सुप्रीम कोर्ट ने दवा मूल्य में 1,000% अंतर को किया कड़ा सवाल, अस्पताल‑निर्माता मिलीभगत पर रोक की मांग
अदालत ने उन दवाओं के पीटीआर और एमआरपी के बीच असामान्य अंतर को उजागर किया, जहाँ अस्पताल और निर्माता मिलकर उच्च एमआरपी तय कर मरीजों से अतिरिक्त कीमत वसूल रहे हैं। प्रतिस्पर्धा आयोग की जाँच से पता चला कि निजी अस्पताल अपने फार्मेसियों से ही दवाएँ खरीदने पर मजबूर करके बाजार प्रतिस्पर्धा को दबा रहे हैं, जिससे रोगियों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है। कोर्ट ने मार्कअप पर सीमा और घटती मार्जिन के साथ नियम लागू करने का सुझाव दिया, ताकि महँगी दवाओं के मुनाफे के लालच को कम किया जा सके।

सौजन्य से:- The Hindu
सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं समेत कुछ दवाओं की खुदरा विक्रेताओं (रिटेलर) को मिलने वाली कीमत (पीटीआर) और अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बीच के अंतर पर कड़ी नाराजगी जताई है। कुछ मामलों में तो यह अंतर 1,000 फीसदी तक है। ये दवाएं बिना डॉक्टर की पर्ची के नहीं मिलतीं, इसलिए अस्पताल अक्सर यह तय करते हैं कि मरीज किस ब्रांड की दवा का इस्तेमाल करे। नतीजतन, दवा कंपनियां मरीजों के हितों के बजाय अस्पतालों के साथ कारोबार के लिए होड़ करती हैं। एक अस्पताल को खास दवाएं स्टॉक करने के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से, वे जान-बूझकर ज्यादा एमआरपी तय करती हैं और अस्पताल को कम पीटीआर पर दवाएं देती हैं। इससे अस्पताल उस अंतर की रकम अपनी जेब में रख पाने में कामयाब रहता है। तकनीकी तौर पर तो यह रिश्वत (किकबैक) नहीं है, लेकिन आर्थिक नजरिए से यह वही है। ऐसा इसलिए है क्योंकि निर्माता (मैन्यूफैक्चरर) अस्पतालों से खास उत्पाद चुनने पर उन्हें एक तरह का छिपा हुआ वित्तीय इनाम देने का वादा करते हैं। साथ ही, मरीजों को दवा की आपूर्ति मूल्य (सप्लाई प्राइस) से ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है, क्योंकि अस्पतालों को ज्यादा मार्जिन वाले ब्रांड बेचने में फायदा होता है। जैसा कि प्रतिस्पर्धा आयोग (कॉम्पिटिशन कमीशन) की जांच में पता चला है, निजी अस्पताल मरीजों को अस्पताल के अंदर मौजूद फार्मेसी से ही दवाएं खरीदने के लिए मजबूर भी करते हैं। लिहाजा मरीज दूसरी जगहों से दवाएं नहीं खरीद पाते, जिससे कीमतों की आम प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ जाती है। इसलिए, कम कीमत वाली वैसी ही दूसरी दवाओं को नुकसान होता है क्योंकि उनसे अस्पतालों को कम कमाई होती है। वहीं, मरीजों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है और कैंसर या पुरानी बीमारियों वाले मरीज लंबे समय तक चलने वाले इलाज को ठीक से पूरा नहीं कर पाते हैं। कर्नाटक और महाराष्ट्र में दवा नियंत्रकों ने भी इस चिंता को उठाया है।
यह चलन 2013 के औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश में मौजूद एक खामी की वजह से शुरू हुआ है। इस आदेश में सूचीबद्ध दवाओं की अधिकतम कीमत तो तय की गई है, लेकिन अस्पतालों के साथ लेन-देन पर लगने वाले मार्कअप (लागत मूल्य में जोड़ी जाने वाली अतिरिक्त राशि) पर कोई सीमा तय नहीं की गई है। फर्ज कीजिए कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) किसी दवा की बाजार-आधारित औसत कीमत 100 रुपये तय करता है, जिससे उसकी अधिकतम कीमत (सीलिंग) 116 रुपये हो जाती है। अगर कोई अस्पताल
मैन्यूफैक्चरर से 50 रुपये का पीटीआर तय कर लेता है, तो भी वह उस दवा को 116 रुपये में बेच सकता है (या अगर दवा सरकारी खर्च पर है, तो सरकार को 116 रुपये का बिल भेज सकता है)। ऐसा करने पर भी वह तय सीमा (सीलिंग) का उल्लंघन नहीं करेगा और बीच के 66 रुपये का फायदा उठा सकेगा। साल 2019 में एक ‘प्रूफ-ऑफ-कांसेप्ट’ कवायद के तहत, एनपीपीए ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 42 गैर-अनुसूचित दवाओं के ‘ट्रेड मार्जिन’ को 30 फीसदी तक सीमित कर दिया। इसके बाद औषधि विभाग ने बताया कि 526 ब्रांडों की कीमतों में 91 फीसदी तक की कमी आई। इससे पता चलता है कि कैंसर की कई दवाओं के एमआरपी में काफी ज्यादा मार्जिन शामिल था। दूसरी बात, भले ही सभी दवाओं पर एक निश्चित प्रतिशत का मार्कअप रखने का अदालत का सुझाव आकर्षक है, लेकिन इसके साथ एक घटता हुआ मार्जिन (रिग्रेसिव मार्जिन) भी होना चाहिए और इसमें दवाओं की कीमत बढ़ने पर प्रतिशत कम हो जाना चाहिए ताकि विक्रेताओं को महंगी दवाएं बेचने के लिए मिलने वाले ज्यादा मुनाफे के लालच को कम किया जा सके। कुल मिलाकर, अदालत का इस गंभीर समस्या की ओर ध्यान दिलाना सही है। खासकर उस पृष्ठभूमि में जब उसने सिद्धार्थ डालमिया (2025) मामले में दखल देने से इनकार कर दिया था और केंद्र व राज्य सरकारें दवाओं की कीमतों को सही स्तर पर लाने के लिए स्वाभाविक बाजार व्यवस्था के अभाव की भरपाई करने में नाकाम
Published - October 01, 2026 10:33 am IST
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