हिमाचल हाईकोर्ट ने चेक बाउंस केस में गैरहाजिर आरोपी के हिरासत आदेश को बरकरार रखा
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि बार-बार अदालत से गैरहाजिर रहने वाले आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजना वैध है। ट्रायल कोर्ट के आदेश के अनुसार आरोपी को जमानत की शर्तों का उल्लंघन करने के बाद गैर-जमानती वारंट जारी कर के हिरासत में रखा गया, जिसे हाईकोर्ट ने बरकरार रखा।

सौजन्य से:- ETV Bharat
चेक बाउंस केस: बार-बार अदालत से गैरहाजिर आरोपी को हिरासत में भेजने का आदेश बरकरार
हाईकोर्ट ने कहा कि, जो आरोपी खुद अदालती कार्यवाही में बाधा डालता है, उसे हिरासत में लेना पूरी तरह जायज है.
By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : August 28, 2026 at 12:21 PM IST
|Updated : August 28, 2026 at 12:26 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने चेक बाउंस के एक मामले में बार-बार अदालत से गैरहाजिर रहने वाले आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजने के ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है. न्यायाधीश राकेश कैंथला ने निचली अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए आरोपी की याचिका खारिज कर दी. हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जो आरोपी खुद अदालती कार्यवाही में बाधा डालता है, उसे हिरासत में लेना पूरी तरह जायज है. आरोपी के खिलाफ शिमला की ट्रायल कोर्ट में चेक बाउंस का मामला लंबित है. कोर्ट ने आरोपी को पेश होने के आदेश दिए थे, लेकिन वह सुनवाई की तारीखों पर लगातार गैरहाजिर रहा. इसके बाद निचली अदालत ने उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर दिए.
चेक बाउंस मामले में आरोपी को हिरासत में भेजने का आदेश बरकरार
हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 478(2) का भी हवाला दिया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई आरोपी जमानत की शर्तों का उल्लंघन करता है, तो वह अगली बार अधिकार के रूप में जमानत का दावा नहीं कर सकता. अदालत ने माना कि आरोपी का बार-बार सुनवाई से अनुपस्थित रहना और उसके खिलाफ पहले गैर-जमानती वारंट जारी होना यह दर्शाता है कि उसने अदालती कार्यवाही में सहयोग नहीं किया. ऐसे आरोपी को हिरासत में लेना न्यायिक प्रक्रिया को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने के लिए उचित है. इन परिस्थितियों को देखते हुए न्यायाधीश राकेश कैंथला ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में किसी तरह का हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए आरोपी की याचिका खारिज कर दी.
आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश गलत नहीं
दरअसल, गैर-जमानती वारंट जारी होने के बाद आरोपी ने अदालत में आत्मसमर्पण किया और वारंट रद्द करने की अर्जी दाखिल की. ट्रायल कोर्ट ने उसकी अर्जी पर मामले को अगली सुनवाई के लिए टाल दिया और आरोपी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. आरोपी ने ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. हाईकोर्ट के समक्ष मामले की सुनवाई के दौरान पाया गया कि आरोपी के खिलाफ पहले भी गैर-जमानती वारंट जारी हो चुके थे. कोर्ट ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण मानते हुए कहा कि, इससे स्पष्ट होता है कि आरोपी जानबूझकर सुनवाई में देरी कर रहा था. ऐसे में ट्रायल कोर्ट की ओर से आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजने के आदेश को गलत नहीं माना जा सकता.
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