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SC आयोग की शक्ति की सीमा पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: कार्यकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि स्वतंत्र आयोगों को न्यायिक आदेश ना देने की हद से परे कोई कार्य नहीं कर सकते. इससे मुंबई बंदरगाह प्राधिकरण ने निष्कर्ष निकालने के बाद यह फैसला किया कि कोई भी व्यक्ति स्थाई रूप से अपनी सेवाएं छोड़ सकता है.

29 जुलाई 2026 को 01:53 am बजे
SC आयोग की शक्ति की सीमा पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: कार्यकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण

सौजन्य से:- Amar Ujala

एससी आयोग की ताकत की सीमा तय: बकाया वेतन के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की रोक; क्या है मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को कर्मचारियों के बकाया वेतन के भुगतान का आदेश देने का अधिकार नहीं है। अदालत के अनुसार आयोग केवल जांच, सिफारिश और सलाह दे सकता है, जबकि बाध्यकारी आदेश जारी करना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।

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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति (एससी) आयोग किसी कर्मचारी के बकाया वेतन के भुगतान का आदेश जारी नहीं कर सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 338, 338ए और 338बी के तहत गठित आयोगों की भूमिका केवल सलाहकारी और सिफारिशी है। इन्हें न्यायिक फैसले सुनाने या बाध्यकारी आदेश जारी करने का अधिकार नहीं दिया गया है।

आखिर मामला क्या था?

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि ये आयोग सामाजिक न्याय के उद्देश्य से बनाए गए हैं, लेकिन इन्हें न्यायिक कार्य करने की शक्ति नहीं सौंपी गई है। मामला मुंबई बंदरगाह प्राधिकरण से जुड़ा है। अनुसूचित जाति की महिला कर्मचारी माधवी चंदोरकर ने पदोन्नति मिलने के बाद डिमोशन किए जाने के खिलाफ राष्ट्रीय एससी आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी। आयोग ने 23 अक्तूबर, 2024 को आदेश जारी करते हुए आरक्षण रोस्टर में सुधार करने, नियमों के अनुसार पदोन्नति देने और 30 दिनों के भीतर बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया था। मुंबई बंदरगाह प्राधिकरण ने इस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने आयोग के आदेश को सही ठहराया। इसके बाद प्राधिकरण सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

ये भी पढ़ें: Supreme Court: पर्यावरण मंजूरी से जुड़े मामले में आज आएगा अहम फैसला, सुप्रीम कोर्ट पर टिकी नजरें

सुप्रीम कोर्ट ने आयोग की शक्तियों पर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आयोग को जांच करने, साक्ष्य लेने और गवाहों से पूछताछ करने जैसी शक्तियां प्राप्त हैं, लेकिन वह बकाया भुगतान जैसे बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि विधायिका ने आयोग की भूमिका स्पष्ट रूप से सलाहकारी और सिफारिशी रखी है, न कि न्यायिक। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए मुंबई बंदरगाह प्राधिकरण की अपील स्वीकार कर ली। अदालत ने कहा कि बकाया भुगतान का निर्देश संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है, इसलिए वह कानूनी रूप से अमान्य है।

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