-संप्रभुता के लिए क्यों जरूरी है FCRA ? विदेशी फंडिंग पर भारत के कानूनी सुरक्षा कवच के बारे जानिए
30 दिन से एक साल तक देरी हुई तो क्या करना होगा?
साल 2023 के संशोधन के बाद से 30 दिन से अधिक लेकिन एक साल के भीतर दी गई जन्म या मृत्यु की सूचना के लिए जिला रजिस्ट्रार या निर्धारित अधिकारी की लिखित अनुमति का प्रावधान है। इसके साथ निर्धारित लेट फीस और प्रमाणित दस्तावेज भी देना होता है। इसलिए अगर 21 दिन की समय सीमा निकल चुकी है तो पंजीकरण को टालते रहना नुकसानदायक हो सकता है। एक साल पूरा होने से पहले प्रक्रिया पूरी करना कानूनी और व्यावहारिक रूप से ज्यादा आसान है। ध्यान रखें कि 2026 का नया संशोधन इस एक साल तक की व्यवस्था को खत्म नहीं करता। असली बड़ा बदलाव एक साल के बाद शुरू होता है।एक साल से ज्यादा लेकिन दो साल के भीतर देरी पर DM/SDM का आदेश
2026 के Amendment Act के संशोधित प्रावधानों के तहत अब घटना के एक साल बाद लेकिन दो साल के भीतर सूचना देने पर पंजीकरण केवल जिला मजिस्ट्रेट, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट के आदेश पर किया जा सकेगा। संबंधित अधिकारी को जन्म या मृत्यु की जानकारी की सत्यता की जांच करनी होगी। इसके बाद ही निर्धारित शुल्क के भुगतान पर पंजीकरण की अनुमति दी जा सकती है। इसका मतलब यह है कि एक साल से ज्यादा देरी होने पर मामला केवल रजिस्ट्रार के स्तर पर पूरा नहीं होगा।भारत से है नफरत तो फिर भारत आना ही क्यूं ? दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज की जहांगीर काजी की याचिका, शादी में शामिल होने के लिए आना था भारत
दो साल से ज्यादा देरी पर न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी का आदेश
2026 के कानून का सबसे बड़ा बदलाव दो साल से अधिक पुरानी घटना के पंजीकरण को लेकर है। ऐसे मामले में अब केवल प्रशासनिक अधिकारी का आदेश पर्याप्त नहीं होगा। पंजीकरण के लिए क्षेत्राधिकार रखने वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) का आदेश जरूरी होगा। JMFC को भी जन्म या मृत्यु से जुड़ी जानकारी की सत्यता की जांच करनी होगी। इसके बाद ही निर्धारित शुल्क के भुगतान पर पंजीकरण की अनुमति दी जा सकेगी। दरअसल, सरकार का उद्देश्य देर से होने वाले पंजीकरण में फर्जी या गलत रिकॉर्डकी संभावना को कम करना और जन्म-मृत्यु के आधिकारिक आंकड़ों की विश्वसनीयता बढ़ाना है।वोटर लिस्ट से नाम हटने से 'नागरिकता' खत्म नहीं होती, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से समझिए पूरी बात
समय पर जरूरी कदम उठाना जरूरी
गौर करने वाली बात है कि ऐसे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जन्म या मृत्यु की सूचना आमतौर पर 21 दिनों के भीतर रजिस्ट्रार को देनी चाहिए। 21 दिन के भीतर रिपोर्ट करना सबसे सरल व्यवस्था है और सामान्यतः विलंब शुल्क नहीं लगता। 21 दिन के बाद भी पंजीकरण संभव है, लेकिन देरी बढ़ने के साथ अतिरिक्त अनुमति, दस्तावेज और शुल्क की जरूरत बढ़ती जाती है। इसके साथ ही आपकी परेशानी भी। इसलिए समय पर जरूरी कदम उठाएं।Disclaimer : यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है, व्यक्तिगत कानूनी सलाह नहीं। किसी वास्तविक विवाद या मसले में लागू और संशोधित कानूनी प्रावधानों की जांच और संबंधित दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर योग्य वकील से व्यक्तिगत राय लेना उचित है।
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