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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा: वादपत्र खारिज याचिका में केवल वादपत्र देखें, बचाव की दलीलें नहीं

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वादपत्र खारिज करने की अर्जी पर सुनवाई में केवल वादपत्र ही जांचा जाना चाहिए, प्रतिवादी के जवाब या बचाव के तर्कों को नहीं माना जाएगा। यह टिप्पणी कासगंज के किरायेदारी मामले में न्यायमूर्ति डा. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने की, जिसमें अधीनस्थ न्यायालयों के फैसले को स्वीकार किया गया और कहा गया कि किराया बकाया, नोटिस की वैधता आदि मुद्दे ट्रायल में सबूतों के आधार पर तय होंगे।

6 सितंबर 2026 को 06:32 am बजे
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा: वादपत्र खारिज याचिका में केवल वादपत्र देखें, बचाव की दलीलें नहीं

सौजन्य से:- Jagran

वादपत्र खारिज करने की अर्जी पर सिर्फ वादपत्र देखें, बचाव पक्ष की दलीलें नहीं: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि वादपत्र खारिज करने की अर्जी पर सुनवाई करते समय केवल वादपत्र देखा जाना चाहिए, ...और पढ़ें

HighLights

- वादपत्र खारिज करने में सिर्फ वादपत्र देखें।

- प्रतिवादी के जवाब या बचाव पक्ष की बातें नहीं।

- कासगंज किरायेदारी मामले में हाई कोर्ट का फैसला।

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी मुकदमे का वादपत्र खारिज करने की अर्जी पर सुनवाई के दौरान सिर्फ वादपत्र देखना चाहिए, प्रतिवादी के जवाब अथवा बचाव पक्ष की बातों को नहीं। न्यायमूर्ति डा. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने कासगंज में किरायेदारी से जुड़े एक मामले में दायर याचिका इस टिप्पणी के साथ निस्तारित कर दी है।

कोर्ट ने कहा है कि यह मुकदमे के गुण-दोषों पर राय नहीं है। मुकदमे से जुड़े तथ्य ये हैं कि याची किरायेदार नीरज माहेश्वरी ने नदरई बाजार गेट स्थित नारायणलाल धर्मशाला ट्रस्ट के पक्ष में अधीनस्थ निर्णयों को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। ट्रस्ट ने किरायेदार के खिलाफ बेदखली का केस लघु वाद अदालत में 2019 में दायर किया।

वहां किरायेदार ने कहा कि वादपत्र में यह नहीं बताया गया कि विवाद कब और कैसे शुरू हुआ, ट्रस्ट को केस करने का अधिकार है भी या नहीं। इसलिए वादपत्र को आदेश 7 नियम 11 के तहत खारिज किया जाए। लघु वाद अदालत ने 29 मई 2024 और जिला जज ने 27 अगस्त 2025 को याची की मांग खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने कहा कि अधीनस्थ अदालतों का फैसला सही है।

वादपत्र में साफ लिखा है कि मकान मालिक-किरायेदार का रिश्ता है, अक्टूबर 2016 से किराया नहीं दिया गया, किराया मांगा गया और नोटिस भेजा गया। इतने तथ्य वाद चलाने के लिए काफी हैं। जिला जज ने अपने आदेश में किरायेदार के जवाब में किरायेदारी मानने की बात लिखी थी, इसकी जरूरत नहीं थी। वादपत्र खारिज करने की अर्जी देखते समय सिर्फ वादपत्र देखना होता है, जवाब नहीं।

यह भी पढ़ें- 'मुचलके पर रिलीज किए जाएं जब्त जेवर, एक माह में हो फैसला' इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद्द किया वाराणसी की अदालत का आदेश

किराया बकाया है या नहीं, नोटिस सही है या नहीं, ट्रस्ट को कानून से छूट है या नहीं, इन सब पर अभी कोई फैसला नहीं दिया गया है। ये सभी बातें ट्रायल कोर्ट सुबूतों के आधार पर तय करेगा। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के टी. अरविंदानंदम बनाम टी.वी. सत्यपाल के उस फैसले का हवाला भी दिया है जिसमें कहा गया है कि यदि वादपत्र में वास्तविक वाद हेतु दिखता है तो भले ही अंतिम ट्रायल में दावा विफल हो जाए, उसे प्रारंभिक स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता। यदि वादपत्र स्पष्ट रूप से तंग करने वाला और निराधार हो तो शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।

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