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तरुण तेजपाल केस: फ़ैसले में सर्वाइवर के पक्ष में कही गईं ये तीन बातें - BBC News हिंदी

तरुण तेजपाल केस: फ़ैसले में सर्वाइवर के पक्ष में कही गईं ये तीन बातें - Author, दिव्या आर्य - पदनाम, बीबीसी संवाददाता - प्रकाशित - पढ़ने का समय: 8 मिनट कई मर्दों के साथ यौन संबंध रखनेवाली या यौन हिंसा के बाद मुस्कुराते…

7 अगस्त 2026 को 05:15 pm बजे
तरुण तेजपाल केस: फ़ैसले में सर्वाइवर के पक्ष में कही गईं ये तीन बातें  - BBC News हिंदी

सौजन्य से:- BBC

तरुण तेजपाल केस: फ़ैसले में सर्वाइवर के पक्ष में कही गईं ये तीन बातें

- Author, दिव्या आर्य

- पदनाम, बीबीसी संवाददाता

- प्रकाशित

- पढ़ने का समय: 8 मिनट

कई मर्दों के साथ यौन संबंध रखनेवाली या यौन हिंसा के बाद मुस्कुराते हुए या परेशान न दिखनेवाली स्त्री का बयान कितना सच्चा होता है?

गुरुवार को न्यूज़ मैगज़ीन तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को बलात्कार का दोषी करार देने वाले अदालत के फ़ैसले में इसी सवाल का जवाब है.

बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने तेजपाल को साल 2013 में गोवा में हुए तहलका पत्रिका के एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन के दौरान अपनी जूनियर सहकर्मी के बलात्कार के लिए दस साल की सज़ा सुनाई है.

81 पेज का यह फ़ैसला जस्टिस डॉ. नीला गोखले और जस्टिस अमित जामसंदेकर की बेंच ने गोवा सरकार की ओर से दाख़िल अपील को मंज़ूर करते हुए सुनाया.

साल 2021 में एक निचली अदालत ने तेजपाल को बरी कर दिया था और अपने फ़ैसले में सर्वाइवर के बर्ताव और यौन चरित्र की आलोचना की थी. वह फ़ैसला जस्टिस क्षमा जोशी का था.

अब बॉम्बे हाई कोर्ट ने इन पहलुओं पर एकदम विपरीत रुख़ लेते हुए और यौन हिंसा पर बने क़ानूनों की बारीक़ समझ को आधार बनाकर ये फ़ैसला पलट दिया है.

दूसरी ओर, सभी आरोपों से इनकार करते हुए तेजपाल ने कहा है कि वे बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे.

सर्वाइवर के चरित्र, बर्ताव और बयान पर क्या कहता है बॉम्बे हाई कोर्ट का फ़ैसला और इन्हीं पहलुओं पर दिए निचली अदालत के मत को कैसे ग़लत बताता है - आगे हम यही समझने की कोशिश करेंगे.

1. 'परफ़ेक्ट विक्टिम'

बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में यौन हिंसा के संदर्भ में 'परफ़ेक्ट विक्टिम' या आदर्श पीड़िता के सिद्धान्त का उल्लेख किया है.

'परफ़ेक्ट विक्टिम' उसे माना जाता है जो पूरी तरह मासूम, बेबस, अबला, पीड़ित और दुखी दिखाई दे. अगर एक स्त्री शराब के नशे में हो, अभियुक्त को जानती हो या फ़ौरन शिकायत न करे तो वह इस खाँचे में पूरी तरह फ़िट नहीं बैठती. अगर वे रोए न, शोर न मचाए तो उनके 'विक्टिम' यानी पीड़ित होने पर सवाल खड़ा हो जाता है.

फ़ैसले में दी गई जानकारी के मुताबिक़, तरुण तेजपाल द्वारा की गई यौन हिंसा के बाद सर्वाइवर ने अपने दोस्तों को आपबीती बताई.

फिर गोवा के उस आयोजन में अपना काम करती रहीं और शाम के एक कार्यक्रम में वाइन पी और डांस किया. उन्होंने फ़ौरन यौन हिंसा की शिकायत नहीं की.

सर्वाइवर के इसी बर्ताव पर सवाल उठाते हुए निचली अदालत के फ़ैसले में कहा गया था कि कथित यौन हिंसा के बाद खींची गई तस्वीरों में वे "मुस्कुरा रही हैं, खुश दिख रही हैं, अच्छे मूड में हैं."

