सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश को रोकते हुए जिलाधिकारी मेधा रूपम को राहत दी
सुप्रीम कोर्ट ने उस हाई कोर्ट के निर्देश पर रोक लगाई, जिसमें गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम को छात्रा आकृति चौधरी की NSA‑हिरासत के लिये 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश था। कोर्ट ने सभी पक्षों की सुनवाई के बाद, मामले की पूर्ण सुनवाई अक्टूबर 7, 2026 को तय की और अस्थायी आदेश को बरकरार रखा।

सौजन्य से:- ETV Bharat
जिलाधिकारी मेधा रूपम को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाई
उच्च न्यायालय ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत रद्द करते हुए जिलाधिकारी को मुआवजा देने का निर्देश दिया था.
By Sumit Saxena
Published : September 23, 2026 at 8:27 PM IST
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम को नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन के सिलसिले में छात्रा आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत में लेने के लिए अपनी सैलरी से 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था.
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि सभी पक्षों के वरिष्ठ वकीलों को सुनने के बाद, इस अदालत की राय है कि जब तक इस मामले में गुण-दोष के आधार पर सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक विवादित निर्णय, विशेष रूप से पैरा संख्या 27 से 33 के क्रियान्वयन पर रोक रहेगी.
पीठ ने मामले में अगली सुनवाई 7 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की है. पीठ ने मामले में नोटिस जारी किया.
पीठ ने कहा, "मिस्टर कॉलिन गोंजाल्विस, विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता, जो प्रतिवादी संख्या 1 की ओर से गुहार पर उपस्थित हुए हैं, उनकी ओर से नोटिस स्वीकार करते हैं. प्रतिवादी संख्या 2 से 6 को भी नोटिस जारी किया जाए. याचिकाकर्ता सामान्य रूप से नोटिस तामील करने के अतिरिक्त, प्रतिवादी संख्या 2 और 3 को उनके संबंधित स्टैंडिंग काउंसिल के माध्यम से भी नोटिस तामील कराएगा.
इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने जिलाधिकारी मेधा रूपम की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. जिलाधिकारी मेधा रूपम और उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से उच्च न्यायालय के 2 सितंबर के फैसले के खिलाफ अपील की गई थी.
उच्च न्यायालय ने इस साल अप्रैल में नोएडा में वेतन वृद्धि को लेकर मजदूरों के प्रदर्शन के सिलसिले में दिल्ली यूनिवर्सिटी की 25 वर्षीय छात्रा आकृति चौधरी की हिरासत रद्द कर दी थी. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखा.
बुधवार को सुनवाई के दौरान, मेहता ने जिलाधिकारी के खिलाफ उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणियों को चुनौती दी. वकील ने इस बात पर जोर दिया कि उच्च न्यायालय अधिकारी को फटकार लगाए बिना भी हिरासत के आदेश को रद्द कर सकता था. पीठ को बताया गया कि हिरासत में लई गई छात्रा मानेसर में इसी तरह के मजदूरों के असंतोष को भड़काने में शामिल थी. यह दलील दी गई कि जब आंदोलन वहां शिफ्ट हुआ, तो वह गौतम बुद्ध नगर आ गई.
मेहता ने दलील दी कि मेधा रूपम को बिना कोई नोटिस जारी किए यह आदेश पारित किया गया. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ सख्त टिप्पणियां की, जबकि वह हिरासत का आदेश (detention order) जारी करने में शामिल कई अधिकारियों में से एक थीं. मेहता ने कहा कि उनके खिलाफ की गई ये टिप्पणियां गैर-जरूरी और अनुचित थीं.
यह तर्क दिया गया कि गिरफ्तारी 12 अप्रैल को हुई थी और NSA के तहत हिरासत का प्रस्ताव स्थानीय पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी (SHO) द्वारा दिया गया था. पीठ को सूचित किया गया कि जिलाधिकारी के पास पहुंचने से पहले इस प्रस्ताव की कई अधिकारियों द्वारा समीक्षा की गई थी.
आकृति चौधरी का पक्ष रख रहे वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंसाल्वेस ने उच्च न्यायालय के आदेश को सही ठहराया. उच्च न्यायालय ने पाया था कि उनकी हिरासत राज्य सरकार द्वारा "गढ़ी गई" कहानी पर आधारित थी और उन्हें तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया था.
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने आकृति के वकील को जवाब दाखिल करने की अनुमति दी और कहा, "अंतरिम आदेश पर, फैसला सुरक्षित रखा गया है."
हिरासत आदेश पारित करने के तरीके की आलोचना करते हुए, उच्च न्यायालय ने चेतावनी दी थी कि "पथभ्रष्ट" नौकरशाही का लगातार "निरंकुश" आचरण उत्तर प्रदेश को एक सर्वसत्तावादी और दमनकारी समाज (Orwellian Dystopia) में बदल सकता है.
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