18 वर्षीय छात्र की गुरु हत्या पर कोर्ट ने दी उम्रकैद, मौत की सजा नहीं हुई
दिल्ली के तीसहजारी कोर्ट ने 18 साल के छात्र द्वारा अपने शिक्षक की हत्या के मामले में मृत्युदंड को खारिज कर दिया। जज ने बताया कि अपराध के समय आरोपी का मस्तिष्क पूर्ण रूप से विकसित नहीं था, इसलिए केवल उम्रकैद और जुर्माना उचित माना गया। यह फैसला गंभीर अपराध और आरोपी की आयु‑उपयुक्तता के बीच संतुलन स्थापित करता है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
दिल्ली की एक अदालत ने स्कूल में अपने ही शिक्षक की चाकू मारकर हत्या करने वाले 18 वर्षीय व्यक्ति को फांसी की सजा देने से इनकार कर दिया है। 'गुरु की हत्या' जैसे गंभीर मामले में भी कोर्ट ने आरोपी को किशोर मस्तिष्क का मानते हुए राहत दी।
नई दिल्ली : देश की राजधानी दिल्ली में शिक्षा के मंदिर में शिक्षा देने वाले गुरु की हत्या, उसका ही छात्र कर देता है। फिर भी छात्र को राहत मिलती है और कोर्ट फांसी देने से मना कर देता है। दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाते हुए शिक्षक की हत्या के दोषी को फांसी की सजा देने से राहत दी है। केस में अदालत ने माना कि हत्या का यह अपराध बेहद निंदनीय और गुरु शिष्य परंपरा को ठेस पहुंचाने वाला तो था, लेकिन अपराध के वक्त आरोपी की उम्र और मानसिक परिपक्वता का भी ध्यान देना जरूरी है।
शिक्षक की हत्या और फांसी की मांग
मामला दिल्ली के स्कूल में ड्यूटी पर तैनात एक शिक्षक की हत्या से जुड़ा था । अभियोजन पक्ष ने हत्या को पूर्व नियोजित और सुनियोजित तरीके से अंजाम दिए जाने का तर्क देते हुए मृत्युदंड की मांग की। अभियोजन पक्ष ने किशोर के हिरासत में आचरण और अंतरिम जमानत पर रहते हुए एक अन्य हत्या मामले में उसकी संलिप्तता के आरोपों पर भरोसा किया। लोक अभियोजक ने दलील दी कि यह हत्या न सिर्फ एक शिक्षक की थी, बल्कि गुरु शिष्य के पवित्र संबंधो की भी हत्या थी। ऐसे जघन्य और घृणित काम के लिए फांसी दी जानी चाहिए।
हत्यारोपी को कोई पछतावा नहीं, आदतन अपराधी
हत्यारोपी को पछतावा भी नही था। लोक अभियोजन ने अदालत को यह बताया कि हिरासत में लिए जाने के बाद भी दोषी ने कोई पश्चाताप नहीं दिखाया और अंतरिम जमानत पर रहते हुए वह एक अन्य हत्या के मामले में शामिल हो गया। उन्होंने जेल नियमों के कथित उल्लंघन और कैदियों पर हमले का भी जिक्र किया। वह आदतन अपराधी है। अदालत कोई रियायत न बरते उसके साथ।
अदालत ने फैसले में शिक्षक और छात्र के बीच के पवित्र रिश्ते का विशेष उल्लेख किया। जज ने कहा कि स्कूल के अंदर शिक्षक की हत्या भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं पर गहरा आघात है। यह घटना समाज के विश्वास और शैक्षणिक माहौल को गंभीर रूप से ठेस पहुंचाती है।
गुरु-शिष्य परंपरा पर अदालत की टिप्पणी
हत्या का दोषी, पर फांसी नहीं
तीस हजारी कोर्ट में एडिशनल सेशन जज प्रिया महेंद्र ने इस संवेदनशील मामले की सुनवाई करते हुए 21 सितंबर को फैसला सुनाया। कोर्ट ने 28 वर्षीय विवेक कुमार को अपने स्कूल शिक्षक की हत्या और सरकारी काम में बाधा डालने का दोषी ठहराया। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अपराध के समय आरोपी की उम्र 18 साल और 7 महीने थी। जज ने टिप्पणी की कि किशोरावस्था के दौरान किसी व्यक्ति के दिमाग से पूर्ण वयस्क जैसी परिपक्वता की उम्मीद नहीं की जा सकती। अदालत ने अपराध को 'घिनौना और निंदनीय' करार देते हुए भी उसे मौत की सजा देने से इनकार कर दिया। इसके बदले दोषी को उम्रकैद और 50,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई, जो पीड़ित परिवार को मुआवजे के रूप में दिया जाएगा।