उस फ़ैसले में जज ने लिखा था, "उनका दावा है कि उनके साथ यौन हिंसा हुई लेकिन उसके फ़ौरन बाद वे किसी भी तरह से न तो परेशान, बुझी, डरी या घबराई लग रही थीं."

सर्वाइवर ने बाद में अपनी मैनेजिंग एडिटर को एक ईमेल लिखा. इसमें उन्होंने अपने ख़िलाफ़ हुई यौन हिंसा का पूरा हवाला दिया.

साथ ही, काम की जगह पर यौन उत्पीड़न के रोकथाम के क़ानून के तहत अपनी कंपनी, तहलका, में ऐसे मामलों की पड़ताल के लिए 'इंटर्नल कम्प्लेंट्स कमेटी' बनाए जाने की माँग की.

हाई कोर्ट ने निचली अदालत की आलोचना करते हुए कहा कि, "निचली अदालत की यह अपेक्षा कि सर्वाइवर हर वक्त बेचारी, परेशान और दुखी दिखाई दे, परेशानियों से लड़ने की इंसान की क्षमताओं को अनदेखा करती है."

कोर्ट ने कहा कि, "परफ़ेक्ट विक्टिम का सिद्धान्त एक मिथक है" और विश्वसनीयता का आधार केवल तथ्य होने चाहिए.

सर्वाइवर के पढ़ी-लिखी और आर्थिक तौर पर सक्षम पत्रकार होने का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि, "न अदालत और न अभियुक्त यह तय कर सकते हैं कि वह अपने सदमे से कैसे निपटें".

यही नहीं, "अभियुक्त के ग़लत काम की वजह से उन्हें अपना काम छोड़ने की ज़रूरत नहीं थी और न ही अकेलापन और अपमान महसूस करना चाहिए था".

कोर्ट ने सर्वाइवर के बर्ताव के आगे इस बात को तरजीह दी कि, "वे ऐसे आदमी के हाथों यौन हिंसा का शिकार हुईं थीं जिन्हें वे कई साल से अपने एम्पलॉयर, अपने गुरु और अपने दोस्त के पिता के तौर पर जानती थीं." कोर्ट ने सर्वाइवर के 'विक्टिम' होने पर यकीन किया.

यौन हिंसा के मामले लड़ चुकीं ऐडवोकेट अनीता अब्राहम बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले को अहम बताती हैं.

वे कहती हैं, "जजमेंट में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि केस पर फ़ैसला लेने के लिए सिर्फ़ विक्टिम के बयान की विश्वसनियता को आंकना चाहिए, उनके पिछले व्यवहार को वजह बनाकर सबूतों को दरकिनार नहीं करना चाहिए."

2. स्त्री का कैरेक्टर

निचली अदालत में चले मुक़दमे के दौरान टेक्स्ट मैसेज, ईमेल और तस्वीरों समेत सर्वाइवर की बहुत सारी निजी जानकारी सार्वजनिक की गई थीं.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने इसपर सख़्त रुख़ लेते हुए कहा, "अदालत ने सर्वाइवर को नीचा दिखाने वाली क्रॉस एग्ज़ामिनेशन को स्वीकृति दी जो उनके पिछले यौन संबंधों, निजी व्हॉ्टसऐप मैसेज के बारे में थी."

कोर्ट के मुताबिक़, ये सबूतों की वैधता पर बने इंडियन एविडेंस ऐक्ट का उल्लंघन है. यह विक्टिम के चरित्र और पिछले यौन संबंधों को वैध नहीं मानता.

अनीता अब्राहम कहती हैं, "क़ानून में कई प्रावधान हैं जो विक्टिम को 'अनैतिक मूल्यों वाली चरित्रहीन स्त्री' बताए जाने को वैध नहीं मानते, लेकिन किसी मुकदमे में विक्टिम के चरित्र के बारे में पूर्वाग्रह एक अहम फैक्टर बन जाएं - ये असाधारण नहीं है."

अनीता अब्राहम के मुताबिक हाई कोर्ट के इस फ़ैसले में रेखांकित किए गए सिद्धांत जब यौन हिंसा के और मुकदमों में लागू किए जाएंगे तो "क़ानूनी प्रक्रिया में विक्टिम की गरिमा बरक़रार रखने में मदद मिलेगी".

निचली अदालत के फ़ैसले में सर्वाइवर के चरित्र पर उठाए गए सवालों में इस बात की ओर ध्यान भी खींचा गया कि यौन हिंसा के बारे में सर्वाइवर ने किसी महिला मित्र से बात करने की जगह तीन पुरुष दोस्तों को आपबीती बताई.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने माना कि सर्वाइवर के कई यौन संबंध रहे हैं और वो एक आज़ाद ख़्याल स्त्री हैं जो क़रीबी पुरुष दोस्तों के साथ खुलकर बात करने में हिचकिचाती नहीं हैं.

