सुप्रीम कोर्ट ने एनसीटीई को टीईआई से प्रदर्शन रिपोर्ट मांगने का अधिकार मान्य किया
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से स्पष्ट हुआ कि एनसीटीई को मान्यता प्राप्त शिक्षक शिक्षा संस्थानों से वार्षिक परफॉर्मेंस अपरेजल रिपोर्ट (पीएआर) माँगने की वैध शक्ति है। अदालत ने पब्लिक नोटिस को कानूनी और मान्य ठहराया और एनसीटीई एक्ट की धारा 12(के) के तहत काउंसिल के अधिकारों का समर्थन किया। इससे शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए नियामक संस्था के दायित्व को मजबूत किया गया।

सौजन्य से:- Jagran
एनसीटीई का शिक्षक संस्थानों से परर्फामेंस रिपोर्ट मांगना वैध, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक शिक्षा संस्थानों (टीईआई) से वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (पीएआर) मांगने के राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) के अधिकार को वैध ठहराया है।
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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक शिक्षा संस्थानों (टीईआई) की निगरानी और जवाबदेही को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजूकेशन (एनसीटीई) के पक्ष में फैसला दिया है।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि एनसीटीई को मान्यता प्राप्त शिक्षक शिक्षा संस्थानों से सालाना परफारमेंस अपरेजल रिपोर्ट (पीएआर) मांगने का अधिकार है।अदालत ने इस संबंध में एनसीटीई की एक्जीक्यूटिव कमेटी के मेंबर द्वारा 22 सितंबर 2019 को जारी पब्लिक नोटिस को कानूनी और वैध करार दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने एनसीटीई के पक्ष में सुनाया फैसला
ये आदेश न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने एनसीटीई की अपील स्वीकार करते हुए दिया। कोर्ट ने कहा कि शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना केवल शिक्षकों या संस्थानों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि नियामक संस्था की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि एनसीटीई एक्ट 1993 का उद्देश्य देश में शिक्षक शिक्षा प्रणाली का नियोजित और समन्वित विकास तथा उसके मानकों का उचित रखरखाव है।
ये मामला उस पब्लिक नोटिस से जुड़ा था, जिसमें सभी एनसीटीई मान्यता प्राप्त शिक्षा शिक्षक संस्थानों (टीईआइ) को वार्षिक परफारमेंस अपरेजल रिपोर्ट ऑनलाइन जमा करने को कहा गया था। इसमें संस्थान के वार्षिक खातों का चार्टेड अकाउंटेंट से ऑडिट कराया गया विवरण भी शामिल था।
केंद्र और राज्य सरकार के संस्थानों के लिए पांच हजार रुपये तथा अन्य संस्थानों के लिए 15 हजार रुपये शुल्क भुगतान निर्धारित किया गया था। पीएआर जमा नहीं करने पर एनसीटीई एक्ट की धारा 17(1) के तहत कार्रवाई की बात कही गई थी।
शिक्षक शिक्षा संस्थानों (टीईआइ) ने इस व्यवस्था को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। उनका तर्क था कि इस तरह की व्यवस्था लागू करने की शक्ति केवल काउंसिल के पास है और एक्जीक्यूटिव कमेटी के मेम्बर सेकरेट्री को ऐसा पब्लिक नोटिस जारी करने का अधिकार नहीं था। हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए पब्लिक नोटिस रद्द कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस दृष्टिकोण को खारिज करते हुए कहा कि एनसीटीई एक्ट की धारा 12(के) काउंसिल को मान्यता प्राप्त संस्थानों में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए परफारमेंस अरपेजल सिस्टम, मानक और तंत्र विकसित करने का अधिकार देती है।
शिक्षक संस्थानों से वार्षिक प्रदर्शन रिपोर्ट मांगना वैध
5 फरवरी 2019 की जनरल बाडी मीटिंग में काउंसिल ने पीएआर व्यवस्था पर विचार कर उसे मंजूरी दी थी और एनसीटीई को इसके लिए प्रोफार्मा विकसित करने के लिए अधिकृत किया था। इसके बाद एक्जीक्यूटिव कमेटी द्वारा पब्लिक नोटिस जारी करना उसी निर्णय को लागू करने की प्रक्रिया थी।
शीर्ष अदालत ने इससे भी आगे जाकर कहा कि किसी नियामक को अपने वैधानिक दायित्वों को पूरा करने के लिए हर शक्ति का कानून मेंअलग-अलग और स्पष्ट उल्लेख होना जरूरी नहीं है।
आवश्यक आकस्मिक और सहायक शक्तियां भी नियामक के कार्यक्षेत्र का हिस्सा मानी जा सकती हैं। अदालत ने कहा कि नियामकों की भूमिका को अत्यधिक तकनीकी या संकीर्ण नजरिए से नहीं देखा जा सकता। उनके लिए संस्थानों की जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है।
अदालत ने जवाबदेही के तीन आयाम, जिम्मेदारी, जवाबदेही और उसे लागू करने की क्षमता बताए हैं।सुप्रीम कोर्ट ने 13 मार्च 2023 के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को रद करते हुए अपील स्वीकार कर ली।
इसके साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि एनसीटीई अपने नियामक दायित्वों के तहत टीईआइ से परफारमेंस अपरेजल रिपोर्ट मांग सकता है और शिक्षक शिक्षा संस्थानों की कार्यप्रणाली की नियमित समीक्षा एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ऐसे कदम उठा सकता है।
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