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प्रतिवादी को लिखित बयान के बिना स्वतंत्र साक्ष्य देने का नहीं मिलेगा अधिकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार समाप्त होने के बाद प्रतिवादी स्वतंत्र रूप से साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना लिखित कथन के मुकदमे में कोई अभिवचन मौजूद नहीं रहता और इसके बिना साक्ष्य स्वीकार नहीं किया जा सकता।

18 जुलाई 2026 को 11:13 am बजे
प्रतिवादी को लिखित बयान के बिना स्वतंत्र साक्ष्य देने का नहीं मिलेगा अधिकार

सौजन्य से:- Jagran

लिखित बयान का अधिकार खत्म होने के बाद प्रतिवादी स्वतंत्र साक्ष्य नहीं दे सकता : हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार समाप्त होने के बाद प्रतिवादी स्वतंत्र साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकता। कोर्ट ने ...और पढ़ें

HighLights

- लिखित बयान का अधिकार समाप्त होने पर प्रतिवादी स्वतंत्र साक्ष्य नहीं दे सकता।

- इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को सही ठहराया।

- बिना लिखित कथन के मुकदमे में अभिवचन के बिना साक्ष्य अस्वीकार्य।

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी प्रतिवादी का निर्धारित समय में लिखित कथन (लिखित बयान) दाखिल करने का अधिकार समाप्त हो जाता है, तो वह बाद में स्वतंत्र रूप से अपना साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि बिना लिखित कथन के मुकदमे में कोई अभिवचन (प्लीडिंग) मौजूद नहीं रहता और अभिवचन के बिना तय मुद्दों पर साक्ष्य स्वीकार नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने यह टिप्पणी करते हुए गाजियाबाद के अपर जिला न्यायाधीश की अदालत के आदेश को सही ठहराया और सतीश गुप्ता की याचिका खारिज कर दी। ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादी द्वारा दाखिल साक्ष्य का शपथपत्र वापस कर दिया था, जिसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

मामला वर्ष 2019 में दायर उस वाद से जुड़ा है, जिसमें वादी प्रवीण कुमार सिंघल ने 20 अप्रैल 2017 के बैनामा करार के अनुपालन की मांग की थी। नोटिस मिलने के बाद प्रतिवादी सतीश गुप्ता अदालत में उपस्थित हुए, लेकिन सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के तहत निर्धारित समय में लिखित बयान दाखिल नहीं किया। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें 30 मई 2022 तक अंतिम अवसर भी दिया, लेकिन इसके बाद भी लिखित बयान दाखिल नहीं किया गया।

इस पर अदालत ने पांच जुलाई 2022 को उनका लिखित बयान दाखिल करने का अधिकार समाप्त कर दिया। इसके बाद वादी के साक्ष्य दर्ज हुए और प्रतिवादी के अधिवक्ता ने गवाहों से जिरह भी की। बाद में प्रतिवादी ने अपना साक्ष्य शपथपत्र और गवाहों की सूची दाखिल की, जिस पर वादी ने आपत्ति जताई। ट्रायल कोर्ट ने यह आपत्ति स्वीकार करते हुए साक्ष्य शपथपत्र लौटा दिया।

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हाई कोर्ट में प्रतिवादी की ओर से तर्क दिया गया कि लिखित बयान दाखिल न करने से वह मुकदमे से बाहर नहीं हो जाता और उसे अपना पक्ष साबित करने के लिए साक्ष्य देने का अधिकार होना चाहिए। हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी को वादी के गवाहों से जिरह करने का अवसर पहले ही दिया जा चुका है, लेकिन लिखित कथन के अभाव में उसे स्वतंत्र साक्ष्य पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

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