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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गवाह बयानों की ऑडियो‑वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य कर दी

कोर्ट ने विवेचना के दौरान गवाहों के बयान को ऑडियो‑वीडियो रूप में दर्ज करना अनिवार्य कर दिया, ताकि जांच में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनी रहे। यह निर्देश 10 वर्ष या अधिक सजा वाले अपराधों में मजिस्ट्रेट के समक्ष भी लागू होगा और पुलिस को सात विशिष्ट उपायों का पालन करने कहा गया। आदेश जमानत अर्जी सुनते समय न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने दिया।

17 सितंबर 2026 को 08:05 pm बजे
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गवाह बयानों की ऑडियो‑वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य कर दी

सौजन्य से:- Jagran

इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा निर्देश: विवेचना के दौरान गवाहों के बयान की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग हो अनिवार्य

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवेचना के दौरान गवाहों के बयान का ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड करना अनिवार्य करने का निर्देश दिया है, ताकि जांच में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित हो।

HighLights

- गवाहों के बयान का ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य।

- जांच में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित होगी।

- 10 वर्ष से अधिक सजा वाले मामलों में बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि विवेचना के दौरान गवाहों के बयान का ऑडियो-वीडियो बनाना अनिवार्य किया जाना चाहिए।

इससे जांच ज्यादा पारदर्शी और निष्पक्ष होगी और कोर्ट को जमानत सहित अन्य न्यायिक कार्यवाही तय करने में मदद मिलेगी।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने आगरा की चन्द्रकांता की जमानत अर्जी स्वीकार करते हुए की है। पुलिस के लिए निर्देश के सात बिंदु भी जारी किए गए हैं।

कोर्ट ने कहा है कि 10 वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराधों में गवाहों के बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज हो। अश्लील वीडियो के मामलों में एफएसएल जांच तथा लोकेशन व बातचीत प्रासंगिक होने पर कॉल डिटेल निकाला जाए।

अपीलार्थी के खिलाफ थाना बसौनी में बीएनएस की विभिन्न धाराओं के साथ दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने विवेचक एसीपी अनिल कुमार से पक्ष रखने को कहा था।

उन्होंने बताया कि वादी मुकदमा का बयान बीएनएसएस की धारा 180 के तहत दर्ज करते समय आडियो-वीडियो नहीं बनाया गया।

कोर्ट ने जब डीजीपी के उन सर्कुलरों का हवाला दिया, जिसमें धारा 180 के बयान का आडियो-वीडियो बनाने की बात है, तो विवेचक कोई जवाब नहीं दे सके और माफी मांगी।

कोर्ट ने कहा, कई मामलों में देखा गया है कि डीजीपी सर्कुलर में वैकल्पिक होने का फायदा उठाकर विवेचक आडियो-वीडियो नहीं बनाते।

कई बार इसलिए भी नहीं बनाते ताकि यह आरोप न लगे कि बयान एफआइआर की कॉपी कर खुद लिख दिया है। डीजीपी ने दुष्कर्म पीड़िता के बयान के लिए इसे अनिवार्य किया है, लेकिन अन्य मामलों में वैकल्पिक रखा है, जिसका दुरुपयोग हो रहा है।

कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया कि आदेश की प्रति डीजीपी को भिजवाएं ताकि सभी विवेचकों को दिशा निर्देश से अवगत कराया जाए।

मामले के गुण-दोष पर कोर्ट ने पाया कि 18 मई 2026 से जेल में बंद आवेदिका मृतका की सास है। एफआईआर और धारा 180 के बयान में विरोधाभास है। दहेज के लिए प्रताड़ना का कोई ठोस सुबूत नहीं है।

जांच के लिए दिए गए निम्न दिशा-निर्देश

1.संज्ञेय अपराध की सूचना मिलते ही विवेचक तुरंत मौके पर जाएं और प्रथम सूचनाकर्ता व गवाहों के बयान बिना देरी दर्ज करें।

2.ई-साक्ष्य एप से आडियो-वीडियो बनाएं। केवल शिकायतकर्ता का नहीं, स्वतंत्र गवाहों का भी बयान लें।

3. दुष्कर्म मामले में पीड़िता का बयान महिला पुलिस अधिकारी उसके घर पर लें और 24 घंटे में मेडिकल कराएं।

4. ऐसे अपराध जिसमें 10 साल या उससे अधिक सजा है, गवाहों का बयान मजिस्ट्रेट के सामने धारा 183(6) के तहत दर्ज कराएं।

5.अश्लील वीडियो के आरोप में मोबाइल जब्त कर एफएसएल भेजें और साइबर सेल की मदद लें।

6. लोकेशन और बातचीत प्रासंगिक होने पर सीडीआर निकालें।

7.जहां आरोपित को पहचानना है, वहां शिनाख्त परेड और बरामद माल की शिनाख्त पुलिस रेगुलेशन पैरा 116-117 के अनुसार किया जाए।

पासपोर्ट के लिए पहले विचारण अदालत से विदेश जाने की अनुमति लें

वहीं, दूसरी ओर इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने लंबित आपराधिक मुकदमे के बावजूद पासपोर्ट जारी कराने की मांग के मामले में कहा है कि इसके लिए पहले आरोपी को विचारण अदालत से विदेश यात्रा की अनुमति या एनओसी लेनी होगी।

कोर्ट ने पासपोर्ट प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि यदि याची उक्त दस्तावेज सहित अन्य जरूरी कागज पेश करे तो उसके आवेदन पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों की रोशनी में विचार किया जाये। यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति अभधेश कुमार चौधरी की पीठ ने इरशाद अली की याचिका पर पारित किया है।

