सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी कर्मचारी को रिश्वत के आरोप से बरी किया, सीबीआई की जांच में खामियों को रेखांकित किया
दो दशकों से पुरानी भ्रष्टाचार केस में सुप्रीम कोर्ट ने सभी आरोपों से सरकारी कर्मचारी को मुक्त कर दिया और कहा कि सीबीआई ने ट्रैप को पूरा चलाने नहीं दिया, जिससे जांच में गंभीर कमी और जल्दबाजी दिखी। अभियोजन पक्ष ने यह सिद्ध नहीं किया कि बरामद रकम अंततः आरोपी तक पहुँची, इसलिए आरोपों को साबित नहीं माना गया।

सौजन्य से:- amarujala.com
रिश्वत के मामले में सरकारी कर्मचारी बरी: अदालत ने सीबीआई की जांच में क्या खामियां गिनाई? जानें पूरा मामला
दो दशक से ज्यादा एक पुराने भ्रष्टाचार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक सरकारी कर्मचारी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। मामला रिश्वत मांगने और ट्रैप के जरिए रकम बरामद करने से जुड़ा था। अदालत ने कहा कि सीबीआई ने ट्रैप को अपने पूरे रास्ते तक नहीं चलने दिया और जांच में गंभीर खामियां व जल्दबाजी दिखाई। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं...
विस्तार
दो दशक से ज्यादा पुराने भ्रष्टाचार के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी कर्मचारी को बड़ी राहत देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया है। मामला कथित रिश्वत मांगने और सीबीआई की ओर से बिछाए गए ट्रैप से जुड़ा था। अदालत ने जांच के तरीके पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि ट्रैप को अपने पूरे रास्ते तक चलने नहीं दिया गया। साथ ही सीबीआई की जांच में गंभीर खामी और जल्दबाजी दिखाई दी। अदालत ने कहा कि बरामद रकम वास्तव में आरोपी तक पहुंचनी थी, यह अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर सका।
क्या था पूरा मामला और सरकारी कर्मचारी पर क्या आरोप लगे थे?
मामला उस समय का है, जब आरोपी रेलवे सुरक्षा बल में डिविजनल सिक्योरिटी कमिश्नर के पद पर तैनात था। आरोप था कि उसने अपने पद का गलत इस्तेमाल करते हुए आरपीएफ के कर्मचारियों से तबादले, तैनाती और दूसरी सेवा संबंधी सुविधाओं के बदले अवैध रकम की मांग की। आरोप के मुताबिक यह रकम उसके अधीन काम करने वाले अधिकारियों और दूसरे लोगों के जरिए ली जानी थी। जांच के बाद अलग-अलग कथित लेनदेन को लेकर कई अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गईं और कई मुकदमे भी शुरू हुए। इस मामले में निचली अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया था, जबकि मई 2024 में केरल हाईकोर्ट ने भी उसकी सजा बरकरार रखी थी।
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सीबीआई ने ट्रैप कैसे किया और सुप्रीम कोर्ट को क्या खटका?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता ने 3 अगस्त 2005 को सीबीआई को कथित रिश्वत की मांग की जानकारी दी थी। इसके अगले ही दिन 4 अगस्त को एफआईआर दर्ज की गई और उसी दिन ट्रैप भी कर दिया गया। अदालत ने इस बात पर ध्यान दिया कि औपचारिक एफआईआर दर्ज होने से पहले ही सीबीआई ने रिश्वत की शिकायत की जांच शुरू कर दी थी। साथ ही ट्रैप के लिए दो स्वतंत्र गवाहों की व्यवस्था भी बेहद कम समय में की गई। अदालत ने माना कि इतनी तेजी से ट्रैप आयोजित करने के लिए जांच एजेंसी को सीधे तौर पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन जांच की इस जल्दबाजी से संदेह जरूर पैदा होता है। अदालत के मुताबिक निचली अदालत ने इन संदेहों को नजरअंदाज कर दिया था।
ट्रैप को पूरा क्यों नहीं चलाया गया, सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर बरामद रिश्वत की रकम आखिरकार आरोपी तक पहुंचनी थी, तो सीबीआई को आरोपी पर नजर रखनी चाहिए थी। जांच एजेंसी ने बाद में मामले में सरकारी गवाह बने व्यक्ति पर नजर रखी, लेकिन आरोपी तक रकम पहुंचने की पूरी कड़ी को सामने नहीं आने दिया। अदालत ने कहा कि अगर जांच एजेंसी ने इस प्रक्रिया को पूरा होने दिया होता, तो आरोपी की कथित भूमिका को लेकर कहीं ज्यादा सीधा और मजबूत सबूत सामने आ सकता था। अदालत ने जांच में इसे सीबीआई की गंभीर खामी और जल्दबाजी बताया। अदालत ने कहा कि इस कमी का लाभ आरोपी को मिलना चाहिए।
भ्रष्टाचार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सबूत को लेकर क्या कहा?
पीठ ने कहा कि भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत सिर्फ पैसे का एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचना अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना जरूरी है कि सरकारी कर्मचारी ने कानूनी वेतन के अलावा किसी रकम की मांग की, उसे स्वीकार किया या हासिल किया और यह रकम किसी सरकारी काम को करने, रोकने या सुविधा देने के बदले मांगी गई थी। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में रिश्वत की मांग और उसकी स्वीकारोक्ति का सबूत बेहद महत्वपूर्ण है। इस मामले में जांच और ट्रैप को लेकर बने उचित संदेह के कारण आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं माना जा सकता। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोनों अपीलें मंजूर करते हुए सरकारी कर्मचारी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
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