सुप्रीम कोर्ट: सेल डीड रजिस्टर्ड होने पर आंशिक भुगतान से भी स्वामित्व हस्तांतरित, बकाया वसूली का मुकदमा आवश्यक
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि सेल डीड के रजिस्टर होने पर, भले ही केवल आंशिक भुगतान किया गया हो, संपत्ति का स्वामित्व खरीदार को मिल जाता है। शेष राशि की वसूली के लिए विक्रेता को धन वसूली का मुकदमा दायर करना होगा, सेल डीड को रद्द नहीं किया जा सकता।

सौजन्य से:- Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेल डीड के निष्पादन के समय पूरी बिक्री कीमत का भुगतान होना बिक्री को वैध बनाने के लिए अनिवार्य नहीं है। बिक्री कीमत का केवल कुछ हिस्सा दिया गया हो, संपत्ति का स्वामित्व खरीदार को हस्तांतरित हो जाता है।
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि सेल डीड ( Sale Deed ) के निष्पादन के समय पूरी बिक्री कीमत का भुगतान होना बिक्री को वैध बनाने के लिए अनिवार्य नहीं है। यदि बिक्री मूल्य का कुछ हिस्सा चुका दिया गया है और सेल डीड रजिस्टर्ड हो चुका है, तो केवल शेष रकम का भुगतान न होने के आधार पर सेल डीड यानी बिक्री विलेख को रद्द नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने अपने फैसले कहा कि सेल डीड रजिस्टर्ड होने के साथ ही, भले ही बिक्री कीमत का केवल कुछ हिस्सा दिया गया हो, संपत्ति का स्वामित्व खरीदार को हस्तांतरित हो जाता है। शेष बिक्री मूल्य की वसूली के लिए विक्रेता को धन वसूली का मुकदमा दायर करना होगा, न कि सेल डीड रद्द कराने की मांग करनी होगी।
सेल डीड पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब विक्रेता को यह पूरी जानकारी थी कि बिक्री के समय केवल आंशिक भुगतान किया जा रहा है और इसी आधार पर बिक्री विलेख निष्पादित किया गया, तो बाद में शेष रकम का भुगतान न होने के कारण संपत्ति की रजिस्ट्री को शून्य या निष्प्रभावी नहीं माना जा सकता। बेंच ने कहा कि, “सेल डीड रजिस्टर्ड होने पर, बिक्री मूल्य के आंशिक भुगतान के बावजूद, संपत्ति का स्वामित्व खरीदार को हस्तांतरित हो जाता है। शेष रकम का भुगतान नहीं होने पर विक्रेता का अधिकार बकाया राशि की वसूली तक सीमित है।'' कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित खरीदार को शेष बिक्री मूल्य ब्याज सहित चुकाना होगा। इसके बाद यदि वह संपत्ति का कब्जा चाहता है तो उसके लिए कानून के मुताबिक कदम उठा सकता है।
सेल डीड रजिस्टर्ड होने पर, बिक्री मूल्य के आंशिक भुगतान के बावजूद, संपत्ति का स्वामित्व खरीदार को हस्तांतरित हो जाता है। शेष रकम का भुगतान नहीं होने पर विक्रेता का अधिकार बकाया राशि की वसूली तक सीमित है।
सुप्रीम कोर्ट
क्या था पूरा मामला?
विवाद दो बिक्री विलेखों से जुड़ा था, जिन्हें मूल वादियों ने मूल प्रतिवादी के पक्ष में निष्पादित किया था। दोनों संपत्तियों के लिए बिक्री मूल्य 7,000-7,000 रुपये तय हुआ था। बिक्री विलेख के निष्पादन के समय प्रत्येक संपत्ति के लिए 2,500 रुपये का भुगतान किया गया। बाकी 4,500 रुपये की राशि खरीदार ने अपने पास रखी थी, ताकि विक्रेताओं पर विभिन्न वित्तीय संस्थानों और सरकारी विभागों का बकाया चुकाया जा सके। इस व्यवस्था का उल्लेख बिक्री विलेख में भी किया गया था। बाद में विक्रेताओं ने अदालत में मुकदमा दायर कर दोनों बिक्री विलेखों को शून्य और निष्प्रभावी घोषित करने तथा उन्हें रद्द करने की मांग की। उन्होंने संपत्ति पर अपना स्वामित्व घोषित करने और प्रतिवादी के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा जारी करने की भी मांग की।
निचली अदालतों ने खारिज किया था मुकदमा
ट्रायल कोर्ट ने वाद खारिज कर दिया था। उसका फैसला प्रथम अपीलीय अदालत ने भी बरकरार रखा। इसके बाद वादी हाईकोर्ट पहुंचे। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने दूसरी अपील में निचली अदालतों के समवर्ती निष्कर्षों में हस्तक्षेप किया और बिक्री विलेख के संबंध में अलग निष्कर्ष दिया। इसके खिलाफ प्रतिवादियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट ने बहाल किया ट्रायल कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट के निर्णय को बहाल कर दिया। जस्टिस चंद्रन द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि विक्रेताओं के पास शेष बिक्री मूल्य की वसूली के लिए धन वसूली का मुकदमा दायर करने का अधिकार था, लेकिन वे केवल बकाया भुगतान न होने के आधार पर बिक्री विलेख को रद्द नहीं करा सकते थे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के कब्जे के संबंध में निचली अदालतों के आदेश में हस्तक्षेप नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि खरीदार को शेष राशि ब्याज सहित अदा करनी होगी और कब्जे के लिए अलग से कानून के अनुरूप कदम उठाना होगा।
लेखक के बारे मेंराजेश चौधरीराजेश चौधरी 2007 से नवभारत टाइम्स से जुड़े हुए हैं। वह दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, निचली अदालत और सीबीआई से जुड़े विषयों को कवर करते हैं और स्पीड न्यूज में भी आपको इस बारे में खबर देते रहेंगे। यदि आपके पास कोर्ट से जुड़े मामलों की कोई सूचना है तो आप उनसे इस ईमेल अड्रेस - journalistrajesh@gmail.com - पर संपर्क कर सकते हैं।... और पढ़ें
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