याची पर प्रतापगढ़ के कंधई थाने में वर्ष 2020 में धारा 147, 148, 323, 504, 506, 308 और 325 आइपीसी के तहत मुकदमा दर्ज हुआ। मामले में आरोपपत्र भी न्यायालय में दाखिल हो चुका है।

याची ने पासपोर्ट के लिए आवेदन किया किंतु आपराधिक केस चलने के कारण उसे पासपोर्ट जारी नहीं किया जा रहा है। इस पर याची ने पासपोर्ट जारी करने की मांग करते हुए हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अधिवक्ता वरुण पांडे ने कोर्ट को बताया कि हाई कोर्ट की जिस पूर्व नजीर पर याची भरोसा कर रहा है, उसमें सुप्रीम कोर्ट के 20 सितंबर, 2024 के रीता वर्मा बनाम भारत संघ फैसले के बाद बदलाव हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने पासपोर्ट आवेदन पर 10 अक्टूबर, 2019 के कार्यालय ज्ञापन अथवा बाद में लागू किसी कार्यालय ज्ञापन के अनुसार विचार करने का निर्देश दिया था।

इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट कर चुका है। लिहाजा, याची पहले संबंधित विचारण अदालत से विदेश यात्रा की अनुमति/एनओसी प्राप्त कर उसे पासपोर्ट अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत करे। दस्तावेज प्रस्तुत होने के बाद अधिकारी कानून के अनुसार उसके आवेदन पर शीघ्र कार्रवाई करें।

आईएएस अभिषेक प्रकाश के खिलाफ विजिलेंस जांच रद

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गुरुवार को आईएएस अधिकारी एवं तत्कालीन औद्योगिक विकास विभाग के सचिव तथा इन्वेस्ट यूपी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अभिषेक प्रकाश को बड़ी राहत देते हुए योगी सरकार द्वारा उनके खिलाफ शुरू की गई विजिलेंस जांच को निरस्त कर दिया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने अभिषेक प्रकाश की याचिका मंजूर करते हुए पारित किया है। कोर्ट ने अभिषेक प्रकाश के खिलाफ सरकार द्वारा पिछले वर्ष 20 व 28 मार्च को जारी आदेशों के साथ ओपन विजिलेंस इंक्वायरी की पूरी कार्यवाही रद कर दी है।

20 मार्च, 2025 को एक कंपनी के अधिकारी बिस्वजीत दत्ता की ओर से शिकायत की गई थी कि इन्वेस्ट यूपी के वरिष्ठ अधिकारी अभिषेक प्रकाश ने उसे प्रोजेक्ट को एम्पावर्ड कमेटी और कैबिनेट से मंजूरी दिलाने के लिए निकांत जैन नाम के व्यक्ति का मोबाइल नंबर देकर उनसे संपर्क करने को कहा था।

कंपनी ने तीन दिसंबर 2024 को इन्वेस्ट यूपी में सोलर सेल और सोलर माड्यूल निर्माण इकाई स्थापित करने के लिए आवेदन किया था। शिकायतकर्ता के अनुसार, निकांत जैन ने प्रोजेक्ट की पांच प्रतिशत राशि की मांग की थी।

इसी शिकायत के आधार पर निकांत जैन के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई, जबकि दूसरी ओर अभिषेक प्रकाश के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू कर दी गई और उसी दिन विजिलेंस जांच के लिए भी पत्र भेज दिया गया। हाई कोर्ट ने खास तौर पर इस बात को नोट किया कि शिकायत के समर्थन में कोई शपथपत्र नहीं दिया गया था।

मामले में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब कंपनी के अधिकारी बिस्वजीत दत्ता ने निकांत जैन से जुड़े मामले में हाई कोर्ट के समक्ष दाखिल अपने काउंटर एफिडेविट में कहा कि 20 मार्च, 2025 की शिकायत उलझन और गलतफहमी के कारण की गई थी।

अभिषेक प्रकाश की ओर से हाई कोर्ट में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने दलील दी कि कंपनी का प्रोजेक्ट लगातार मूल्यांकन समिति के विचाराधीन था और 25 मार्च 2025 की बैठक में उसे हाई लेवल एम्पावर्ड कमेटी के समक्ष रखने की सिफारिश भी कर दी गई थी। तर्क दिया कि शिकायतकर्ता ने स्वयं बाद में हाई कोर्ट में हलफनामा देकर स्वीकार किया कि शिकायत गलतफहमी के कारण की गई थी।

बिना शपथपत्र की शिकायत पर विजिलेंस जांच शुरू करना और स्टेट विजिलेंस कमेटी की स्वीकृति नहीं लेना सरकारी आदेशों के विपरीत था। वहीं, राज्य सरकार की ओर से मुख्य स्थाई अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार सिंह स्थाई अधिवक्ता अनिरुद्ध सिंह के साथ पेश हुए। अनिरुद्ध ने याचिका का विरोध किया और कहा कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए प्रशासनिक विभाग ने विजिलेंस जांच का निर्णय लिया था।

अपने निर्णय में हाई कोर्ट ने कहा कि सरकारी आदेशों के तहत ग्रुप-ए अधिकारियों के खिलाफ शिकायत के साथ शपथपत्र की व्यवस्था इसलिए की गई थी, ताकि ईमानदार अधिकारियों को फर्जी या झूठी शिकायतों के आधार पर प्रताड़ित होने से बचाया जा सके। अदालत ने कहा कि जब शिकायतकर्ता स्वयं बाद में यह स्वीकार कर चुका है कि शिकायत गलतफहमी के कारण की गई थी, तो उस शिकायत के आधार पर आगे बढ़ाई गई कार्यवाही का आधार ही समाप्त हो जाता है।

यह भी पढ़ें- प्रयागराज में चर्च की जमीन पर नई लीज को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती, अगली सुनवाई तक यथास्थिति का आदेश

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