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आज़म ख़ान की यूनिवर्सिटी के तोड़ने के फ़ैसले के पीछे प्रशासन की मांग और विपक्ष की आलोचना

उत्तर प्रदेश के रामपुर विकास प्राधिकरण ने जौहर यूनिवर्सिटी में 38 इमारतों को गिराने का आदेश दिया है, जिसके पीछे कारण नक़्शा पास न कराना बताया गया है। इस आदेश के बाद समाजवादी पार्टी के नेताओं ने इसे द्वेषपूर्ण बताया है।

18 जुलाई 2026 को 02:13 am बजे
आज़म ख़ान की यूनिवर्सिटी के तोड़ने के फ़ैसले के पीछे प्रशासन की मांग और विपक्ष की आलोचना

सौजन्य से:- BBC

आज़म ख़ान: जौहर यूनिवर्सिटी को गिराने के फ़ैसले के पीछे प्रशासन क्या कारण बता रहा है?

- Author, प्रेरणा

- पदनाम, बीबीसी संवाददाता

- प्रकाशित

- पढ़ने का समय: 7 मिनट

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म ख़ान ने आज से लगभग दो दशक पहले अपने गृह ज़िले रामपुर में, जिस यूनिवर्सिटी की नींव रखवाई थी, उसे तोड़ने की तैयारी चल रही है.

रामपुर विकास प्राधिकरण ने मोहम्मद अली जौहर नाम की इस यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को गिराने का आदेश पारित किया है. आदेश के पीछे का कारण नक़्शा पास करवाए बिना निर्माण करवाना बताया गया है.

रामपुर विकास प्राधिकरण का कहना है कि विश्वविद्यालय परिसर में कुल 40 इमारतें हैं, जिनमें से 38 का निर्माण बिना स्वीकृत नक़्शा पास कराए किया गया.

प्राधिकरण के अनुसार, इन इमारतों को लेकर पहले नोटिस जारी किया गया था और 15 दिन का समय भी दिया गया था. समयसीमा पूरी होने के बाद अब तोड़ने की तैयारी की जा रही है.

भवन कब गिराए जाने हैं, इस सवाल पर रामपुर के ज़िलाधिकारी अजय कुमार द्विवेदी ने मीडिया से कहा, ''तोड़ने से पहले पंद्रह दिन का वक़्त दिया जाता है, ताकि ख़ुद इसे गिरा दें. अगर ऐसा नहीं किया जाता तो प्रशासन उसे गिरा देगा.''

प्रशासन के इस आदेश के बाद बीते रोज़ आज़म ख़ान की पत्नी और पूर्व विधायक डॉक्टर तज़ीन फ़ातिमा यूनिवर्सिटी पहुँचीं और परिसर के अंदर मौजूद पुलिसकर्मियों को बाहर जाने का आदेश दिया.

मीडिया से बात करते हुए तज़ीन फ़ातिमा ने कहा, ''हमें पंद्रह दिन का समय दिया गया है. अभी हम और कुछ नहीं कहना चाहते.''

माना जा रहा है कि आज़म ख़ान का परिवार इस आदेश के ख़िलाफ़ इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख़ कर सकता है. इस संभावना को ध्यान में रखते हुए रामपुर विकास प्राधिकरण ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में कैविएट दाखिल की है. मतलब ये है कि अगर विश्वविद्यालय अदालत से राहत मांगता है, तो अदालत पहले आरडीए का पक्ष सुने बिना कोई अंतरिम आदेश नहीं दे सकेगी.

इस बीच तमाम विपक्षी नेता रामपुर प्रशासन के इस फ़ैसले को द्वेषपूर्ण बता रहे हैं.

क्या कह रही हैं विपक्षी पार्टियां?

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा है, ''बीजेपी को शिक्षा में भी सांप्रदायकिता नज़र आती है. शिक्षा, शिक्षक, शिक्षार्थी और शिक्षा के बाद मिलनेवाली नौकरी बीजेपी के एजेंडे में है ही नहीं. बीजेपी अनरजिस्टर्ड संगी-साथियों के अवैधानिक भवनों को कब ढहाएगी? जब संगी-साथी ही रजिस्टर्ड नहीं हैं, तो उनके भवन, कार्यालय, संस्थान कैसे जायज़ होंगे?''

