दिल्ली हाई कोर्ट ने 10 वर्षीय बाल पीड़िता को प्रेरक पत्र भेजा, दोषी को उम्रकैद व 10.5 लाख मुआवजा सुनिश्चित किया
उच्च न्यायालय ने एक पीड़िता‑केस में निचली अदालत के जज के भावपूर्ण संदेश को सीधे बच्ची तक पहुँचाने का आदेश दिया और दोषी की आजीवन कैद को बरकरार रखा। साथ ही पीड़ित परिवार को नियमानुसार 10.5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया, जबकि कोर्ट ने बच्ची को आगे जीवन में आगे बढ़ने के लिए हौसला भी दिया।

सौजन्य से:- etvbharat.com
10 साल की बेटी को जज का भावुक पत्र, 'बेटा, जिसे तुम अंकल कहती थी, वह आजाद नहीं घूमेगा; सबसे बहादुर लड़की'
दिल्ली उच्च न्यायालय ने दोषी की सजा पर रोक लगाने से इनकार किया और निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा.
Published : September 29, 2026 at 2:54 PM IST
|Updated : September 29, 2026 at 3:01 PM IST
नई दिल्ली: दिल्ली से न्याय व्यवस्था का एक बेहद संवेदनशील, मानवीय और प्रेरणादायक मामला सामने आया है. दिल्ली हाई कोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) मामले की एक 10 वर्षीय बाल पीड़िता के लिए निचली अदालत के जज के मार्मिक और हौसला बढ़ाने वाले संदेश को उस तक पहुंचाने का ऐतिहासिक निर्देश दिया है. इसके साथ ही अदालत ने दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को निर्देश दिया है कि वह इस संदेश को प्रिंट करवाकर और तयशुदा मुआवजे की राशि के साथ बच्ची व उसके परिवार तक सुरक्षित पहुंचाए. इस फैसले ने कानूनी हलकों और आम जनमानस के बीच गहरी छाप छोड़ी है.
मामले की सुनवाई के दौरान निचली अदालत की जस्टिस रजनी रंगा ने अदालत में दिए गए 10 वर्षीय पीड़िता के उस मासूम और दृढ़ बयान का विशेष रूप से संज्ञान लिया था, जिसमें बच्ची ने कहा था कि, "जब तक 'अंकल' बूढ़े न हो जाएं, तब तक उन्हें जेल में ही रखा जाए." बाल पीड़िता के इसी आग्रह और अदम्य साहस को सम्मान देते हुए उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के उस संदेश को रेखांकित किया, जिसमें लिखा गया था, "बेटा, इस अदालत ने तुम्हारी बात सुनी. तुमने जो कहा था, उसका जवाब इस अदालत ने दे दिया है.
जानिए क्या था निचली अदालत के जज का संदेश
आज इस अदालत ने आदेश दिया है कि जिस शख्स को तुम 'अंकल' कहती थीं, वह अब कभी खुली हवा में सांस नहीं ले पाएगा. वह अपनी बाकी की जिंदगी एक पिंजरे में बिताएगा, उसी पिंजरे में बूढ़ा होगा और उसी में उसकी मौत होगी. वह अब कभी तुम्हें, तुम्हारी छोटी बहन या किसी अन्य बच्चे को नुकसान नहीं पहुंचा.
"तुम इस अदालत द्वारा देखी गई अब तक की सबसे बहादुर बच्ची हो. तुमने अदालत में आकर उस शख्स की तरफ इशारा किया, जिसने तुम्हें तकलीफ दी और सच बोला. तुमने चुप रहने के बजाए अपनी मां को सब बताया. तुम्हारी इसी हिम्मत के कारण अब वहशी दरिंदा कभी किसी दूसरे बच्चे को चोट नहीं पहुंचा पाएगा." -हाई कोर्ट जज
"बेटा, अब अपनी जिंदगी जियो, स्कूल जाओ और सपने देखो"
अदालत ने स्वीकार किया कि न्याय और सजा भले ही मिल गई हो, लेकिन व्यवस्था इस बच्ची के बचपन के उस भयानक दौर को वापस नहीं लौटा सकती. इसके बावजूद, अदालत ने अपने संदेश के अंत में बच्ची को जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देते हुए बेहद भावुक शब्द कहे, "यह अदालत तुम्हारा बचपन तो वापस नहीं ला सकती, लेकिन यह वादा जरूर करती है कि तुम्हारी बात सुनी गई है. अब बेटा, अपनी जिंदगी जियो. स्कूल जाओ, दोस्त बनाओ, हंसो, खेलो और सपने देखो. यह अदालत तुम्हारी इस हिम्मत को हमेशा याद रखेगी."
हाईकोर्ट ने बरकरार रखी उम्रकैद की सजा और मुआवजा
दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले में दोषी की सजा पर रोक लगाने से इनकार करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है. साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़ित परिवार को नियमों के तहत 10.50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाना सुनिश्चित किया जाए. मामले की अगली सुनवाई के लिए अदालत ने DLSA को दो सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है.
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