बिहार में विश्वविद्यालय कानून में बदलाव, सरकारी कॉलेजों पर क्या होगा असर?
विश्वविद्यालय कानून में बदलाव के परिणामस्वरूप सरकारी कॉलेजों में बड़े पैमाने पर बदलाव हो सकते हैं। इसके बाद से कई शिक्षक और छात्र अपनी नौकरियों और शिक्षा की सुरक्षा के लिए चिंतित हैं। पटना विश्वविद्यालय के कई विभाग अपनी स्वायत्तता की रक्षा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

सौजन्य से:- ETV Bharat
Explainer: 50 साल बाद बिहार में बदलेगा यूनिवर्सिटी कानून, सरकारी कॉलेजों पर क्या पड़ेगा असर?
बिहार सरकार आधी सदी पुराने कानूनों को बदलकर 'बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-2026' लाने की तैयारी में है. इसकी जरूरत क्यों पड़ी? कृष्णनंदन की रिपोर्ट..
Published : July 24, 2026 at 8:40 PM IST
पटना: बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था करीब 50 साल बाद सबसे बड़े कानूनी बदलाव की दहलीज पर खड़ी है. राज्य सरकार ने बिहार में विश्वविद्यालयों के संचालन के लिए अलग-अलग लागू 'बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम- 1976' और 'पटना विश्वविद्यालय अधिनियम- 1976' को समाप्त कर उनकी जगह 'एकीकृत बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम- 2026' लागू करने का प्रस्ताव तैयार किया है. फिलहाल यह प्रस्ताव राज्यपाल के अनुमोदन के लिए भेजा गया है, लेकिन अभी तक इसे मंजूरी नहीं मिली है. यही वजह है कि इसे मानसून सत्र में विधानसभा के पटल पर पेश नहीं किया जा सका.
उच्च शिक्षा में ऐतिहासिक बदलाव का प्रस्ताव: अब इस महत्वाकांक्षी कानून का भविष्य राज्यपाल के फैसले और सरकार की अगली रणनीति पर टिका है. यदि समय रहते अनुमोदन मिल जाता है तो सरकार इसे विधानसभा के शीतकालीन सत्र में पेश कर सकती है. वहीं, जरूरत पड़ने पर कैबिनेट की मंजूरी के बाद अध्यादेश के जरिए भी इसे लागू करने का विकल्प सरकार के पास मौजूद है.
अध्यादेश का विकल्प और विरोध: प्रस्तावित कानून को लेकर विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, सरकारी डिग्री कॉलेजों के नियंत्रण और उच्च शिक्षा व्यवस्था में होने वाले व्यापक बदलाव पर बहस तेज हो गई है. बात करें पटना विश्वविद्यालय की तो यहां के कर्मचारी शिक्षक और छात्र सभी इसका विरोध कर रहे हैं. इस संबंध में वह कई प्रकार की चिंताएं प्रकट कर रहे हैं.
'नए अधिनियम को लेकर कई चिंताएं': पटना विश्वविद्यालय के पटना कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. उदय शंकर ने बताया कि नए अधिनियम को लेकर कई चिंताएं हैं. इसका प्रारूप अभी तक सामने नहीं आया है, लेकिन जो बात निकाल कर आ रही है वह यह है कि विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव नहीं होंगे.
"विश्वविद्यालय के शिक्षक चुनाव नहीं लड़ सकते हैं. ऐसा होता है तो बहुत ही गलत होगा क्योंकि वर्तमान समय में नवल किशोर यादव, नीरज कुमार जैसे कई माननीय सदस्य सदन के हैं, जो विश्वविद्यालय में शिक्षक होते हुए चुनाव लड़े हैं. अभी यह मामला ही पूरी तरीके से अस्पष्ट है."-डॉ. उदय शंकर, मनोविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष, पटना कॉलेज
'PU के कानून में न हो बदलाव': उन्होंने कहा कि पटना विश्वविद्यालय में बहुत सारे डिपार्टमेंट है जो देश में सबसे पहले यहीं शुरू हुए. उनके मनोविज्ञान विभाग की ही बात करें तो यह देश का तीसरा सबसे पुराना मनोविज्ञान विभाग है. इसके अलावा सबसे पुराना और देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालय में एक है और इसके लिए एक अलग कानून है. उसे खत्म करना पूरी तरीके से इसकी स्वायत्तता और पहचान पर आघात है. वह चाहते हैं कि पटना विश्वविद्यालय के लिए जो कानून है उसमें कोई बदलाव न हो, कंपटीशन में अधिक अंक लाने वाले को ही पटना विश्वविद्यालय मिलता है.