कांग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने बीजेपी सरकार पर निशाना साधते हुए लिखा, ''नक़्शा तो इस देश की किसी यूनिवर्सिटी का पास नहीं है तो क्या सारे विश्वविद्यालयों पर बुलडोज़र चला दोगे? नक़्शा तो इस देश के ज़्यादातर डीएम ऑफिस का भी नहीं पास होगा तो क्या सब को ज़मींदोज़ कर दोगे?''

सरकार की दलील

उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने कहा है कि उनकी सरकार क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है.सरकार सुनिश्चित करेगी कि हर स्तर पर क़ानून व्यवस्था बनी रहे और कहीं कोई अवैध काम न हो.

पर आज़म ख़ान के समर्थकों और समाजवादी पार्टी के नेताओं का कहना है कि जिन इमारतों को लेकर नोटिस जारी किया गया है, उनका निर्माण उस समय हुआ था, जब यह इलाक़ा रामपुर विकास प्राधिकरण (आरडीए) के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था.

उनका तर्क है कि उस समय यह क्षेत्र ज़िला पंचायत के अधीन था और आरडीए का अधिकार क्षेत्र बाद में बढ़ाया गया. इसलिए मौजूदा नियमों के आधार पर पुराने निर्माणों को अवैध नहीं माना जा सकता.

प्रशासन भी इस बात को स्वीकार कर रहा है कि विश्वविद्यालय जिस क्षेत्र में स्थित है, वह पहले ज़िला पंचायत के अधिकार क्षेत्र में आता था, लेकिन साल 2024 में इसे रामपुर विकास प्राधिकरण के अधीन कर दिया गया.

प्रशासन का कहना है, ''जिन भवनों के ख़िलाफ़ नोटिस जारी हुए हैं, उनका नक़्शा ज़िला पंचायत की तरफ़ से भी पास नहीं करवाया गया था.

''केवल दो भवन हैं, जिनके नक़्शे ज़िला पंचायत से स्वीकृत हैं. इससे स्पष्ट होता है कि उन्हें नियम क़ानूनों की जानकारी थी पर बाकि के 38 भवनों के नक़्शे स्वीकृत नहीं कराए गए. इसलिए आरडीए ने ध्वस्तीकरण का आदेश पारित किया है.''

ऐसे में सवाल है कि यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों का क्या होगा.

छात्रों के भविष्य पर सवाल

उपलब्ध जानकारियों के मुताबिक़ मौजूदा समय में यूनिवर्सिटी में तक़रीबन तीन हज़ार छात्र पढ़ाई करते हैं. ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के बीच प्रशासन ने इन छात्रों के लिए उच्च शिक्षा विभाग के शिक्षकों की एक टीम तैनात की है.

विश्वविद्यालय के मुख्य प्रवेश द्वार पर छात्र परामर्श केंद्र बनाया गया है. प्रशासन के मुताबिक़, यहां छात्रों की काउंसलिंग की व्यवस्था की गई है. छात्रों को यहां पढ़ाई और आगे की व्यवस्था से जुड़ी जानकारी दी जा रही है. राजकीय रज़ा डिग्री कॉलेज, रामपुर के प्रोफेसर अरशद रिज़वी भी इस टीम का हिस्सा हैं.

उनका कहना है, ''प्रशासन ने रज़ा पीजी कॉलेज और गवर्नमेंट पीजी कॉलेज के प्रिंसिपल को निर्देश दिया था कि आप कैंप लगाएं और अगर बच्चों को किसी तरह की घबराहट हो रही है तो उनकी काउंसलिंग करें. उन्हें बताएं और गाइड करें कि उनका भविष्य अंधकारमय नहीं होगा. उन्हें ये भी बताएं कि उनको कहां कहां एडमिशन मिल सकता है.''

यूनिवर्सिटी की वेबसाइट के मुताबिक़ इसका परिसर 250 एकड़ से ज़्यादा क्षेत्र में फैला है. यहां साइंस, आर्ट्स, लॉ, एजुकेशन, कॉमर्स, इंजीनियरिंग, फार्मेसी, पैरामेडिकल, नर्सिंग और कृषि से जुड़े कई कोर्स में पढ़ाई होती है और क़रीब 90 शिक्षक यहां पढ़ाते हैं.

आज़म ख़ान का ड्रीम प्रोजेक्ट

आज़म ख़ान कई मौक़ों पर जौहर यूनिवर्सिटी को अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सपना बताते रहे हैं. वह यूनिवर्सिटी के लाइफ़टाइम प्रो-चांसलर हैं.

विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर चांसलर के संदेश में उन्होंने लिखा है, ''बहुत कम लोगों को अपने जीवनकाल में अपने सपनों को सच होते देखने का अवसर मिलता है और वह ख़ुद को ऐसे लोगों में मानते हैं.''

उन्होंने लिखा कि यह विश्वविद्यालय स्वतंत्रता सेनानी मौलाना मोहम्मद अली जौहर को श्रद्धांजलि है और इसका उद्देश्य उन छात्रों तक उच्च शिक्षा पहुँचाना है, जिन्हें सामाजिक, आर्थिक या भौगोलिक कारणों से पढ़ाई का अवसर नहीं मिल पाता.

2006 में यूनिवर्सिटी के शिलान्यास के दौरान भी उन्होंने कहा था कि इस संस्थान को खड़ा करने में उन्हें कई बाधाओं का सामना करना पड़ा, जबकि बाद के वर्षों में भी वे इसे लगातार अपना "ड्रीम प्रोजेक्ट" बताते रहे.

यूनिवर्सिटी की स्थापना उत्तर प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी अधिनियम, 2005 (उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्या 19, 2006) के तहत हुई थी, जिसे 16 जून 2006 को राज्यपाल की मंजूरी मिली थी.

उस समय उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और आज़म ख़ान उनकी कैबिनेट में नगर विकास एवं संसदीय कार्य मंत्री थे.

इसी वर्ष 18 सितंबर को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने रामपुर में विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी थी, जबकि 2012 में अखिलेश यादव सरकार के दौरान विश्वविद्यालय का औपचारिक उद्घाटन हुआ और शैक्षणिक गतिविधियां शुरू हुईं.

हालांकि आज़म ख़ान चाहते थे कि यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटी का दर्जा मिले. पर इसके लिए विश्वविद्यालय अधिनियम में संशोधन की ज़रूरत थी. प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी, संशोधन विधेयक विधानसभा से आसानी से पारित हो गया.

लेकिन प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल बी.एल. जोशी ने विधेयक पर तुरंत हस्ताक्षर नहीं किए. तब आज़म ख़ान ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था कि राजभवन जानबूझकर फाइल रोक रहा है और इसके पीछे कांग्रेस का दबाव है.

बाद में विधेयक पर मंज़ूरी मिली और विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक विश्वविद्यालय का दर्जा मिल गया.

यूनिवर्सिटी पर पहले भी उठते रहे सवाल

अब प्रशासन ने यूनिवर्सिटी की 38 भवनों को गिराने का आदेश जारी कर दिया है, लेकिन यह पहली बार नहीं है, जब आज़म ख़ान के इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर सवाल उठे हैं.

उत्तर प्रदेश में 2017 में बीजेपी की सरकार बनने के बाद आज़म ख़ान और जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े कई मामलों की जांच शुरू हुई और बाद के वर्षों में इस सिलसिले में कई एफ़आईआर भी दर्ज की गईं. कई मामले अदालत तक भी पहुँचे.

मसलन, जुलाई 2019 में किसानों की शिकायतों के आधार पर विश्वविद्यालय के विस्तार के लिए कथित ज़मीन कब्ज़ाने को लेकर आज़म ख़ान के ख़िलाफ़ कई एफ़आईआर दर्ज हुईं.

आज़म ख़ान और उनके परिवार ने इन आरोपों से इनकार किया है. इन मामलों की सुनवाई अभी अलग-अलग अदालतों में चल रही है.

दूसरा प्रमुख मामला शत्रु संपत्ति से जुड़ा है. सरकार का आरोप है कि क़रीब 13.84 हेक्टेयर शत्रु संपत्ति को भी जौहर यूनिवर्सिटी की सीमा में शामिल करने की कोशिश की गई. इस मामले में आज़म ख़ान, जौहर ट्रस्ट और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज हुए. मामले का ट्रायल अभी जारी है.

प्रशासन ने यूनिवर्सिटी पर कुछ सरकारी ज़मीनों पर भी क़ब्ज़ा करने का आरोप लगाया है. इस मामले में भी अभी आख़िरी फ़ैसला आना बाकी है.

समाजवादी पार्टी इन कार्रवाइयों को राजनीतिक प्रतिशोध बताती रही है, जबकि राज्य सरकार का कहना रहा है कि कार्रवाई क़ानून के अनुरूप की गई है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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