बेटियों को पिता की प्रॉपर्टी में बराबर का हिस्सा
हिमाचल हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि बेटी का पिता की प्रॉपर्टी में उतना ही अधिकार है जितना कि बेटे का. यह फैसला हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत दिया गया है. अब बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबर का हिस्सा मिलेगा.

सौजन्य से:- ETV Bharat
पिता की प्रॉपर्टी पर बेटे जैसा ही बेटी का भी अधिकार, हिमाचल हाईकोर्ट का हिंदू उत्तराधिकार कानून पर बड़ा फैसला
पिता की प्रॉपर्टी में बेटी के हक को लेकर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है.
By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : August 12, 2026 at 9:34 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि पिता की प्रॉपर्टी पर बेटी का भी उतना ही अधिकार है, जितना कि बेटे का. हिंदू उत्तराधिकार कानून पर ये बड़ा फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने सारी स्थिति को स्पष्ट किया है. हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने ये फैसला दिया है. न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने स्पष्ट किया है कि पैतृक संपत्ति पर बेटियों का उतना ही कानूनी अधिकार है जितना कि बेटों का. हिमाचल के ऊना जिला से जुड़े एक मामले में उपरोक्त फैसला सुनाते हुए अदालत ने अपीलकर्ता की अपील को खारिज कर दिया.
दरअसल, ऊना जिला के व्यक्ति करतार चंद की संपत्ति को लेकर विवाद चल रहा था. करतार चंद की मौत हो गई थी और उन्होंने कोई वसीयत नहीं बनाई थी. यानी करतार चंद की मृत्यु बिना वसीयत बनाए हो गई थी. आरोप था कि करतार चंद के देहावसान के बाद बेटे रोशन लाल ने राजस्व विभाग के स्टाफ की मिलीभगत से जमीन का इंतकाल अपने नाम करवा लिया. रोशन लाल का दावा था कि साल 1985 में ही उनके पिता और भाइयों के बीच मौखिक विभाजन हो चुका था.
हालांकि, पूर्व की अदालती कार्यवाही में जिला जज ऊना ने इसे वैध पार्टिशन डीड मानने से साफ इनकार कर दिया था. इस कारण हिमाचल हाईकोर्ट ने इस दावे को रेस ज्यूडिकाटा यानी पूर्व न्याय के सिद्धांत के तहत दोबारा सुनने से मना कर दिया था. यहां बता दें कि रेस ज्यूडिकाटा का सिद्धांत ये है कि एक ही विवाद पर एक दफा अंतिम निर्णय हो गया तो उसी विवाद को फिर से अदालत में नहीं लाया जा सकता.
खैर, मामले में अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी थी कि हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम भविष्य के मामलों के लिए लागू होता है. इसलिए बेटियों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं मिल सकता. इस दलील को खारिज करते हुए ने हाईकोर्ट ने कहा कि बेटी एक बेटे की तरह जन्म लेते ही पैतृक संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार बन जाती है. अदालत ने कहा कि कानून संशोधन (9 सितंबर 2005) के समय पिता का जीवित होना कतई अनिवार्य नहीं है. भले ही बेटी का जन्म 2005 के संशोधन से पहले हुआ हो, वह इस कानून के तहत अपने अधिकारों का दावा कर सकती है. अदालत ने कहा कि राजस्व अधिकारियों ने पूर्व के अदालती आदेशों को नजरअंदाज कर गलत तरीके से म्यूटेशन मंजूर किया था. इसी के साथ हाईकोर्ट ने रोशन लाल की अपील को खारिज करते हुए बेटियों के हक को बरकरार रखा.
ये भी पढ़ें: हिमाचल हाईकोर्ट का सरकार को झटका, अदालत का ऐतिहासिक फैसला, दबाव में वसूल किया अतिरिक्त बिजली शुल्क रिफंड करे सरकार
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