सुप्रीम कोर्ट ने लंबी अवधि के कब्जे को एडेवर्स पजेशन नहीं मानते, पंजाब की जमीन विवाद को साफ किया
न्यायालय ने कहा कि केवल निरंतर और दीर्घकालिक कब्जा संपत्ति का कानूनी अधिकार नहीं बनाता, जब तक यह वास्तविक मालिक के अधिकारों के विरोध में नहीं दिखाया जाता। मुकदमा 1965 की रजिस्टर्ड सेल डीड और धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए जमीन समर्पण के दावे से जुड़ा था, जिसे हाई कोर्ट के पक्ष में निर्णय के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमाबंदी व खसरा जैसे राजस्व रिकॉर्ड केवल कर उद्देश्यों के लिये होते हैं और वे स्वामित्व का प्रमाण नहीं होते।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के मुक्तसर की जमीन से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि किसी संपत्ति पर केवल लंबे समय तक कब्जा होना 'एडवर्स पजेशन' (प्रतिकूल कब्जा) के तहत मालिकाना हक का कानूनी आधार नहीं बन सकता।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के मुक्तसर की एक जमीन से जुड़े एक जमीन के विवाद में बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि किसी संपत्ति पर केवल लंबे समय तक और बिना किसी रुकावट के कब्जा होना ही 'एडवर्स पजेशन' यानी प्रतिकूल कब्जे का कानूनी आधार नहीं बन सकता।
कोर्ट ने खारिज की अपील
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने पंजाब के मुक्तसर स्थित कृषि भूमि से जुड़ी एक अपील को खारिज करते हुए कहा कि लंबे समय के भौतिक कब्जे और कानून की नजर में 'एडवर्स पज़ेशन' के बीच एक बड़ा अंतर होता है।
कब्जे का दावे को साबित करने के लिए ये काम अनिवार्य
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि प्रतिकूल कब्जे का दावा साबित करने के लिए यह दर्शाना अनिवार्य है कि कब्जा किस समय और किस तरह से असली मालिक के अधिकारों के खिलाफ हुआ। कोर्ट ने कहा कि एडवर्स पजेशन का सिद्धांत केवल कब्जे की लंबी अवधि को मालिकाना हक का इनाम नहीं देता, बल्कि यह केवल ऐसे कब्जे की रक्षा करता है जिसमें असली मालिक के हक को नकारते हुए मालिकाना हक का विरोधी दावा शामिल हो। जब तक यह विरोधात्मक तत्व साबित नहीं होता, तब तक ऐसा दावा खारिज कर दिया जाएगा।
क्या था मामला?
आपको बता दें कि यह विवाद पंजाब के मुक्तसर की कृषि भूमि, 1965 की एक रजिस्टर्ड सेल डीड और 'डेरा भाई मस्तान सिंह' के पक्ष में धार्मिक व धर्मार्थ (धर्म-अर्थ) उद्देश्यों के लिए संपत्ति के समर्पण के दावों के इर्द-गिर्द घूमता था। इस मामले में वादियों ने जमीन पर अपना मालिकाना हक जताते हुए मुकदमा दायर किया था। ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय अदालत ने इसे खारिज कर दिया था, लेकिन हाई कोर्ट ने वादियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए प्रतिवादियों की अपील खारिज कर दी।
सुनवाई के दौरान SC ने की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में राजस्व रिकॉर्ड की कानूनी स्थिति भी पूरी तरह साफ कर दी। पीठ ने कहा कि जमाबंदी और खसरा गिरदावरी जैसे राजस्व रिकॉर्ड केवल वित्तीय और कर उद्देश्यों के लिए रखे जाते हैं। ये रिकॉर्ड कब्जे का सबूत तो हो सकते हैं, लेकिन ये न तो मालिकाना हक बनाते हैं और न ही उसे खत्म करते हैं। अचल संपत्ति पर मालिकाना हक का फैसला केवल उन ठोस दस्तावेजी सबूतों के आधार पर हो सकता है जो मालिकाना हक के वास्तविक स्रोत को साबित करते हों।
लेखक के बारे मेंदीपांशुदीपांशु वर्तमान में 'नवभारत टाइम्स ऑनलाइन' में कंसल्टेंट राइटर के रूप में काम कर रहे हैं। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के डॉ. भीम राव अंबेडकर कॉलेज से जर्नलिज्म में ग्रेजुएशन और आईआईएमसी (IIMC) दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया है। मीडिया इंडस्ट्री में एक साल से ज्यादा का अनुभव रखने वाले दीपांशु ने अपने करियर की शुरुआत साल 2025 में 'NDTV इंडिया' से की थी।उन्हें डिजिटल न्यूज रूम की तेज रफ्तार और ब्रेकिंग न्यूज कल्चर की अच्छी समझ है। दीपांशु की मुख्य रुचि राजनीति और क्राइम खबरों में है। वह बिहार चुनाव 2025, बजट 2026 और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों को कवर कर चुके हैं। इसके अलावा वह यूटिलिटी, लोकल, जंगल न्यूज और गुड न्यूज जैसी खबरों पर भी लगातार काम करते हैं।सोशल मीडिया और गूगल ट्रेंड्स पर उनकी खास नजर रहती है। वह इंटरनेट पर वायरल हो रहे मुद्दों और पाठकों की पसंद को समझकर खबरों को बहुत सरल, सटीक और असरदार तरीके से पेश करते हैं।... और पढ़ें
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