सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: रेल टिकट गुम हो जाने से मुआवजा खारिज मानना उचित नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि रेल दुर्घटना मे मृत या घायल यात्री के पास टिकट न मिलना मुआवजा खारिज करने का आधार नहीं हो सकता।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि रेल दुर्घटना में मृत या घायल यात्री के पास टिकट न मिलना मात्र मुआवजा खारिज करने का आधार नहीं हो सकता। यदि अन्य साक्ष्य यह साबित करते हैं कि पीड़ित वास्तविक यात्री था और दुर्घटना ट्रेन यात्रा के दौरान हुई, तो रेलवे यात्री को मुआवजा देने से इनकार नहीं कर सकता।
नई दिल्ली : कई बार रेल दुर्घटनाओं के होनो पर मुआवजे को लेकर अजीब स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसे हादसों में जहां व्यक्ति को खुद का ख्याल नहीं रहता, टिकट का ख्याल कैसे रखे...और टिकट न होने पर रेलवे मुआवजे से इंकार करता आया है। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर बड़ा फैसला देते हुए कहा है कि केवल टिकट का न मिलना मुआवजा अस्वीकार करने का पर्याप्त आधार नहीं है। न्यायालय ने माना कि रेलवे अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसकी व्याख्या तकनीकी आधार पर नहीं बल्कि न्यायसंगत और मानवीय दृष्टिकोण से की जानी चाहिए। वोटर लिस्ट से नाम हटने से 'नागरिकता' खत्म नहीं होती, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से समझिए पूरी बात
मामला जिसमें रेलवे ट्रिब्यूनल ने किया था मुआवजे से इंकार
मामला साल 2015 का है । जिसमें में मृतक की पत्नी ने दावा किया था कि उनके पति ट्रेन से गिरकर दुर्घटना का शिकार हुए थे। लेकिन रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल और बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि मृतक के पास टिकट नहीं मिला, इसलिए वह वास्तविक यात्री यानी रेलवे का बोनाफाईड पैसेंजर साबित नहीं हुआ। और मृतक के पत्नी के दावों को खारिज कर दिया गया था। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
रेलवे अधिनियम की धारा 124 ए का उद्देश्यदुर्घटना पीड़ितों को शीघ्र राहत देना है। यह कोई आपराधिक मुकदमा नहीं है, जहां संदेह से परे प्रमाण आवश्यक हो। रिकॉर्ड में उपलब्ध अन्य साक्ष्य मृतक की यात्रा और दुर्घटना की पुष्टि करते हैं। इसलिए केवल टिकट न मिलने के आधार पर मुआवजा अस्वीकार करना उचित नहीं।
जस्टिस संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह के बेंच की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने पलटा हाईकोर्ट और रेलवे ट्रिब्यूनल का फैसला
सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई जस्टिस संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने की।
मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना के बाद टिकट खो जाना या बरामद न होना असामान्य नहीं है। ऐसे मामलों में केवल टिकट की अनुपस्थिति के आधार पर दावा खारिज करना कानून की भावना के विपरीत होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रेलवे अधिनियम की धारा 124 ए का उद्देश्य दुर्घटना पीड़ितों को शीघ्र राहत देना है। यह कोई आपराधिक मुकदमा नहीं है, जहां संदेह से परे प्रमाण आवश्यक हो।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्य, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, पुलिस रिकॉर्ड, रेलवे जांच रिपोर्ट या अन्य दस्तावेज यह दर्शाते हैं कि मृतक या घायल ट्रेन का वास्तविक यात्री था, तो उसे मुआवजे का अधिकार मिलेगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि रेलवे दावा अधिकरण RCT को प्रत्येक मामले के तथ्यों का समग्र मूल्यांकन करना चाहिए। तकनीकी कमियों के आधार पर पीड़ित परिवार को राहत से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में उपलब्ध अन्य साक्ष्य मृतक की यात्रा और दुर्घटना की पुष्टि करते हैं। इसलिए केवल टिकट न मिलने के आधार पर मुआवजा अस्वीकार करना उचित नहीं था।
और फिर अंत में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेलवे अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है, इसलिए इसकी उदार और उद्देश्यपूर्ण व्याख्या की जानी चाहिए। साथ ही कोर्ट ने पीड़िता को आठ लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
रेलवे अधिनियम की धारा 124-ए की क्या है कानूनी भावना
इस अधिनियम के तहत यहां दावों का परीक्षण उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों की संभावना के आधार पर किया जाता है। अदालत ने कहा कि रेलवे केवल जांच संबंधी तकनीकी त्रुटियों या टिकट की अनुपस्थिति का सहारा लेकर मुआवजे के दावे को अस्वीकार नहीं कर सकता। यदि पहली नजर में ही यह स्थापित हो जाए कि व्यक्ति वैध यात्री था और दुर्घटना ट्रेन यात्रा के दौरान हुई, तो मुआवजे का अधिकार बनता है।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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