जम्मू-कश्मीर में 1953 से ली गई जमीन पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला - sc orders jk land compensation rent from 1953
जम्मू-कश्मीर में 1953 से ली गई जमीन पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन को 1953 में बिना औपचारिक अधिग्रहण के ली गई जमीन के मालिक के वंशज को मुआवजा और किराया देने का निर्देश दिया है। H…

सौजन्य से:- Jagran
जम्मू-कश्मीर में 1953 से ली गई जमीन पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन को 1953 में बिना औपचारिक अधिग्रहण के ली गई जमीन के मालिक के वंशज को मुआवजा और किराया देने का निर्देश दिया है।
HighLights
- सुप्रीम कोर्ट ने 1953 में ली गई जमीन के मुआवजे का आदेश दिया।
- जम्मू-कश्मीर प्रशासन को मालिक के वंशज को 1953 से किराया देना होगा।
- कांगन पुलिस स्टेशन के लिए बिना अधिग्रहण ली गई जमीन का मामला।
पीटीआई, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जम्मू-कश्मीर प्रशासन को 1953 में बिना औपचारिक अधिग्रहण और मुआवजे के ली गई जमीन के लिए उसके मालिक के वंशज को मुआवजा और किराया देने का निर्देश दिया। यह जमीन कांगन में पुलिस स्टेशन बनाने के लिए ली गई थी।
अदालत ने माना कि राज्य की अवैध कार्रवाई का खामियाजा जमीन मालिक के वंशज को केवल इसलिए नहीं भुगतना चाहिए कि मामले में काफी देर से अदालत का दरवाजा खटखटाया गया।
याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआइ) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची तथा वी. मोहन की पीठ ने अब्दुल राशिद वानी की याचिका पर फैसला सुनाया। वानी ने अधिवक्ता महफूज अहसन नाज़की के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
उनका दावा था कि उनके पूर्वजों की कांगन में सात कनाल और 18 मरले जमीन 1953 में पुलिस स्टेशन के निर्माण के लिए बिना किसी औपचारिक अधिग्रहण प्रक्रिया और मुआवजे के ले ली गई थी।
पीठ ने कहा कि करीब सात दशक बीत जाने के कारण वह इस समय नए सिरे से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने का सीधा आदेश नहीं दे सकती। हालांकि, अदालत ने भूमि अधिग्रहण अधिकारी को निर्देश दिया कि वह 2021 में वानी की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर किए जाने की तारीख से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करे।
1953 से देना होगा किराए
सुप्रीम कोर्ट ने भूमि अधिग्रहण अधिकारी को 1953 से जमीन के किराए की गणना करने और उसे वानी को भुगतान करने का भी निर्देश दिया। भूमि अधिग्रहण और किराए की अंतिम राशि हाई कोर्ट तय करेगा। इससे पहले जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने 2022 में वानी की याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि मामले में 68 साल की अत्यधिक और अस्पष्ट देरी हुई है।
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