224 दिन तक कोर्ट नहीं पहुंची बुजुर्ग महिला, उम्र और गरीबी का दिया बहाना, हाईकोर्ट ने ढंग से समझा दिया कानून
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल गरीबी, बुढ़ापा या कानून की अज्ञानता अदालत में अपील करने में हुई लंबी देरी को सही नहीं ठहरा सकती। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की बेंच ने 224 दिन की देरी से दाय…

सौजन्य से:- Navbharat Times
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल गरीबी, बुढ़ापा या कानून की अज्ञानता अदालत में अपील करने में हुई लंबी देरी को सही नहीं ठहरा सकती। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की बेंच ने 224 दिन की देरी से दायर की गई क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन को खारिज कर दिया।
रायपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया और कानून की स्पष्टता को लेकर एक बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। अदालत ने अपने एक फैसले में साफ कर दिया है कि गरीबी, बुढ़ापा या कानून की जानकारी का अभाव किसी भी पक्षकार को अदालत में आने में हुई लंबी देरी को सही ठहराने का अधिकार नहीं देता है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने एक 51 वर्षीय महिला की याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। महिला ने अपनी क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन दाखिल करने में 224 दिन की देरी को माफ करने की गुहार लगाई थी, जिसे अदालत ने नामंजूर कर दिया।
क्या था पूरा मामला और महिला का तर्क?
राजनांदगांव की रहने वाली 51 साल की एक महिला ने 31 जनवरी 2024 के एक आदेश को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याचिका दाखिल करने में 224 दिन की भारी देरी हो चुकी थी। महिला के वकील की ओर से दलील दी गई थी कि उनकी मुवक्किल एक गृहिणी हैं, बुजुर्ग हैं और पूरी तरह अपने बच्चों पर निर्भर थीं। इसके अलावा परिवार वित्तीय और मेडिकल समस्याओं से जूझ रहा था, जिस वजह से कानूनी सहायता जुटाने में अतिरिक्त समय लग गया।
पर्याप्त कारण का मतलब एक ऐसा ठोस और संतोषजनक कारण है, जिसने वास्तव में किसी litigant को तय सीमा के भीतर अदालत का दरवाजा खटखटाने से रोका हो।
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश , रामकुमार चौधरी मामला
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का दिया गया हवाला
याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मध्य प्रदेश राज्य बनाम रामकुमार चौधरी मामले के फैसले का हवाला दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि 'पर्याप्त कारण' (Sufficient Cause) का मतलब एक ऐसा ठोस कारण होता है जो वास्तव में व्यक्ति को समय पर कोर्ट आने से रोकता है। जस्टिस रमेश सिन्हा ने कहा कि देरी माफ करने का विवेक न्यायिक तरीके से और प्रत्येक मामले की परिस्थितियों को देखकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जहां लापरवाही, अकर्मण्यत या स्पष्टता की कमी हो, वहां 'पर्याप्त कारण' की उदार व्याख्या नहीं की जा सकती।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 224 दिन की देरी को "बेहद गंभीर और अत्यधिक" माना।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की बेंच ने महिला की याचिका को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि लिमिटेशन कानून पब्लिक पॉलिसी पर आधारित है जो मुकदमों में निश्चितता तय करता है।
गरीबी और बुढ़ापा अकेले अदालत में देरी को उचित नहीं ठहरा सकते।
लापरवाही और उदासीनता बरतने पर कानून में कोई विशेष रियायत नहीं दी जा सकती।
कानून और न्याय में निश्चितता का महत्व
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि लिमिटेशन एक्ट (सीमा अधिनियम) का निर्माण एक सार्वजनिक नीति के तहत किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अदालती मामलों में अनिश्चितता का माहौल न रहे और मुकदमों का एक निश्चित समय सीमा में निपटारा हो सके। 224 दिनों की देरी को 'ग्रॉसली इनॉर्डिनेट' (अत्याधिक और अस्वीकार्य) बताते हुए अदालत ने माना कि याची द्वारा दिए गए कारण पर्याप्त नहीं थे।
लेखक के बारे मेंआकाश सिकरवारआकाश सिकरवार नवभारतटाइम्स.कॉम की मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ डिजिटल टीम में बतौर कंसल्टेंट कार्यरत हैं। उनके पास प्रिंट, वेब और ब्रॉडकास्ट पत्रकारिता का 7 वर्षों का लंबा अनुभव है। जुलाई 2023 में NBT ऑनलाइन से जुड़ने से पहले वे पंजाब केसरी ग्रुप और सारांश टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
विशेषज्ञता: आकाश की मुख्य विशेषज्ञता मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीति, क्राइम और प्रशासनिक खबरों का सटीक विश्लेषण करने में है। वे इन क्षेत्रों के ऐतिहासिक महत्व, जमीनी विवादों, जल-जंगल-जमीन के मुद्दों और शासन-प्रशासन की जनहितैषी खबरों को कवर करने में विशेष रुचि रखते हैं। वे जटिल विषयों को सरल भाषा में डिकोड करने और उनके सामाजिक असर को उजागर करने में माहिर हैं।
पत्रकारिता अनुभव और शिक्षा: आकाश ने साल 2019 में पंजाब केसरी ग्रुप से अपने करियर की शुरुआत की थी, जहां उन्होंने ऑटोमोबाइल जर्नलिज्म और फीचर राइटिंग पर विशेष काम किया। इसके बाद सारांश टाइम्स में सीनियर सब-एडिटर के रूप में न्यूज रिसर्च और डेस्क मैनेजमेंट का अनुभव हासिल किया। उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से ब्रॉडकास्ट पत्रकारिता में एम.ए. और बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा से पीजी डिप्लोमा किया है।... और पढ़ें
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