सुप्रीम कोर्ट ने ED की संपत्ति जब्ती में एकल सदस्य की स्वीकृति पर रोक लगाते हुए फैसला सुरक्षित रखा
कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय को PMLA के तहत संपत्ति जब्ती के सभी लंबित मामलों की पूरी सूची पेश करने का निर्देश दिया और निर्णय‑निर्धारण में विवेक एवं कानूनी समझ के महत्व पर बल दिया। साथ ही, एकल सदस्य द्वारा अस्थायी कुर्की की अनुमोदन के सवाल पर दायर याचिकाओं के एक समूह का फैसला सुरक्षित रखा गया, जिसमें न्यायिक सदस्य की अनुपस्थिति में शक्ति‑विभाजन की चिंता को उजागर किया गया।

सौजन्य से:- ETV Bharat
क्या ED की संपत्ति जब्ती पर मुहर लगा सकता है सिंगल मेंबर? सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रखा
याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि PMLA के तहत निर्णायक प्राधिकरण के कार्यों में विवेक का इस्तेमाल जरूरी है.
By Sumit Saxena
Published : September 15, 2026 at 8:55 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) पर इस बात के लिए दबाव बनाया कि वह धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत संपत्तियों की जब्ती के संबंध में अपने निर्णायक प्राधिकरण के पास लंबित मामलों का पूरा विवरण प्रस्तुत करे. इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की.
पीठ ने टिप्पणी की कि न्यायनिर्णयन की प्रक्रिया में विवेक और कानूनी समझ का उचित इस्तेमाल होना चाहिए. पीठ ने निर्णायक प्राधिकरण के समक्ष इतनी बड़ी संख्या में मामलों के लंबित होने पर भी सवाल उठाए.
पीठ ने उन याचिकाओं के एक बैच पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया, जिनमें यह सवाल उठाया गया था कि क्या PMLA के तहत ED द्वारा की गई संपत्तियों की अस्थायी कुर्की को किसी न्यायिक सदस्य की अनुपस्थिति में, निर्णायक प्राधिकरण के किसी एक सदस्य द्वारा अनुमोदित या पुष्ट किया जा सकता है?
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि विजय मदनलाल चौधरी मामले में पीएमएलए की वैधता को बरकरार रखते हुए, शीर्ष अदालत ने यह नोट किया था कि पीएमएलए के निर्णायक प्राधिकरण तीन सदस्यीय निकाय थे, जिसके प्रमुख एक जिला न्यायाधीश होते थे. वकील ने इस बात पर जोर दिया कि इसे पीएमएलए की धारा 5 (ईडी द्वारा संपत्तियों की अस्थायी कुर्की) में एक सुरक्षा कवच के रूप में माना गया था. उन्होंने कहा कि अस्थायी कुर्की के मामलों को निर्णायक प्राधिकरण के पास भेजना, संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क करने की इस केंद्रीय एजेंसी की शक्तियों पर एक स्वतंत्र नियंत्रण की तरह है.
पीठ ने पूछा कि क्या वे यह तर्क दे रहे हैं कि यदि पीएमएलए की निर्णायक प्राधिकरण की पीठों में कोई न्यायिक अधिकारी मौजूद नहीं है, तो शक्तियों के पृथक्करण की अवधारणा की अनदेखी होगी. याचिकाकर्ताओं के वकील ने इस बात पर जोर दिया कि पीएमएलए के तहत निर्णायक प्राधिकरण के कार्यों में विवेक और कानूनी समझ का उचित इस्तेमाल होना जरूरी है, लेकिन इन प्राधिकरणों को अक्सर छह महीने की समय-सीमा के भीतर हजारों मामलों की जांच करने का काम सौंप दिया जाता है.
पीठ ने पूछा कि अगर छह महीने के भीतर हजारों मामलों से निपटना हो, तो क्या वहां वास्तव में विवेक का सही इस्तेमाल हो पाएगा या यह सिर्फ निर्धारित जगह पर हस्ताक्षर करने जैसा बनकर रह जाएगा? याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि यही बिल्कुल उनकी चिंता है और अब अच्छी साख वाले वकील इन प्राधिकरणों के सामने पेश नहीं होना चाहते हैं, जिससे यह प्रक्रिया प्रभावी रूप से एकतरफा हो गई है.
वकील ने तर्क दिया कि निर्णायक प्राधिकरण अक्सर ऐसे कार्यों को अंजाम देते हैं जिनमें न्यायिक तत्व शामिल होता है, और ऐसे मामलों में एक न्यायिक सदस्य का इन निकायों का हिस्सा होना अनिवार्य होना चाहिए. एक अन्य पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील ने तर्क दिया कि ऐसे कई अदालती फैसले हैं जहां अदालत ने यह टिप्पणी की है कि नए न्यायिक मंचों का गठन करते समय कार्यपालिका धीरे-धीरे न्यायिक कार्यों पर कब्जा नहीं कर सकती है.
दूसरी तरफ, ईडी के वकील ने दलील दी कि पीएमएलए की धारा 6 (निर्णायक प्राधिकरण की नियुक्ति, संरचना और शक्तियां) में ऐसे प्रावधान और परिस्थितियां दी गई हैं, जहां एक या दो सदस्यों वाले निर्णायक प्राधिकरणों का भी गठन किया जा सकता है.
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