सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के 'सलवार उतारना' को बलात्कार प्रयास नहीं माना निर्णय पर आपत्ति जताई
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पटना हाईकोर्ट के इस बयान में आपत्तिजनक टिप्पणी है और कोर्ट के पास इसे रद्द करने की शक्ति है। उन्होंने आरोपी को पुलिस के माध्यम से नोटिस भेजने और पक्ष सुनने के बाद फैसला खारिज करने का संकेत दिया। यह 2008 के बांका के रेप प्रयास केस से जुड़ा है, जिस पर पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट का समान फैसला भी सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज किया था।

सौजन्य से:- bhaskar.com
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पटना हाईकोर्ट बोला-सलवार उतारना रेप की कोशिश नहीं, SC नाराज:CJI बोले- बयान आपत्तिजनक; फैसला खारिज हो सकता है
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सुप्रीम कोर्ट उस फैसले को खारिज कर सकता है, जिसमें पटना हाईकोर्ट ने कहा था कि सलवार उतारना रेप की कोशिश नहीं। CJI जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इस आदेश पर खुद ही सुनवाई कर रही थी।
CJI सूर्यकांत ने कहा कि पटना हाईकोर्ट के इस फैसले में कुछ कमेंट्स आपत्तिजनक हैं। उन्होंने कहा कि आरोपी का पक्ष सुनने के बाद इसे खारिज भी किया जा सकता है।
CJI सूर्यकांत ने बिहार के एडवोकेट जनरल एसडी संजय से कहा कि स्थानीय पुलिस के जरिए आरोपी को नोटिस भेजा जाए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐसा ही फैसला रद्द किया था
सुप्रीम कोर्ट को जुलाई में पटना हाईकोर्ट के आदेश की जानकारी दी गई, तब SC इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऐसे ही आदेश पर सुनवाई कर रहा था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसले में कहा था- नाबालिग की छाती दबाना, पायजामे का नाड़ा तोड़ना रेप की कोशिश नहीं है। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
14 जुलाई को वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के सामने पटना हाईकोर्ट के आदेश का जिक्र किया था। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया था। इसके बावजूद पटना हाईकोर्ट ने उसी तरह की टिप्पणियां करते हुए आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने जारी की थी गाइडलाइन
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला खारिज करने के बाद CJI सूर्यकांत ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) की एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट भी मंजूर की थी।
रिपोर्ट में जिसमें यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान संवेदनशीलता बनाए रखने के लिए दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने देश की सभी अदालतों को निर्देश दिया कि वे इस गाइडलाइन का सख्ती से पालन करें।
हाईकोर्ट ने 9 जुलाई को पटना सुनाया था फैसला
पटना हाईकोर्ट ने 9 जुलाई को अपने फैसले में कहा था कि महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसके सीने को दबाने की घटना को बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता। खासकर तब, जब शारीरिक संबंध बनाने का कोई सबूत न हो और बलात्कार के इरादे का कोई कृत्य सामने न आए।
हाईकोर्ट ने कहा था कि महिला की गरिमा भंग करने का अपराध बनता है, लेकिन रेप की कोशिश का अपराध साबित नहीं होता। फैसले के बाद आरोपी को बरी कर दिया गया। रेप की कोशिश का यह केस 2008 में बिहार के बांका में दर्ज हुआ था।
बिहार का केस और पटना हाईकोर्ट का फैसला
18 साल पहले 20 जनवरी 2008 को बिहार के बांका में एक स्टूडियो के मालिक के खिलाफ रेप की कोशिश की FIR हुई। युवती ने आरोप लगाया कि वह पिता के साथ फोटो खिंचवाने गई थी।
स्टूडियो मालिक हिमांशु ने स्टूडियो का दरवाजा बंद कर लिया। मेरी सलवार उतारने की कोशिश की। रेप के इरादे से छाती दबाने लगा।
2013 में बांका कोर्ट ने हिमांशु को रेप का प्रयास का दोषी करार दिया था। 3 साल कारावास की सजा सुनाई। लोअर कोर्ट के फैसले को हिमांशु ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पटना हाईकोर्ट में 13 साल चला केस
हिमांशु के वकील ने पटना हाईकोर्ट में दलील दी कि निचली अदालत का फैसला गैरकानूनी है। उन्होंने तर्क दिया कि पीड़ित पक्ष ने FIR में देरी की और उचित कारण नहीं बताया।
13 साल बाद 9 जुलाई 2026 को पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने कहा- इस मामले में मेडिकल एविडेंस नहीं है। रेप करने की कोशिश में भी स्पष्ट शारीरिक प्रयास के प्रमाण नहीं है। इसलिए आरोपी को बरी किया जाता है।
पटना हाईकोर्ट के फैसले के 3 आधार
1. पेनिट्रेशन का कोई सबूत नहीं
कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने बल का प्रयोग किया, दरवाजा बंद किया, सलवार उतारने की कोशिश की और उसकी छाती दबाकर शारीरिक उत्पीड़न किया। हालांकि, ये घटना रेप के प्रयास की बजाय मर्यादा को ठेस पहुंचाने वाली है। पेनिट्रेशन का सबूत नहीं है और ना ही रेप करने के प्रयास की मेडिकल पुष्टि है। रेप के प्रयास की पुष्टि के लिए मेडिकल सबूत नहीं है।
2. चिकित्सा अधिकारी की गवाही नहीं
