92 गवाहों के हटने पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई तीव्र चिंता, अमित शाह को दिया स्पष्ट निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने बंबई हाई कोर्ट के 21 पुलिसकों और 22 आरोपी को बरी करने वाले आदेश की समीक्षा के लिए याचिका स्वीकार की, साथ ही 92 गवाहों के बड़े पैमाने पर हटने को "थोक के भाव गवाहों का मुकर जाना" कह कर गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि गृह मंत्री अमित शाह को बरी किए जाने के अंतिम फैसले को दोबारा खोलने का आदेश नहीं दिया जाएगा, जबकि वह कुछ चुनिंदा गवाहों के बयानों की जांच का संकेत दे रही है।

सौजन्य से:- ETV Bharat
सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में 92 गवाहों के मुकरने पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, अमित शाह पर दिया यह निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा 21 पुलिसकर्मियों समेत 22 आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की.
By Sumit Saxena
Published : September 28, 2026 at 6:37 PM IST
नई दिल्ली: सोहराबुद्दीन शेख कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 92 गवाहों के पलटने पर गहरी चिंता जताते हुए इसे "थोक के भाव गवाहों का मुकर जाना" करार दिया है. बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा 21 पुलिसकर्मियों समेत 22 आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने इस फैसले की समीक्षा करने पर सहमति जताई है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को इस मामले से बरी किए जाने के अंतिम फैसले को दोबारा नहीं खोला जाएगा.
सर्वोच्च अदालत ने यह टिप्पणियां तब कीं, जब वह बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने के लिए सहमत हो गई, जिसमें 2005 के कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में 22 आरोपियों को बरी कर दिया गया था. बरी किए गए आरोपियों में 21 पुलिसकर्मी भी शामिल हैं. यह पूरा मामला गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और उनके सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की कथित हत्याओं और फर्जी मुठभेड़ से जुड़ा है.
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की. पीठ ने सोहराबुद्दीन शेख के भाई नयाबुद्दीन शेख द्वारा दायर याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें बॉम्बे हाई कोर्ट के 7 मई के फैसले को चुनौती दी गई है जिसने आरोपियों को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा था. पीठ के समक्ष वरिष्ठ वकील डी. एस. नायडू ने याचिकाकर्ता का पक्ष रखा.
पीठ ने संकेत दिया कि वह आरोपियों को बरी किए जाने से जुड़े कुछ चुनिंदा गवाहों के बयानों की जांच करेगी और कहा, "हम इस बरी किए जाने के फैसले की समीक्षा करेंगे."
सुनवाई के दौरान वकील नायडू ने कहा कि उनका मुवक्किल 2010 से इस मामले की पैरवी कर रहा है और उन्हीं की मांग पर जांच ट्रांसफर की गई थी. नायडू ने कहा कि ऐसे फॉरेंसिक सबूत मौजूद हैं जो सच्चाई बयां कर सकते हैं, गोलियों के निशान और कारतूस मिले थे, और उनकी भाभी (कौसर बी) का तो पता तक नहीं लगाया जा सका. नायडू ने कहा, "कुछ गवाह भले ही मुकर गए हों, लेकिन वे सच्चाई को दबा नहीं सकते..."
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि अगर किसी मुकदमे में 92 गवाह मुकर जाएं तो यह चिंता का विषय है. उन्होंने मौखिक रूप से जोड़ते हुए कहा, "यह तो थोक के भाव गवाहों का मुकर जाना है..."
पीठ ने बरी किए जाने के फैसले की समीक्षा करने पर सहमति जताते हुए नायडू से कहा, "हम उन कुछ गवाहों के बयान देखना चाहेंगे जिन पर आप भरोसा कर रहे हैं... बरी किए जाने वाले हिस्से को लेकर आपको जो भी ठीक लगे, ऐसे तीन या चार बयान हमें सौंपें." इस दौरान जस्टिस बागची ने टिप्पणी की, "जिन लोगों पर मुकदमा चलाया गया था, क्या उनका मुकदमा निष्पक्ष और न्यायसंगत तरीके से हुआ था, यह एक महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु है."
यह याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट के 7 मई के उस आदेश को चुनौती देती है, जिसने मुंबई की एक विशेष सीबीआई अदालत के दिसंबर 2018 के फैसले के खिलाफ रुबाबुद्दीन और नयाबुद्दीन शेख द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया था. सीबीआई अदालत ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया था. बरी किए गए इन 22 आरोपियों में से 21 गुजरात और राजस्थान के पुलिस अधिकारी थे.
बाकी बचा एक आरोपी गुजरात के एक फार्महाउस का मालिक था, जहां अभियोजन पक्ष के अनुसार, सोहराबुद्दीन और कौसर बी को अवैध रूप से बंधक बनाकर रखा गया था. अभियोजन पक्ष का दावा था कि सोहराबुद्दीन, उनकी पत्नी और प्रजापति 22-23 नवंबर 2005 की रात को बस से हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली जा रहे थे, तभी एक पुलिस टीम ने कथित तौर पर उन्हें हिरासत में ले लिया. इसके बाद इस दंपती और प्रजापति को कथित तौर पर अलग-अलग गाड़ियों में ले जाया गया था.
सीबीआई के अनुसार, 26 नवंबर 2005 को अहमदाबाद के पास गुजरात और राजस्थान पुलिस के जवानों द्वारा की गई एक मुठभेड़ में सोहराबुद्दीन मारा गया था. आरोप है कि इसके तीन दिन बाद कौसर बी की भी हत्या कर दी गई थी. प्रजापति, जो उदयपुर सेंट्रल जेल में बंद था और इस कथित एनकाउंटर का मुख्य गवाह माना जाता था, 27 दिसंबर 2006 को गुजरात-राजस्थान सीमा के पास एक पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था.
पीठ ने यह बिल्कुल साफ कर दिया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को इस मामले से बरी किए जाने के फैसले को दोबारा नहीं खोला जाएगा. पीठ ने वकील नायडू से कहा, "हम उम्मीद करते हैं कि आप (बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के) पैरा 43 को चुनौती नहीं दे रहे हैं या उस डिस्चार्ज को दोबारा नहीं खोल रहे हैं जो (सर्वोच्च अदालत के आदेश द्वारा) अंतिम रूप ले चुका है."
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