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सुप्रीम कोर्ट ने NSA के तहत मुल्ला अफरोज की निवारक हिरासत रद्द की, उत्तर प्रदेश पर 10 लाख लागत का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 के तहत निवारक हिरासत को निरस्त किया और इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व आदेश को भी खारिज किया, साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार को 10 लाख रुपये की लागत लगाई। अदालत ने कहा कि पुलिस हिरासत में किया कबूलनामाअजब तक मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में नहीं हो, साक्ष्य के रूप में मान्य नहीं है, और निवारक हिरासत के आदेश की वैधता की व्यापक न्यायिक समीक्षा आवश्यक है।

29 सितंबर 2026 को 12:04 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट ने NSA के तहत मुल्ला अफरोज की निवारक हिरासत रद्द की, उत्तर प्रदेश पर 10 लाख लागत का आदेश

सौजन्य से:- Navbharat Times

संभल हिंसा मामले में नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत हिरासत में लिए गए मुल्ला अफरोज को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। लेकिन सवाल यह है कि इसका कानूनी पहलू क्या है? पुलिस महकमे से कहां चूक हुई

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA), 1980 के तहत की गई निवारक हिरासत को रद्द कर दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 8 जून 2026 के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया, जिसमें हिरासत आदेश को बरकरार रखा गया था। शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख की लागत भी लगाई है। मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी सवालों में से एक यह था कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को किसी व्यक्ति की निवारक हिरासत के आदेश का आधार बनाया जा सकता है या नहीं ?

क्या कहता है मौजूदा साक्ष्य कानून?

1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 23 पुलिस अधिकारी के सामने किए गए confession या कबूलनामे को आरोपी के खिलाफ साबित करने पर सामान्य रोक लगाती है। पुलिस हिरासत में किया गया कबूलनामा भी, जब तक वह मजिस्ट्रेट की तत्काल मौजूदगी में न हुआ हो, आरोपी के खिलाफ साबित नहीं किया जा सकता। हालांकि, पुलिस हिरासत में दी गई सूचना से किसी तथ्य की खोज होने पर उस खोज से सीधे संबंधित हिस्सा कानून में अपवाद के तौर पर प्रासंगिक हो सकता है। इसलिए पुलिस कस्टडी में कबूलनामा अपने आप में आपराधिक मुकदमे में स्वीकार्य सबूत है कहना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।

NSA में निवारक हिरासत का कानूनी आधार क्या है?

National Security Act, 1980 की धारा 3 के तहत केंद्र या राज्य सरकार, निर्धारित परिस्थितियों में, किसी व्यक्ति को इस उद्देश्य से हिरासत में रखने का आदेश दे सकती है कि उसे ऐसे कृत्य करने से रोका जा सके जो राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए प्रतिकूल हों।

लेकिन यह सामान्य आपराधिक सजा का विकल्प नहीं है। निवारक हिरासत का उद्देश्य किसी व्यक्ति को पहले किए गए अपराध के लिए दंडित करना नहीं, बल्कि कानून में बताए गए आधार पर भविष्य में संभावित रूप से हानिकारक गतिविधि को रोकना है।

इसी वजह से निवारक हिरासत के मामलों में अदालतें यह जांच सकती हैं कि हिरासत का आदेश पारित करने वाले प्राधिकारी ने वास्तव में प्रासंगिक सामग्री पर अपना स्वतंत्र दिमाग लगाया था या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने किस कानूनी सिद्धांत को लागू किया?

सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि निवारक हिरासत में व्यक्तिगत संतुष्टि का मतलब यह नहीं है कि कार्यपालिका का निर्णय न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह बाहर हो जाता है।

Khudiram Das v. State of West Bengal में अदालत ने माना था कि यदि आवश्यक संतुष्टि बनी ही नहीं, प्राधिकारी ने प्रासंगिक सामग्री पर विचार नहीं किया या शक्ति का प्रयोग कानून के उद्देश्य से बाहर हुआ, तो अदालत हिरासत की वैधता की समीक्षा कर सकती है।

मुल्ला अफरोज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी व्यापक न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में यह देखा कि हिरासत के लिए जिस सामग्री पर निर्भर किया गया, उसका कानूनी महत्व क्या था और क्या अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों पर पर्याप्त विचार हुआ था। अदालत ने अंततः हिरासत को बरकरार रखने योग्य नहीं माना।

दरअसल सुप्रीम कोर्ट का फैसला यहां NSA के तहत निवारक की वैधता से संबंधित है। हिरासत आदेश रद्द होने का अर्थ अपने-आप यह नहीं है कि मूल आपराधिक मामले में लगाए गए सभी आरोप खत्म हो गए या अदालत ने अफरोज को उन आरोपों से बरी कर दिया। इसलिए यह समझना कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मूल आपराधिक केस खत्म हो गया, गलत है। NSA हिरासत रद्द होना और मूल आपराधिक मामले में बरी होना दो अलग कानूनी परिणाम हैं।

लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें

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