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केरल हाई कोर्ट ने वेश्यालय ग्राहकों को भी दंडनीय बना दिया

डिवीजन बेंच ने तय किया कि वेश्यालय में यौन सेवाओं के लिए भुगतान करने वाले व्यक्ति को अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 के तहत आरोपी माना जा सकता है, क्योंकि वे मानव शोषण की मांग बनाने वाले सक्रिय भागीदार हैं। इस फैसले से ग्राहक भी कानूनी कार्रवाई के दायरे में आएँगे और केवल गवाह नहीं रहेंगे।

1 सितंबर 2026 को 06:32 pm बजे
केरल हाई कोर्ट ने वेश्यालय ग्राहकों को भी दंडनीय बना दिया

सौजन्य से:- jagran.com

वेश्यालय जाने वालों पर भी कसेगा कानून का शिकंजा, केरल HC का बड़ा फैसला

केरल हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि वेश्यालय में यौन सेवाओं के ...और पढ़ें

HighLights

- केरल हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ग्राहक भी तस्करी की श्रृंखला का हिस्सा हैं

- देह व्यापार के ग्राहकों पर मुकदमा चलाने के कानूनी आधार

डिजिटल डेस्क, तिरुवनंतपुरम। केरल हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि वेश्यालय में यौन सेवाओं के लिए जाने वाले ग्राहक को भी अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 के तहत आरोपी के रूप में मुकदमे का सामना करना पड़ सकता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यावसायिक यौन सेवाओं के लिए भुगतान करने वाले व्यक्ति मानव शोषण में सक्रिय भागीदार होते हैं और उन्हें आपराधिक दायित्व से छूट नहीं दी जा सकती।

जस्टिस राजा विजयराघवन वी और जस्टिस केवी जयकुमार की बेंच ने नोशाद बनाम केरल राज्य मामले में कानूनी संदर्भ का जवाब देते हुए यह फैसला दिया। इससे पहले एकल न्यायाधीशों के बीच अलग-अलग राय थी, जिसे डिवीजन बेंच ने सुलझाया।

कोर्ट ने कहा कि व्यावसायिक यौन शोषण दो अनिवार्य घटकों पर टिका होता है, एक तो आयोजक जो इससे लाभ कमाता है, और दूसरा ग्राहक जो मांग पैदा करके इसे बढ़ावा देता है। जो व्यक्ति स्वेच्छा से वेश्यालय में प्रवेश करता है और सेवाओं के लिए भुगतान करता है, वह अवैध व्यावसायिक लेन-देन में सक्रिय भागीदार बन जाता है। केवल वेश्यालय संचालक पर मुकदमा चलाकर ग्राहक को बचाना कानून के उद्देश्य, मानव तस्करी और व्यसन को दबाने, को कमजोर कर देगा।

बेंच ने इस बात पर भी जोर दिया कि यौन कार्यकर्ता अक्सर जबरदस्ती, प्रलोभन या परिस्थितियों के दबाव में फंसी होती हैं और उन्हें वाणिज्य की वस्तु बना दिया जाता है।

1956 के अधिनियम की धारा 5 और 7 की जांच करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह कानून सामाजिक कल्याण संबंधी है, जिसका उद्देश्य तस्करी और व्यसन के व्यावसायीकरण को खत्म करना है।

वेश्यालय जैसे प्रतिष्ठान केवल यौन सेवाएं खरीदने वाले लोगों को आकर्षित करने के लिए ही मौजूद होते हैं। इसलिए जो लोग जानबूझकर ऐसे स्थानों का संरक्षण करते हैं, वे इस अवैध उद्यम को बनाए रखने के लिए दंडनीय परिणामों के भागीदार बनते हैं।

इस फैसले से केरल में वेश्यालयों के ग्राहकों पर भी कानूनी कार्रवाई का रास्ता खुल गया है। वे अब सिर्फ गवाह या मात्र उपभोक्ता नहीं रहेंगे, बल्कि समान कानूनी जोखिम का सामना करेंगे। यह फैसला व्यावसायिक यौन शोषण की मांग पैदा करने वालों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने वाला मजबूत न्यायिक मिसाल स्थापित करता है।

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