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लिव-इन में भी महिलाओं को मिलेगा कानूनी संरक्षण

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, यदि कोई महिला लिव-इन रिलेशनशिप में विवाह की मंशा के साथ रहती है, तो उसे आईपीसी की धारा 498ए के तहत वही संरक्षण मिलेगा जो किसी विवाहिता को मिलता है। यह फैसला घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

7 अगस्त 2026 को 05:15 am बजे
लिव-इन में भी महिलाओं को मिलेगा कानूनी संरक्षण

सौजन्य से:- Navbharat Times

मिलेगा संरक्षण: शीर्ष अदालत ने डॉ. लोकेश बीएच बनाम कर्नाटक सरकार मामले में 3 अगस्त को फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर लिव इन रिलेशनशिप में विवाह की मंशा दिखती है, तो महिला को IPC की धारा 498A के तहत वैसा ही कानूनी संरक्षण मिलेगा, जो किसी विवाहिता को मिलता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह के पीठ ने कहा कि महज शादी का औपचारिक प्रमाण नहीं होने के आधार पर किसी महिला को इस सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

कानूनी मान्यता: सुप्रीम कोर्ट लिव इन रिलेशनशिप को पहले ही कानूनी मान्यता दे चुका है। 2010 में न्यायालय ने कहा था कि लिव इन में रहने वाली महिला को भी कुछ मानदंड पूरा होने पर गुजारा भत्ता मिलना चाहिए। 14 जून 2022 को कोर्ट ने माना था कि अगर कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी के तौर पर रहते हैं, तो परिस्थितियों के आधार पर उस संबंध को विवाह माना जा सकता है। एक अन्य फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत संरक्षण और गुजारा भत्ता के लिए अदालत का रुख कर सकती है।

विवाह पर निर्भर नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा कि 498A के तहत मिलने वाला संरक्षण केवल विवाहिताओं के लिए सीमित नहीं रहेगा। कानून की इस धारा का उद्देश्य घरेलू हिंसा से महिलाओं की रक्षा करना है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 के तहत किसी साथी के साथ रहने का निर्णय व्यक्ति की गरिमा और निजी स्वतंत्रता का हिस्सा है। इसीलिए महिला की सुरक्षा केवल औपचारिक विवाह पर निर्भर नहीं हो सकती।

दंड देना उद्देश्य: अदालत में सरकार ने दलील दी थी कि घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act) पहले से लिव इन संबंधों में महिलाओं को संरक्षण देता है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि घरेलू हिंसा अधिनियम मुख्य रूप से सिविल राहत देता है, जबकि IPC की धारा 498A एक आपराधिक प्रावधान है, जिसका उद्देश्य महिलाओं के साथ घरेलू क्रूरता करने वाले व्यक्ति को दंडित करना है। अदालत ने दोहराया कि जब प्रताड़ना समान है, तो संवैधानिक संरक्षण भी समान होना चाहिए।

दलील खारिज: इस मामले में आरोपी पुरुष की दलील थी कि दोनों की शादी नहीं हुई है, इसलिए IPC की धारा 498A लागू नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट ने यह तर्क खारिज करते हुए कहा कि किसी कानून की ऐसी संकीर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे उसका मूल उद्देश्य ही विफल हो जाए। कोर्ट ने निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनना किसी भी व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता का हिस्सा है। कानून एक ओर अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने की आजादी दे और दूसरी ओर उसी आधार पर सुरक्षा से वंचित करे, यह स्वीकार्य नहीं। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल वही संबंध संरक्षण के दायरे में आएंगे जो वास्तव में विवाह जैसी प्रकृति के हों, जिनमें दोनों वयस्क हों और विवाह की स्पष्ट मंशा स्थापित हो सके।

सोच का विस्तार: यह फैसला सुप्रीम कोर्ट की विकसित होती न्यायिक सोच की अगली कड़ी है। पिछले कुछ बरसों में अदालत ने अपने कई फैसलों से यह स्पष्ट किया है कि महिलाओं के अधिकार केवल विवाह की तकनीकी वैधता तक सीमित नहीं हो सकते। 2010 में लिव इन संबंधों को सीमित कानूनी मान्यता देने और जून 2022 में लंबे समय तक साथ रहने वाले जोड़ों को परिस्थितियों के आधार पर विवाहित मानने की धारणा को स्वीकार करने के बाद अब धारा 498A पर यह फैसला उसी सोच का विस्तार है।

सामाजिक बदलाव: अदालत ने संकेत दिया है कि न्याय का आधार किसी भी रिश्ते की वास्तविकता होनी चाहिए, न कि केवल विवाह प्रमाणपत्र। यदि कोई महिला व्यवहार में पत्नी की तरह जीवन जी रही है और उसी संबंध में प्रताड़ना झेलती है, तो उसे कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए। यह फैसला भारतीय पारिवारिक कानून को सामाजिक बदलावों के अनुरूप ढालने की दिशा में मील का पत्थर माना जा सकता है।

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