सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, क्या शिवसेना के विभाजन का असर विधायी दल पर पड़ा?
सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना के विभाजन के मामले में पूछा है कि क्या इसका असर विधायी दल पर पड़ा है। शिवसेना के विभाजन के मामले में उद्धव ठाकरे गुट ने चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उसे सबसे पहले यह देखना होगा कि क्या शिवसेना में कोई विभाजन हुआ था और क्या यह विभाजन विधायी दल से शुरू होकर संगठन और प्राथमिक सदस्यता तक फैल सकता है।

सौजन्य से:- ETV Bharat
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, क्या पार्टी के विधायकों के बंटवारे का असर शिवसेना पर पड़ा?
उद्धव गुट ने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी, जिसमें एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को 'असली शिवसेना' माना गया.
By Sumit Saxena
Published : August 13, 2026 at 8:01 AM IST
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि उसे सबसे पहले यह देखना होगा कि क्या शिवसेना में कोई विभाजन हुआ था और क्या यह विभाजन विधायी दल से शुरू होकर संगठन और प्राथमिक सदस्यता तक फैल सकता है.
इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने की. बेंच के सामने शिवसेना (UBT) का पक्ष सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने रखा. बेंच उद्धव ठाकरे गुट की उस चुनौती पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी, जिसके तहत एकनाथ शिंदे के गुट को 'असली शिवसेना' माना गया और पार्टी का नाम व चुनाव चिह्न उन्हें सौंप दिया गया.
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने कहा कि पार्टी का बंटवारा एक अलग सवाल है और चुनाव चिह्न का मामला पार्टी से जुड़ा एक अलग मुद्दा है. बंटवारे का फैसला दसवीं अनुसूची के तहत किया जाना है. बेंच ने लेजिस्लेटिव पार्टी (विधायक दल) में बंटवारे और पॉलिटिकल पार्टी (राजनीतिक दल) में बंटवारे के बारे में पूछा. साथ ही, बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता के हलफनामे से पता चलता है कि संगठन और प्राइमरी मेंबरशिप (जिसमें 4 लाख से ज़्यादा शिव सैनिक शामिल हैं) में विरोधी गुट को काफी समर्थन हासिल है. सिब्बल ने कहा कि उनके क्लाइंट के पास 19 लाख सदस्य हैं.
जस्टिस बागची ने कहा, 'सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि क्या कोई विभाजन हुआ है. विभाजन की शुरुआत भले ही लेजिस्लेटिव पार्टी से हो, लेकिन यह संगठन और प्राथमिक सदस्यता तक भी फैल सकता है.' सिब्बल ने संविधान पीठ के एक फ़ैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि विधायी दल में कभी भी विभाजन नहीं हो सकता.
पीठ ने कहा, 'संविधान पीठ का कहना है कि विभाजन की जांच को केवल विधायी दल में विभाजन तक सीमित नहीं रखा जा सकता. लेकिन ऐसा कहीं नहीं कहा गया है कि अगर विधायी दल में विभाजन शुरू होता है और बाद में संगठन और प्राथमिक सदस्यता में भी दिखता है, तो उस पर विचार नहीं किया जा सकता. यह एक बड़े विभाजन का केंद्र-बिंदु हो सकता है.'
बेंच ने कहा कि उसे इस मामले पर स्पष्टता चाहिए. बेंच ने कहा, 'शिंदे गुट को 11 ‘राज्य प्रभारियों’ का समर्थन हासिल था. राज्य प्रभारी पार्टी के ढांचे का ही हिस्सा होते हैं. वे शिवसेना के पार्टी ढांचे से बाहर के लोग नहीं हैं. इससे भी अहम बात यह है कि जब हम किसी राजनीतिक पार्टी पर विचार करते हैं, तो हमारा ध्यान सिर्फ पदाधिकारियों पर ही नहीं होता. हमें (4.48 लाख) प्राथमिक सदस्यों पर भी विचार करना होता है.'
बेंच ने कहा कि एक पदानुक्रम (hierarchy) होता है और उसके भीतर विधायी दल का एक उप-समूह होता है. विधायी दल में दरार पैदा होती है और वह प्राथमिक सदस्यता तक पहुँच जाती है. बेंच ने पूछा कि इस पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग पार्टी के चुनाव चिह्न के आवंटन को किस तरह देखेगा.
सिब्बल ने चुनाव आयोग के उस तरीके पर सवाल उठाए, जिससे उसने यह तय किया कि क्या पार्टी के अंदर कोई असली विवाद था और क्या आयोग के पास जाने वाले गुट ने शिवसेना के संविधान के तहत उपलब्ध सभी आंतरिक उपायों का इस्तेमाल कर लिया था. जस्टिस बागची ने सिब्बल से कहा कि बेंच को इन सवालों पर सिर्फ कानूनी नजरिए से नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत को ध्यान में रखकर फैसला करना होगा.
बेंच ने कहा, 'जब पार्टी में बंटवारा होता है, तो यह एक बदलती हुई स्थिति होती है. ऐसे हालात में चुनाव आयोग ने विरोधी गुट के अस्तित्व और पार्टी की सदस्यता में उसके असर को जरूर ध्यान में रखा होगा.' सिब्बल ने तर्क दिया कि एकनाथ शिंदे को पार्टी की राय लिए बिना सिर्फ विधायी ताकत के आधार पर मुख्यमंत्री बनाया गया था, और पूछा कि अगर जमीनी हकीकत पर नजर डाली जाए तो क्या होगा. सिब्बल ने कहा, 'स्वाभाविक रूप से लोग आपके पास आएंगे. आपको उस जमीनी हकीकत को नहीं भूलना चाहिए.'
सिब्बल ने आगे कहा कि शिंदे को गैर-कानूनी तरीके से सीएम बनाया गया था. उन्होंने कहा, 'फिर आप कहते हैं कि इतने सारे लोग आए हैं. हमारी ताकत देखिए. यह जमीनी हकीकत का दूसरा पहलू है.' सीजेआई ने कहा कि सिब्बल का यह कहना शायद सही नहीं है कि चुनाव आयोग के पास शुरुआत में ही अधिकार-क्षेत्र की कमी है और उसका तरीका गलत हो सकता है. उन्होंने साफ किया कि वे सिर्फ इस खास मामले पर नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की क्षमता और अधिकार-क्षेत्र के सामान्य सिद्धांत पर विचार कर रहे हैं.
सिब्बल ने चुनाव आयोग के उस आकलन को भी चुनौती दी जिसमें शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे, जिसमें पार्टी प्रमुख की शक्तियां और विभिन्न संगठनात्मक पदों को भरने का तरीका शामिल है, का विश्लेषण किया गया था. यह तर्क दिया गया कि चुनाव आयोग का संविधान को तानाशाही वाला बताना, असल में संगठनात्मक ढांचे को विचार-विमर्श से बाहर रखने और अंततः चुनाव चिह्न विवाद पर फैसला करने के लिए विधायी बहुमत पर निर्भर रहने की कोशिश थी.
सिब्बल ने कहा, 'आप पहले ही नतीजे तय कर लेते हैं और फिर उस तक पहुँचने के लिए तर्क को तोड़-मरोड़ते हैं. यह पैरा 15 के तहत परिकल्पित प्रक्रिया के बिल्कुल विपरीत है.' इस मामले की सुनवाई गुरुवार को जारी रहेगी.
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
19 राज्यों-CTP को सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर अधिसूचित करने के लिए प्रेरित किया

