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बंगाल में संगठित अपराध पर शिकंजा, बिना मुकदमे एक साल जेल

बंगाल की भाजपा सरकार ने दो सख्त कानून 'गुंडा दमन' और 'लोक व्यवस्था अनुरक्षण' लागू किए हैं। नए कानून के तहत संदिग्धों को एक साल तक बिना मुकदमे हिरासत में रखने और दंगाइयों की संपत्ति कुर्क करने का अधिकार प्रशासन को मिला है।

14 जुलाई 2026 को 02:13 am बजे
बंगाल में संगठित अपराध पर शिकंजा, बिना मुकदमे एक साल जेल

सौजन्य से:- Jagran

बंगाल: गुंडों और दंगाइयों पर कसेगा शिकंजा, बिना मुकदमे एक साल जेल भेजने का कानून लागू

बंगाल में भाजपा सरकार ने संगठित अपराध और हिंसक प्रदर्शनों पर लगाम लगाने के लिए 'गुंडा दमन' और 'लोक व्यवस्था अनुरक्षण' जैसे दो सख्त कानून लागू किए हैं। ...और पढ़ें

HighLights

- बंगाल में 'गुंडा दमन' और 'लोक व्यवस्था अनुरक्षण' कानून लागू।

- संदिग्धों को बिना मुकदमे एक साल तक हिरासत में रखने का प्रावधान।

- दंगाइयों की संपत्ति कुर्क कर नीलामी का अधिकार मिला।

राज्य ब्यूरो, कोलकाता। बंगाल की भाजपा सरकार ने संगठित अपराध, सिंडिकेट, तस्करी और हिंसक प्रदर्शनों पर कड़ा प्रहार करने के मकसद से दो बेहद सख्त कानून ‘गुंडा दमन’ और "लोक व्यवस्था अनुरक्षण" संशोधन प्रदेश में लागू कर दिए हैं। इन्हें देश के सबसे सख्त आंतरिक सुरक्षा कानूनों में एक माना जा रहा है।

इन नए कानून के तहत अब प्रशासन को बिना किसी मुकदमे के संदिग्धों को साल भर तक सलाखों के पीछे रखने और दंगा व तोड़फोड़ करने वालों की संपत्ति कुर्क कर नीलामी करने के असीमित अधिकार मिल गए हैं।

दावा किया जा रहा है कि इस कानून को तैयार करने में महाराष्ट्र के एमपीडीए एक्ट, उत्तर प्रदेश के गुंडा नियंत्रण अधिनियम और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) से प्रेरणा ली गई है, लेकिन इसमें कई नए और अधिक कठोर प्रविधान जोड़े गए हैं। ‘गुंडा’ की परिभाषा का विस्तार : विशेषज्ञों के अनुसार, महाराष्ट्र के एमपीडीए कानून की तरह इसमें भी निवारक हिरासत का प्रविधान है, जबकि उत्तर प्रदेश के कानून की तर्ज पर ‘गुंडा’ की परिभाषा का विस्तार किया गया है।

बंगाल के नए कानून में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि संदिग्ध व्यक्ति को बिना मुकदमे के अधिकतम 12 महीने तक हिरासत में रखने का अधिकार सीधे जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस आयुक्त को दिया गया है, जो अन्य राज्यों की तुलना में अधिक व्यापक और त्वरित प्रशासनिक शक्ति प्रदान करता है।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में हाल के वर्षों में लागू ‘संपत्ति कुर्की माडल’ से आगे बढ़ते हुए बंगाल ने दंगों या हिंसक प्रदर्शनों में हुए नुकसान की भरपाई के लिए आरोपितों की संपत्ति जब्त करने के साथ उसकी नीलामी कर क्षतिपूर्ति वसूलने का कानूनी ढांचा तैयार किया है।

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नुकसान की राशि से दोगुना तक जुर्माने का प्रविधान इसे और कठोर बनाता है। लागू होते ही हाई कोर्ट पहुंचा मामला : कानून लागू होने के पहले ही दिन इसे न्यायपालिका में गंभीर चुनौती मिल गई है। माकपा नेता और अधिवक्ता सब्यसाची चटर्जी ने कलकत्ता हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर इस पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपोब्रत चक्रवर्ती की खंडपीठ ने याचिका को स्वीकार करते हुए इसी सप्ताह सुनवाई की अनुमति दे दी है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि सिर्फ संदेह के आधार पर साल भर जेल में रखना नागरिकों के मौलिक अधिकारों और संविधान का सीधा उल्लंघन है।

सोमवार को इस विषय पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि 34 वर्षों के वाम और 15 वर्षों के तृणमूल शासन के दौरान राज्य में संगठित अपराध, सिंडिकेट और राजनीतिक हिंसा की जड़ें गहरी हो चुकी थीं। पुराने कानून इनसे निपटने में पर्याप्त नहीं थे इसीलिए यह जरूरी है। वहीं, विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस ने इसे पूरी तरह "दमनकारी" बताया है। वहीं नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने कहा है कि इस दमनकारी कानून के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे।

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