पटना HC के ‘सलवार उतारने’ को रेप न मानने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराज़गी, CJI बोले‑‘आरोपी को सुना जाए’
पटना हाई कोर्ट ने 2008 के एक यौन अपराध में महिला की सलवार उतारने और छाती दबाने को रेप की कोशिश नहीं माना, जबकि इसे गरिमा भंग के अपराध के रूप में ही दंडित किया गया। इस निर्णय को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर संज्ञान लिया और सीजेआई ने कहा कि आरोपी को सुने बिना फैसले को रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत ने मामले की वास्तविक तथ्यों की जांच करने का आदेश दिया है।

सौजन्य से:- ABP News
सलवार उतारने की कोशिश रेप का प्रयास नहीं? पटना HC के फैसले पर SC नाराज, CJI बोले- 'हम...'
सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के बयान पर संज्ञान लिया है. हाई कोर्ट ने कहा था कि इन घटनाओं से महिला की गरिमा भंग करने का अपराध बनता है, लेकिन रेप की कोशिश का अपराध साबित नहीं होता.
महिला की सलवार उतारने की कोशिश और उसके सीने को दबाने की घटना को रेप की कोशिश नहीं मानने वाले पटना हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है. सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर स्वतः संज्ञान लिया है. चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने कहा कि इस मामले के तथ्यों को देखा जाएगा. बेंच ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट के फैसले में कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां हैं.
चीफ जस्टिस का बयान
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा, "हम आरोपी को सुने बिना हाई कोर्ट के फैसले को रद्द नहीं कर सकते." उन्होंने सुनवाई में मौजूद बिहार के एडवोकेट जनरल एस डी संजय से कहा कि वह आरोपी तक नोटिस पहुंचाना सुनिश्चित करें. इसके लिए स्थानीय पुलिस की मदद ली जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के जिस फैसले पर संज्ञान लिया है, वह 9 जुलाई को आया था. हाई कोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने एक व्यक्ति की अपील मंजूर करते हुए उसे रेप की कोशिश के आरोप से बरी कर दिया था. मामला 2008 का था और बिहार के बांका जिले से जुड़ा था.
केस के तथ्यों के मुताबिक पीड़िता अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने के लिए आरोपी के स्टूडियो गई थी. आरोपी ने पिता को बाहर इंतजार करने को कहा और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. आरोप है कि उसने महिला की सलवार उतारने की कोशिश की और उसके सीने को दबाकर उसके साथ छेड़छाड़ की. पीड़िता के शोर मचाने पर उसके पिता ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, जिसके बाद आरोपी वहां से भाग गया.
हाई कोर्ट का तर्क
हाई कोर्ट ने कहा था कि इन घटनाओं से महिला की गरिमा भंग करने का अपराध बनता है, लेकिन रेप की कोशिश का अपराध साबित नहीं होता. कोर्ट ने कहा था कि रेप की कोशिश साबित करने के लिए ऐसे साफ गतिविधि होनी चाहिए जो रेप की मंशा दिखाए. हाई कोर्ट ने आरोपी को धारा 376 के तहत हुई सजा रद्द कर दी थी और मामले को आईपीसी की धारा 354 के तहत माना था.
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला वरिष्ठ वकीलों शोभा गुप्ता और एच एस फुल्का ने उठाया. उन्होंने जजों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि इसी साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक ऐसे फैसले को रद्द किया था. हाई कोर्ट ने नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ने, पायजामे की डोरी तोड़ने और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश को रेप की कोशिश नहीं माना था. हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देश भर की अदालतों को यौन अपराधों की सुनवाई में संवेदनशीलता बरतने का निर्देश दिया था.
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