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बिलासपुर लोकअदालत ने बिना समझौते के मुआवजा केस बंद किया, ठेकेदार को दायित्व से मुक्त; हाईकोर्ट ने आदेश रद्द कर लेबर कोर्ट को नई सुनवाई का निर्देश

लोकअदालत ने CSPDCL‑अभिनव तिवारी के विवाद को समझौते के अभाव में समाप्त कर ठेकेदार को मुआवजे की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। हाईकोर्ट ने यह आदेश अवैध बताया, इसे रद्द कर लेबर कोर्ट को पाँच माह के भीतर पुनः सुनवाई कर निर्णय देने का निर्देश दिया।

16 सितंबर 2026 को 06:04 am बजे
बिलासपुर लोकअदालत ने बिना समझौते के मुआवजा केस बंद किया, ठेकेदार को दायित्व से मुक्त; हाईकोर्ट ने आदेश रद्द कर लेबर कोर्ट को नई सुनवाई का निर्देश

सौजन्य से:- bhaskar.com

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लोक-अदालत ने बिना समझौता के बंद किया केस:ठेकेदार को मुआवजे की जिम्मेदारी से किया मुक्त, हाईकोर्ट बोला-मुकदमों के गुण-दोष पर फैसला सुनाने का अधिकार नहीं

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बिलासपुर में आयोजित लोक अदालत में बिना किसी समझौते के मुआवजा प्रकरण के एक केस को बंद कर दिया और दोषी ठेकेदार को मुआवजे की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। इस फैसले के खिलाफ राज्य विद्युत मंडल (CSPDCL) की याचिका पर हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने कहा कि लोक अदालत का कार्यक्षेत्र केवल दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति या समझौते के आधार पर विवाद को सुलझाना है। यदि कोई समझौता नहीं होता है, तो मामले को वापस संबंधित कोर्ट में भेजना होता है। हाईकोर्ट ने मामले में लेबर कोर्ट को दोबारा सुनवाई कर पांच माह के भीतर निर्णय देने के आदेश दिए गए हैं।

दरअसल, पूरा मामला CSPDCL से जुड़ा हुआ है। CSPDCL ने बिजली मेंटनेंस सहित अन्य काम के लिए अभिनव तिवारी को ठेका दिया था। ठेकेदार ने छोटू उर्फ शत्रुहन नाम के युवक को ठेके में नौकरी पर रखा था। साल 2012-13 में काम करते समय करंट की चपेट में आने से छोटू की मौत हो गई थी।

मुआवजा के लिए परिजनों ने ली लेबर कोर्ट की शरण जिसके बाद मृतक के माता-पिता ने कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत 9 लाख 880 रुपए के मुआवजे की मांग करते हुए लेबर कोर्ट में दावा पेश किया था। CSPDCL ने यह राशि कोर्ट में जमा कर दी थी। लेकिन, विरोध दर्ज कराते हुए कहा था कि असल जिम्मेदारी ठेकेदार अभिनव तिवारी की है और यह रकम उसी से वसूली जानी चाहिए। जबकि, ठेकेदार ने मृतक को अपना कर्मचारी मानने और मुआवजा देने से साफ इनकार कर दिया था।

लोक अदालत ने बिना समझौते के ठेकेदार को दी थी राहत CSPDCL और ठेकेदार के बीच यह विवाद लेबर कोर्ट में चल रहा था। इस बीच ठेकेदार ने केस को लोक अदालत में लगाया। जिसमें परिजनों ने कहा कि चूंकि मुआवजा राशि जमा हो गई है, इसलिए वे मामले को मेरिट पर आगे नहीं बढ़ाना चाहते। इसके बाद 6 दिसंबर 2014 को लोक अदालत ने बिना किसी समझौते के केस को बंद करते हुए ठेकेदार को मुआवजे की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया।

CSPDCL ने लोक अदालत के फैसले को दी चुनौती इधर, बिना किसी समझौते के केस खत्म करने और ठेकेदार को राहत देने के खिलाफ CSPDCL ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। इसमें बताया गया कि लोक अदालत ने CSPDCL का पक्ष सुने बगैर एकपक्षीय आदेश जारी किया है, यह अवैधानिक है।

सहमति के बगैर ठेकेदार को दायित्व से मुक्त करना गलत हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद CSPDCL की अपील मंजूर करते हुए कहा कि जब तक सभी पक्षों में आम सहमति न हो लोक अदालत ठेकेदार को दायित्व से मुक्त नहीं कर सकती। हाईकोर्ट ने CSPDCL के खिलाफ पारित एकतरफा आदेश और लोक अदालत के वर्ष 2014 में जारी अवार्ड को रद्द कर दिया है। लेबर कोर्ट को मामले की दोबारा सुनवाई कर 5 महीने के भीतर कानून के अनुसार फैसला देने का निर्देश दिया गया है।

केवल दो पक्षों के बीच समझौता और विवाद सुलझाने का मंच है लोक अदालत लोक अदालत वैकल्पिक विवाद समाधान का प्रभावी सिस्टम है। इसका मुख्य उद्देश्य अदालतों में लंबित मामलों या मुकदमेबाजी से पहले यानी प्री-लिटिगेशन के विवादों को शांतिपूर्ण, सौहार्दपूर्ण और आपसी सहमति के आधार पर सुलझाना है। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत लोक अदालतों को वैधानिक दर्जा हासिल है। लोक अदालतों के फैसले सिविल कोर्ट की डिक्री के समान माने जाते हैं और वे सभी पक्षों पर अंतिम रूप से बाध्यकारी होते हैं, जिसके खिलाफ किसी भी अदालत में अपील नहीं की जा सकती है। लोक अदालत का काम मुकदमों के गुण-दोष पर फैसला सुनाना या किसी को दोषी ठहराना नहीं है, बल्कि यह केवल दोनों पक्षों के बीच राजीनामा और समझौता कराना है। यदि पक्षों के बीच आपसी सहमति नहीं बनती है, तो मामले को वापस संबंधित कोर्ट में नियमित सुनवाई के लिए भेज दिया जाता है।

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