कोर्ट ने कहा कि इस केस में बहुत खामियां हैं। कोर्ट ने कहा कि 5 गवाहों में एक ही स्वतंत्र गवाह था, जो मुकर गया। जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल करने वाले जांच अधिकारी से मुकदमे के दौरान पूछताछ तक नहीं नहीं की गई थी। इसके अलावा चिकित्सा अधिकारी की भी गवाही नहीं कराई गई।
3. सिर्फ माता-पिता ही मुख्य गवाह
इस मामले में पीड़िता के माता-पिता ही मुख्य गवाह हैं, जिनका इस मामले के नतीजे से सीधा संबंध है। अदालतें मानती आई हैं कि ऐसे गवाह अपने पक्ष में तथ्यों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर सकते हैं। प्राथमिकी दर्ज करने में हुई देरी पर पीड़िता का बयान स्वीकार्य है कि पुलिस स्टेशन में थाना प्रभारी ने शुरू में केस दर्ज करने से मना कर दिया था, जिस कारण अगले दिन FIR हुई।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला दिया
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा- यौन अपराधों में पीड़िता की गवाही सजा के लिए पर्याप्त हो सकती है, लेकिन इसके लिए गवाही का बेदाग और पूरी तरह से विश्वसनीय होना अनिवार्य है। गवाही में विरोधाभास हैं, तो बिना स्वतंत्र पुष्टि के आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यहां युवती के बयानों में कई तरह का विरोधाभास है।
सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन, 3 जरूरी सवालों के जवाब
1. गाइडलाइन बनाने का आदेश कब और क्यों दिया?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मार्च 2025 में आदेश दिया कि नाड़ा तोड़ना, निजी अंग पकड़ना रेप की कोशिश नहीं सिर्फ क्राइम की तैयारी थी, वास्तविक प्रयास नहीं। इसी केस पर सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 को आदेश दिया- यह रेप की कोशिश ही है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी को यौन अपराध मामलों की सुनवाई के लिए गाइडलाइंस तैयार करने का निर्देश दिया था।
कोर्ट ने कहा था कि इसका मकसद न्यायाधीशों में संवेदनशीलता और करुणा विकसित करना होना चाहिए, ताकि ऐसे मामलों की सुनवाई पीड़ित केंद्रित और गरिमापूर्ण तरीके से हो। खासतौर पर कहा कि गाइडलाइंस में भारत का सामाजिक तानाबाना दिखना चाहिए, इन्हें विदेशों की न्यायिक व्यवस्था से न शामिल कर लिया जाए।
2. गाइडलाइन पर एक्सपर्ट कमेटी को क्या निर्देश दिए थे?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि समाज में कई ऐसे अपमानजनक शब्द प्रचलित हैं, जिनका इस्तेमाल अक्सर स्थानीय बोलियों में खुलेआम किया जाता है। इनमें से कई शब्द अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं, लेकिन लोग अक्सर यह समझे बिना उनका इस्तेमाल करते हैं।
अगर एक्सपर्ट कमेटी देश की विभिन्न भाषाओं और बोलियों में प्रचलित ऐसे अपमानजनक शब्दों और अभिव्यक्तियों की पहचान कर सके तो ऐसे शब्दों को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। इनका इस्तेमाल होने से रोका जा सकेगा और यौन अपराध के शिकायतकर्ता व पीड़ित अपने साथ हुई प्रताड़ना और मानसिक आघात का अधिक सटीक और पूर्ण ब्योरा अदालत के सामने रख सकेंगे। पुलिस, वकील और अदालतें उनकी गंभीरता को समझ सकेंगे।
3. किन-किन जगहों पर होगा इस गाइडलाइन का इस्तेमाल?
गाइडलाइन/कॉपी बुक सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और जिला अदालतों की वेबसाइट पर अपलोड करने के आदेश दिए गए थे। इसे नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी, सभी राज्य न्यायिक अकादमियों, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के विधि विभागों को भी भेजे जाने को कहा गया था।
भारतीय कानून में ‘रेप की कोशिश’ किसे माना जाता है?
25 अक्टूबर 2021 को एक अन्य केस की सुनवाई के दौरान रेप की तैयारी और रेप की कोशिश में फर्क बताया गया था...
रेप की तैयारी: इसमें अपराध की योजना बनाना, साधन जुटाना या इरादा करना शामिल है। यह अपराध शुरू होने से पहले का चरण है। कानून इस प्रयास के लिए सजा देता है, भले ही अपराध पूरा हुआ हो या नहीं। प्रयास करने वाले को सजा दी जाती है क्योंकि इसमें भी गलत इरादा होता है और यह समाज को नुकसान पहुंचाता है।
रेप की कोशिश: जब तैयारी खत्म हो जाती है और अपराध को पूरा करने की ओर सीधा कदम उठाया जाता है, तो वह कोशिश कहलाती है। तैयारी खत्म होने के बाद कोशिश शुरू होती है, लेकिन यह अपराध के पूरे होने से पहले रुक जाता है। अगर कोशिश नाकाम रहती है तब भी कानून सजा देता है क्योंकि इरादा और नैतिक गलती मौजूद होती है।
पटना हाईकोर्ट के इस फैसले का असर, एक्सपर्ट की राय
पटना हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट सर्वदेव सिंह कहते हैं कि हाईकोर्ट ने कानून के तहत ही फैसला सुनाया है। इसका निगेटिव इम्पैक्ट पड़ना गलत है। हालांकि, लोगों के बीच इस फैसले को लेकर आक्रोश भी हो सकता है।
मगध महिला कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर और साइकोलॉजिस्ट निधि सिंह ने कहा कि ऐसे फैसलों से महिलाओं और बच्चियों में न्याय प्रणाली के प्रति अविश्वास बढ़ेगा। इतनी गंभीर घटना को 'हल्की' धाराओं में बदल दिया जाएगा तो पीड़ित शिकायत करने और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने से हिचकेंगी। अपराधियों का मनोबल बढ़ेगा।
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