कोर्ट ने माना कि 18 वर्ष की आयु के तुरंत बाद मस्तिष्क पूरी तरह से विकसित नहीं होता है। इसी वैज्ञानिक और कानूनी पहलू को ध्यान में रखते हुए मौत की सजा को अनुचित समझा गया।
'किशोर मस्तिष्क' का कानूनी आधार
न्याय का सिद्धांत: अपराध और अपराधी
सजा का ऐलान करते समय जज ने कहा कि अदालत को अपराध और अपराधी दोनों पर ध्यान देना चाहिए। न्याय का उद्देश्य केवल प्रतिशोध लेना नहीं, बल्कि संतुलन और आनुपातिकता बनाए रखना है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी के आचरण, आयु, पिछले रिकॉर्ड और परिस्थितियों का मूल्यांकन करना अनिवार्य है। इन सभी उकसाने और शमनकारी फैक्टर्स को तौलने के बाद ही उम्रकैद का फैसला उचित माना गया।
देखा जाए तो दिल्ली कोर्ट का यह फैसला भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में दंड के निर्धारण को लेकर अदालत का मानवीय पहलू दिखाता है। अदालत ने माना कि जघन्य अपराधों में भी आरोपी की आयु और मानसिक विकास अवस्था एक महत्वपूर्ण शमनकारी कारक होती है। गुरु की हत्या जैसे गंभीर मामले में भी कोर्ट ने कानून के मानवीय पहलू और 'रैरेस्ट ऑफ द रेयर' सिद्धांत का पालन करते हुए फांसी के बदले उम्रकैद की सजा देना न्यायसंगत समझा।
लेखक के बारे मेंमनीष राजमनीष राज फिलहाल नवभारत टाइम्स ऑनलाइन में कंसलटेंट लीगल एडिटर के पद पर सेवारत हैं। इनकी पत्रकारिता की शुरूआत 24 वर्ष पहले राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रमुख नेशनल न्यूज ब्रॉडकास्ट मीडिया चैनल से हुई। इन्होंने कानून (L.L.B.) और अर्थशास्त्र में स्नातक के साथ पत्रकारिता व जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा किया हुआ है। भारत के कानूनी ढांचे के विभिन्न आयामों और उनके व्यावहारिक पहलुओं को इन्होंने गहराई से अध्ययन किया है।वर्ष 2018 में मनीष राज, इंडिया लीगल ग्रुप से जुड़े, जिससे कानून के क्षेत्र में इनकी रुचि जगी। यहां इन्होंने कानून की बारीकियों के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की गतिविधियों और प्रक्रियाओं को नजदीक से देखा। इस तरह से पिछले सात सालों से पेशेवर लीगल स्टोरी लेखन-संपादन के साथ साथ इनका कानूनी गतिविधियों और केस लॉ की बारीकियों को विश्लेषण करने का काम जारी है। इनके लिखे लेख अक्सर न्यायपालिका और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करते हैं, और अदालती कार्यवाहियों पर व्यवस्थित रिपोर्टिंग उपलब्ध कराते हैं। ये सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य भी रहे हैं, जहां इन्होंने देश के कई प्रसिद्ध वकीलों के साथ काम करने का अनुभव हासिल किया है।इन्हें सामाजिक न्याय, मानवाधिकार, कॉर्पोरेट और संवैधानिक कानून जैसे विषयों पर लिखना पसंद है। इनके लिखने का उद्देश्य है कि आम जनता के साथ-साथ और युवा वकील भी न्यायिक फैसलों और कानून की जटिलताओं को समझ सकें और कानूनी जागरूकता बढ़े। इनकी लेखन शैली सटीक, तथ्य-आधारित और पाठकों के लिए समझने में सरल है।विशेषताएँ:• सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायिक फैसलों का सरल भाषा में लेखन और विश्लेषण • केस लॉ का सरल भाषा में विस्तार • आम जन, युवा वकीलों और छात्रों के लिए मार्गदर्शन • ब्लॉग और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर सक्रिय लेखन... और पढ़ें
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