'पटना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता रखी गई बरकरार': पटना लॉ कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. वीरेंद्र पासवान ने बताया कि साल 1917 में पटना विश्वविद्यालय स्थापित हुआ और उसे समय संपूर्ण बिहार समेत नेपाल और उड़ीसा के भी कॉलेज पटना विश्वविद्यालय से संचालित होते थे. वर्षों बाद 1976 में बिहार के विश्वविद्यालयों को नियंत्रित करने के लिए एक कानून बना और उस समय पटना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता बरकरार रखी गई. लेकिन अब नए अधिनियम के तहत पटना विश्वविद्यालय को भी राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है.
"अभी कई डिग्री कॉलेज जो खुले हैं, वहां जिन शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति हुई है. वह अपने कॉलेज में विभागाध्यक्ष थे, लेकिन जहां गए हैं वहां बीईओ और डीईओ परेशान कर रहे हैं जो सेवा के वरीयता के नियमावली के खिलाफ है. नई नियमावली में सेवा की वरीयता और कैडर के अनुरूप प्रमोशन में काफी पेंच है."- डॉ. वीरेंद्र पासवान, प्रोफेसर, पटना लॉ कॉलेज
चलाया जा रहा हस्ताक्षर अभियान: उन्होंने कहा कि इसके अलावा स्नातक तक की शिक्षा को यूनिवर्सिटी से अलग करने की कोशिश की जा रही है. साथ ही पटना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को खत्म भी किया जा रहा है. इसी को लेकर वह एक हस्ताक्षर अभियान भी चला रहे हैं कि पटना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता बरकरार रखी जाए. उसपर सभी शिक्षक कर्मचारी और छात्र इसपर हस्ताक्षर कर रहे हैं और दो बैनर पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं. एक बैनर राज्यपाल को दिया जाएगा और एक मुख्यमंत्री को दिया जाएगा.
प्राइवेट यूनिवर्सिटी को लेकर विधेयक पास: पटना वाणिज्य महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. सुहेली मेहता ने बताया कि बिहार विश्वविद्यालय अधिनियम 2026 अभी प्रस्तावित है जो 1976 के एक्ट को पूरी तरह बदल देगा. अभी यह बिहार विधानसभा के पटल पर नहीं आया है और बीते दिनों कुछ विधेयक पास हुए तो वह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संबंधित कॉलेज और प्राइवेट कॉलेज को लेकर हुए. कॉलेज के शिक्षकों ने बिहार विश्वविद्यालय अधिनियम 2026 का कड़ा विरोध किया है, जिसके कारण इस बार सदन में यह पेश नहीं हुआ.
"इस अधिनियम में कई कमियां है और बिना किसी के साथ कोई चर्चा किये अधिनियम का मसौदा तैयार किया गया है. इसे काफी छुपा कर तैयार किया गया और जब इसकी जानकारी हम लोगों को मिली तो विरोध दर्ज करना शुरू किया गया है."- प्रो. सुहेली मेहता,पटना वाणिज्य महाविद्यालय की प्राचार्या
क्या होगा असर?: नए कानून का क्या असर होगा इसपर प्रोफेसर डॉ. सुहेली मेहता ने कहा, इस अधिनियम के माध्यम से विश्वविद्यालय को कुलपति और कुलाधिपति के अधीन न रखकर, इसे सरकार के अधीन करने की कोशिश की जा रही है. स्नातक तक की शिक्षा जब विश्वविद्यालय से अलग हो जाएगा तो विश्वविद्यालय की शिक्षा की गुणवत्ता में भी कमी आएगी और प्राइवेट इंस्टीट्यूशन का बोलबाला बढ़ जाएगा.
डॉ. सुहेली मेहता ने कहा कि पटना साइंस कॉलेज के कैंपस में जब 12वीं की पढ़ाई होती थी तो वहां से बच्चे आईआईटी और मेडिकल के लिए क्वालीफाई करते थे. लेकिन जब यह अलग हुआ तो बच्चों को आईआईटी और मेडिकल के कंपटीशन क्वालीफाई करने के लिए प्राइवेट कोचिंग इंस्टिट्यूट का सहारा लेना पड़ रहा है.
