Bihar Panchayat chunav Reservation Rule: मुखिया चुनाव में लागू नहीं होगा नौकरी वाला आरक्षण कानून, पंचायत इलेक्शन में रिजर्वेशन पर भ्रम खत्म
Bihar Panchayat chunav Reservation Rule: पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि मुखिया चुनाव में आरक्षण बिहार पंचायत राज कानून की धारा 15(5) के तहत ही लागू होगा, बिहार आरक्षण कानून 1991 के तहत नहीं। कोर्ट ने ज…

सौजन्य से:- Navbharat Times
Bihar Panchayat chunav Reservation Rule: पटना हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि मुखिया चुनाव में आरक्षण बिहार पंचायत राज कानून की धारा 15(5) के तहत ही लागू होगा, बिहार आरक्षण कानून 1991 के तहत नहीं। कोर्ट ने जाति छानबीन समिति और राज्य निर्वाचन आयोग के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत निर्वाचित मुखिया को पद से हटाया गया था।
पटना: पटना हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव में आरक्षण व्यवस्था को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ ने मो. ईसा की अर्जी पर सुनवाई करते हुए 31 पन्नों का विस्तृत फैसला सुनाया। अदालत ने साफ किया कि 1991 का बिहार आरक्षण अधिनियम मुख्य रूप से राज्य सरकार की नौकरियों और पदों में आरक्षण के लिए है। पंचायत चुनाव में इसका उपयोग केवल पिछड़ा वर्ग की जातियों की पहचान के लिए किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने जाति छानबीन समिति और राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचित मुखिया को पद से हटाने के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया।
सेवा और चुनावी आरक्षण का अलग-अलग कानून
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि चुनावी आरक्षण और सरकारी सेवाओं में आरक्षण के नियम अलग-अलग कानूनों से संचालित होते हैं। पंचायत चुनावों में सेवा-आरक्षण के नियमों को लागू करना पूरी तरह से अनुचित और गलत है। आरक्षण कानूनों की व्याख्या उनके विशेष विधायी उद्देश्य और योजना के अनुसार ही होनी चाहिए।
मुखिया के चुनाव में आरक्षण का नियम बिहार पंचायत राज कानून की धारा 15(5) ही लागू होगी, न कि बिहार आरक्षण कानून।
पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने सुनाया 31 पन्नों का ऐतिहासिक फैसला
न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ ने मो. ईसा की याचिका पर फैसला सुनाते हुए राज्य निर्वाचन आयोग और जाति छानबीन समिति की कार्यशैली पर सवाल उठाए। कोर्ट ने माना कि समिति ने गलत कानून का प्रयोग करके निर्वाचित प्रतिनिधि को पद से हटाया था।
रद्द किए गए सरकारी मेमो
हाईकोर्ट ने इस मामले में कठोर रुख अपनाते हुए दोनों संबंधित विभागों द्वारा जारी किए गए आदेशों को खारिज कर दिया।
जाति छानबीन समिति का मेमो नंबर 6574 (दिनांक 28 मार्च 2025) रद्द
राज्य निर्वाचन आयोग का मेमो नंबर 2876 (दिनांक 25 जून 2025) निरस्त
पंचायतों में नौकरियों वाला आरक्षण नहीं चलेगा
हाईकोर्ट के इस फैसले से अब यह साफ हो गया है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में प्रतिनिधियों की योग्यता और आरक्षण का दायरा केवल बिहार पंचायत राज कानून की धारा 15(5) से ही तय होगा। इससे भविष्य में प्रतिनिधियों के चुनाव और पद पर बने रहने से जुड़े भ्रम दूर होंगे।
मुखिया के चुनाव में आरक्षण कानून नहीं: हाईकोर्ट
दरअसल, पटना हाईकोर्ट ने मुखिया के चुनाव में आरक्षण को लेकर एक अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुखिया के चुनाव में आरक्षण का नियम बिहार पंचायत राज कानून की धारा 15(5) ही लागू होगी, न कि बिहार आरक्षण कानून। न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ ने मो. ईसा की ओर से दायर अर्जी पर सुनवाई के बाद अपने 31 पन्ने का आदेश दिया। कोर्ट ने जाति छानबीन समिति के फैसले और उसके आधार पर राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचित मुखिया को पद से हटाने के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वर्ष 1991 का आरक्षण अधिनियम मुख्य रूप से राज्य सरकार के अधीन पदों और सेवाओं के लिए है। पंचायत चुनावों में इसकी भूमिका सिर्फ इतनी है कि पिछड़ा वर्ग में कौन सी जातियां आती हैं, इसकी पहचान हो सके।