लेकिन साथ ही कोर्ट ने ये साफ़ किया कि, "क़ानून में यह तय बात है कि अगर विक्टिम पर अनैतिक चरित्र की होने का आरोप हो, तब भी यह किसी अभियुक्त को उनका बलात्कार करने का अधिकार नहीं देता है."

सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने बताया कि, "कई यौन संबंध रखनेवाली स्त्री भी निजता की हक़दार हैं. कोई उनके ख़िलाफ़ हिंसा नहीं कर सकता. वे क़ानूनन सुरक्षा की बराबर हक़दार हैं."

3. सर्वाइवर का बयान

भारतीय क़ानून में यह तय सिद्धान्त है कि अगर पुष्टिकरण की कोई मज़बूत वजह न हो तो जुर्म तय करने के लिए सर्वाइवर का बयान ही काफ़ी है.

निचली अदालत में चले मुक़दमे के दौरान तरुण तेजपाल के वकील ने बार-बार सर्वाइवर से बलात्कार की विस्तृत जानकारी माँगी और उन बयानों में ग़लतियों का दावा किया.

बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस पर हैरानी जताई कि, "निचली अदालत ने बचाव पक्ष को सर्वाइवर को परेशान करने और नीचा दिखाने के लिए इतना वक़्त दिया" और कहा कि "इनवेसिव क्रॉस एग्ज़ामिनेशन के बावजूद" उन्हें सर्वाइवर का बयान "अटल" लगा जिसमें, "कोई विरोधाभास" नहीं थे और जिसकी सात गवाहों ने पुष्टि की.

इनवेसिव क्रॉस एग्ज़ामिनेशन का मतलब अदालत में विरोधी पक्ष के वकील की ओर से किसी से की जाने वाली ऐसी पूछताछ जो उसके निजी जीवन में में दख़ल देती हो और अपमानजनक हो.

अनीता अब्राहम कहती हैं, "जजों, प्रॉसिक्यूटर और डिफेंस वकीलों की ट्रेनिंग की सख़्त ज़रूरत है ताकि वे यौन हिंसा से होनेवाले शारीरिक और मानसिक नुक़सान के बेहतर समझ पाएं और मुकदमों की सुनवाई में संवेदनशीलता बरतें."

सर्वाइवर के बयान पर निचली अदालत के फ़ैसले में जज ने यह भी लिखा कि, "ये मानना मुश्किल है कि उसने खुद को छुड़ाने का संघर्ष किया लेकिन इसमें उन्हें कोई चोट नहीं आई."

बॉम्बे हाई कोर्ट ने "दिखाई देनेवाली शारीरिक चोटों का न होना, शारीरिक संघर्ष न दिखना, अभियुक्त पर खरोंचे न होना" जैसी बातों से नकारात्मक निष्कर्ष निकालने को "बेबुनियाद" बताया.

कोर्ट ने कहा कि, "क़ानून में यह साफ़ लिखा है कि अगर एक स्त्री 'पेनिट्रेशन'के ख़िलाफ़ शारीरिक संघर्ष नहीं करती तो सिर्फ़ इस वजह से ये नहीं माना जा सकता कि वह यौन संबंध बनाने के लिए हामी भर रही हैं."

बॉम्बे हाई कोर्ट ने तरुण तेजपाल को भारतीय दंड संहिता के उस प्रावधान का भी दोषी पाया जिनमें "वह व्यक्ति जो स्त्री पर अथॉरिटी यानी प्रभुत्व रखता हो" द्वारा किए गए बलात्कार अपराधी होता है और जिसके लिए सज़ा तय है.

साल 2013 में एक नामचीन और रसूख़दार पत्रकार के ख़िलाफ़ इतने संजीदा आरोप सामने आने को मीडिया ने काफ़ी तरजीह दी थी.

यह वह वक़्त था जब भारत में यौन हिंसा से जुड़े क़ानूनों में बड़े परिवर्तन किए गए थे. डिजिटल रेप, शादी में बलात्कार, काम की जगह पर यौन उत्पीड़न, शारीरिक संबंध बनाने में महिलाओं की सहमति जैसे मुद्दों पर खुलकर बहस होनी शुरू हुई थी.

सज़ा सुनाते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने तरुण तेजपाल को सरेंडर करने के लिए चार सप्ताह का वक़्त दिया है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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