अगर स्नातक की शिक्षा को सरकार अपने अधीन कर लेती है तो शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा. कुछ लोग सरकार को गुमराह करके इस प्रकार का अधिनियम लाना चाहते हैं. हमलोग सरकार को सचेत कर रहे हैं कि विश्वविद्यालय के शिक्षकों और पदाधिकारियों से इस संबंध में पहले बात करें. विश्वविद्यालय के सभी शिक्षक राज्य के उच्च शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए हर संभव कोशिश के लिए तैयार हैं.
पटना विश्वविद्यालय के जूलॉजी के प्रोफेसर और पूर्व डीन स्टूडेंट वेलफेयर प्रो. डॉ अनिल कुमार ने कहा कि साल 1976 में विश्वविद्यालय को नियंत्रित करने के लिए जो अधिनियम आया, वह दो तरह का था. एक पटना विश्वविद्यालय के लिए अलग और दूसरा बिहार के बाकी विश्वविद्यालय के लिए था. इसमें यह है कि पटना विश्वविद्यालय रेजिडेंशियल यूनिवर्सिटी है और इसके अपने 11 कॉलेज हैं और यह किसी अन्य कॉलेज को एफीलिएशन (मान्यता) नहीं दे सकता. इसके हर कॉलेज के छात्रावास हैं. वही जो अन्य यूनिवर्सिटी राज्य के हैं, वह एफिलिएटिंग यूनिवर्सिटी है, यानी वह अन्य कॉलेज को अपनी मान्यता दे सकते हैं.
"अभी जो राज्य में विश्वविद्यालय के संचालन का नियम है उसके तहत पटना विश्वविद्यालय के कर्मचारी और शिक्षक सिर्फ पटना विश्वविद्यालय के अधीन कॉलेज में ही स्थानांतरित हो सकते हैं. जबकि बिहार के अन्य विश्वविद्यालय के शिक्षक और कर्मचारी राज्य के किसी भी विश्वविद्यालय में स्थानांतरित हो सकते हैं."- प्रो. डॉ अनिल कुमार,पटना विश्वविद्यालय के जूलॉजी के प्रोफेसर
'वेतन की नहीं होती समस्या': उन्होंने आगे कहा, पटना विश्वविद्यालय के पास यह अधिकार है कि अपने शिक्षकों और कर्मचारियों का वेतन वह अपने कोष से दे सकता है, इसलिए यहां वेतन की कई समस्या नहीं रहती. इसका एक समृद्ध इतिहास है जिसके कारण इससे जुड़ना लोगों का सपना होता है. इसलिए इसकी स्वायत्तता जरूरी है.
नए कानून से क्या-क्या बदल जाएगा?: नए कानून से होने वाले बदलावों पर डॉ. अनिल कुमार ने कहा कि इस अधिनियम के तहत सरकार सभी डिग्री कॉलेज को अपने अधीन लेने की कोशिश कर रही है. विश्वविद्यालय की शिक्षा से स्नातक पाठ्यक्रम को अलग करने की बात है. इस अधिनियम को लेकर जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार विश्वविद्यालय के जिम्में सिर्फ स्नातकोत्तर की शिक्षा और रिसर्च का हीं काम रहेगा. स्नातक पाठ्यक्रम के लिए परीक्षा का आयोजन विश्वविद्यालय को कराना होगा लेकिन इस पाठ्यक्रम पर विश्वविद्यालय के कुलपति के बजाय सीधे राज्य सरकार का हस्तक्षेप होगा.
'यूनिवर्सिटी का वजूद क्या होगा?': उन्होंने कहा कि यह सभी चर्चाएं ही चल रही हैं क्योंकि अभी तक मसौदा प्राप्त नहीं हुआ है और अंदरूनी सूत्रों से यह जानकारी मिल रही है. ऐसे में चिंता यह है कि कॉलेज को यूनिवर्सिटी से अलग कर देंगे तो यूनिवर्सिटी का वजूद क्या होगा? पटना कॉलेज और पटना साइंस कॉलेज का जब भी नाम आता है तो सभी समझ जाते हैं कि पटना यूनिवर्सिटी की बात हो रही है. लेकिन यह जब कॉलेज ही नहीं रहेंगे तो यूनिवर्सिटी का अस्तित्व ही क्या बचेगा.