लेखक के बारे मेंसुनील पाण्डेयसुनील पाण्डेय, नवभारत टाइम्स (डिजिटल) में बतौर सीनियर जर्नलिस्ट कार्यरत हैं। जनवरी 2021 में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप का हिस्सा बने सुनील वर्तमान में NBT ऑनलाइन की बिहार-झारखंड टीम में संपादकीय और रिपोर्टिंग में जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। रणनीतिक न्यूज़ प्लानिंग, सटीक संपादन और धारदार ग्राउंड रिपोर्टिंग उनकी विशेष पहचान है। राजनीति और व्हाइट कॉलर करप्शन जैसे विषयों पर गहरी पकड़ रखने वाले सुनील ने 2005 से शुरू हुए अपने करियर में कई बड़ी खबरें ब्रेक की हैं। जी20 शिखर सम्मेलन (G20 Summit) से लेकर केरल तक के चुनावी बयार को समझा। दिल्ली, बिहार और तेलंगाना में पत्रकारिता के विभिन्न आयामों को अनुभव करने वाले सुनील सोशल मीडिया एक्स (पहले ट्विटर) पर @sunilpandeyjee के जरिए सक्रिय रहते हैं।
सुनील का पत्रकारिता करियर प्रिंट, टीवी और डिजिटल मीडिया के अलग-अलग अनुभवों से समृद्ध है, जहां उन्होंने संपादन और ग्राउंड रिपोर्टिंग की महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। पटना, दिल्ली और हैदराबाद जैसे महानगरों में उन्होंने कई प्रतिष्ठित हस्तियों का साक्षात्कार किया है। उनकी ग्राउंड रिपोर्ट्स का प्रभाव इतना गहरा रहा है कि कई मौकों पर सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने और उनमें सुधार करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
सुनील पाण्डेय की पारखी नजर राजनीतिक उतार-चढ़ाव और सरकारी नीतियों के आम आदमी पर पड़ने वाले असर के विश्लेषण पर रहता है। डिजिटल युग की मांग को समझते हुए वे अपनी लेखनी और वीडियो, दोनों माध्यमों से नवभारत टाइम्स के पाठकों से जुड़ते हैं। उनमें किसी भी सामान्य खबर को राष्ट्रीय विमर्श (National Narrative) बनाने की अद्भुत क्षमता है। वे केवल समाचार देने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि खबर के पीछे के नैतिक मूल्यों और उसके व्यापक प्रभाव को गहराई से परखते हैं।
अपने पत्रकारिता सफर का आगाज सुनील ने प्रतिष्ठित पाक्षिक पत्रिका 'माया' से किया, जिसके बाद उन्होंने विभिन्न समाचार पत्रों के लिए स्वतंत्र स्तंभकार (कॉलमनिस्ट) के रूप में अपनी लेखनी को धार दी। ETV न्यूज की संपादकीय टीम के साथ संपादन और रिपोर्टिंग के गुर सीखने के बाद, उन्होंने ज़ी मीडिया और नेटवर्क 18 जैसे बड़े संस्थानों में एक लंबा समय बिताया। प्रिंट और टीवी न्यूज़ के व्यापक अनुभव के बाद, उन्होंने डिजिटल मीडिया की ओर रुख किया। न्यूज़ इकोसिस्टम की गहरी समझ विकसित की। वर्तमान में वे टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप के डिजिटल प्लेटफॉर्म 'नवभारत टाइम्स ऑनलाइन' में अपनी धारदार पत्रकारिता को जारी रखे हुए हैं।
सुनील पाण्डेय की शैक्षणिक नींव 'पूरब का ऑक्सफोर्ड' माने जाने वाले पटना विश्वविद्यालय में पड़ी। यहां से ग्रेजुएशन और मास्टर के साथ ही उन्होंने पत्रकारिता की डिग्री भी प्राप्त की। वे समाचारों के विभिन्न स्रोतों के विश्लेषणात्मक अध्ययन और सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों जैसे गंभीर विषयों पर अपनी लेखनी और व्याख्यानों के माध्यम से निरंतर विचार साझा करते रहते हैं। पत्रकारिता करियर के दौरान कई अवॉर्ड से सुनील पाण्डेय को सम्मानित किया जा चुका है।... और पढ़ें
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