कॉकरोच जनता पार्टी पर गंभीर सवाल, सुप्रीम कोर्ट से जांच और कार्रवाई की मांग

सुप्रीम कोर्ट ने कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद को हाई कोर्ट की ओर भेजने का संकेत दिया

सुप्रीम कोर्ट ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान आवश्यक सेवाओं में व्यवधान पर सुनवाई की अनुमति दी

विशेष अदालत ने कल्याणकारी योजना को समर्थन दिया

बंगाल में एसआईआर मामले: सुप्रीम कोर्ट ने कोई समयसीमा नहीं निर्धारित करने से इनकार किया, अपील निपटान पर डेटा मांगा

अदालत में चला ताजमहल का जलाभिषेक मामला, अब 2 सितंबर को सुनवाई

उत्तर प्रदेश सरकार से 16 साल पुराने संविदा शिक्षकों के भविष्य के बारे में जवाब मांगा गया
ताज़ा ख़बरें
- राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या 38 तक बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय अधिनियम पारित किया
- 12-15 मामले तक सीमित: यूएपीए मामलों की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
- कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की ग्यारहवीं घंटी, 17 अगस्त को होगी सुनवाई
- हाइड्रा प्रमुख को अवमानना नोटिस: तेलंगाना उच्च न्यायालय ने निजी संपत्ति के अनधिकृत विध्वंस पर सख्ती दिखाई
- बेटियों को पिता की प्रॉपर्टी में बराबर का हिस्सा
- सुप्रीम कोर्ट ने अवैध निर्माणों पर केंद्र सरकार और राज्यों को दिए नए निर्देश
- दिल्ली हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के आयकर रिटर्न की प्रोसेसिंग रोक दी
- शौर्य चक्र विजेता की विधवा को 26 साल बाद मिला इंसाफ, सुप्रीम कोर्ट के दखल से पेंशन का रास्ता साफ