'एक ही यूनिवर्सिटी होने से सुगमता': इस पूरे मसले पर ए एन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज के समाजशास्त्री प्रोफेसर डॉ बीएन प्रसाद का कहना है कि स्कूली शिक्षा के बाद जब उच्च शिक्षा का प्रारंभ होता है तो वह पूरी समग्रता के साथ होनी चाहिए. स्नातक से लेकर स्नातकोत्तर और रिसर्च के लिए एक ही यूनिवर्सिटी में मौका मिले तो उससे बच्चों को सुगमता मिलती है.
"एक तारतम्यता बनी रहती है. लेकिन स्नातक शिक्षा को विश्वविद्यालय से अलग करने की योजना है तो इस पर पहले व्यापक विमर्श की आवश्यकता है. एक ही कॉलेज में आधा हिस्सा यानी स्नातक तक की पढ़ाई सरकार के अधीन हो जाएगी और स्नातकोत्तर की पढ़ाई यूनिवर्सिटी के अधीन होगी तो यह दो व्यवस्था हो जाएगी. यह विचार करने की आवश्यकता है कि कहीं इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न ना हो जाए."- प्रोफेसर डॉ बीएन प्रसाद, ए एन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज के समाजशास्त्री
प्रो. डॉ अनिल कुमार कहा कि कुछ संस्थाओं को स्वायत्तता की चिंता है. ऐसे में यह भी समझना होगा कि आपको स्वायत्तता का अधिकार मिला है तो आपकी जिम्मेदारी भी कुछ है और आप अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करेंगे तो अधिकार छीन लिए जाएंगे. स्वायत्तता के नाम पर उच्च शिक्षा में जो चीजें घटित हो रही है वह समाज के लिए सही नहीं है.
विश्वविद्यालय और उनके कॉलेज शिक्षा की बजाय राजनीति का अड्डा बनते जा रहा है. इस मसले पर शिक्षकों की जो प्रमुख चिंता हो रही है कि उनका कैडर छीन जाना. इस पर सरकार को गंभीरता से विचार करना होगा कि उनका कैडर आगे कैसे बरकरार रहेगा. जहां तक स्वायत्तता की चिंता है तो शिक्षकों को अपने कर्तव्यों का निर्वहन जिम्मेदारी पूर्वक करना होगा.
इस नए कानून की जरूरत क्यों पड़ी?: वहीं, इस मसले पर उच्च शिक्षा विभाग के मंत्री संजय टाइगर का कहना है कि बीते 50 वर्षों में समय काफी बदला है. शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी बदलाव हुए हैं. ऐसे में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पुराने नियमों के बजाय एक नए नियम की आवश्यकता पड़ रही है. उन्होंने कहा कि वह सरकारी कॉलेजों का पूरा वित्तीय भार उठाती है, लेकिन प्रशासनिक नियंत्रण विश्वविद्यालयों के पास होने से जवाबदेही और गुणवत्ता सुधार में दिक्कत आती है. नए कानून से कॉलेजों में नियमित पढ़ाई, शिक्षकों की जवाबदेही और प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी.
हालांकि, नए अधिनियम के तहत डिग्री कॉलेज के शिक्षकों पर क्या सेवा आचरण नियमावली लागू होगी और वह चुनाव लड़ने से वंचित हो जाएंगे, इस पर उन्होंने कहा कि वह इस पर कुछ नहीं कह सकते हैं. मसौदा अभी राज्यपाल के पास है और समय पर सब कुछ क्लियर हो जाएगा.
"यह चिंता की बात है कि विश्वविद्यालय के कई शिक्षक जब माननीय बनते हैं तो वह वेतन यूनिवर्सिटी से उठाते हैं, क्योंकि वहां वेतन अधिक होता है और भत्ता सदन से लेते हैं. ऐसा नहीं चलेगा. जहां से वेतन लेंगे, वहीं का भत्ता लेना होगा."- संजय टाइगर,उच्च शिक्षा विभाग के मंत्री
बिहार का प्रस्तावित विश्वविद्यालय अधिनियम 2026 राज्य की उच्च शिक्षा को बिल्कुल एक नई दिशा में ले जाने की क्षमता रखता है. आधी सदी पुराने कानून को बदलकर सरकार प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त और लेट सेशन को नियमित करना चाहती है. हालांकि इस बड़े बदलाव के रास्ते में स्वायत्तता खोने का डर और शिक्षकों का भारी विरोध सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है.
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