सुप्रीम कोर्ट ने 21 साल बाद वैवाहिक बंधन तोड़ने की स्वीकृति दी
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे दंपति को तलाक की मंजूरी दी, जिन्होंने 2005 में शादि के दो साल बाद पति के अपमान के कारण अलगाव शुरू किया और तब से एक साथ नहीं रहे। न्यायालय ने पति को पत्नी को स्थायी एलिमनी के रूप में सात लाख रुपये तीन महीने में देने का आदेश दिया, जबकि दोनों के बीच कोई संतान नहीं थी और सुलह के सभी प्रयास विफल रहे।

सौजन्य से:- Hindustan
सुप्रीम कोर्ट ने 21 साल बाद पति-पत्नी के तलाक को मंजूरी दी
सुप्रीम कोर्ट ने एक दंपति को तलाक की अनुमति दी, जो पिछले 21 वर्षों से अलग रह रहे थे। पत्नी ने पति के अनपढ़ होने पर अपमानित करने के कारण 2005 में ससुराल छोड़ दिया था। कोर्ट ने पति को पत्नी को स्थायी गुजारा-भत्ता के तौर पर 7 लाख रुपये देने का आदेश दिया।
शादी के तुरंद बाद कम पढ़े लिखे पति को ‘अनपढ़’ और ‘गंवार’ कहकर आए दिन अपमानित करने की वजह से पिछले 21 साल एक अलग रह रहे दंपति को सुप्रीम कोर्ट ने तलाक की अनुमति दे दी। शीर्ष अदालत ने कहा है कि ‘वैवाहिक कानून का मुख्य मकसद शादी को बचाए रखना है, लेकिन जब दोनों पक्ष लंबे समय से अलग रह रहे हों, तो कानून को ऐसी स्थिति की सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए।’ शादी के महज 2 साल बाद ही, कम पढ़े लिखे होने की वजह से पति को आए दिन अपमानित करने की वजह से शुरू हुए विवाद के बाद पत्नी ने 2005 में ससुराल छोड़ दिया था और तब से अलग रह रही थी।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने ‘हमारे समक्ष मौजूद इस मामले में, सच्चाई यह है कि पति-पत्नी अलग-अलग रह रहे हैं। भले ही प्रतिवादी (पत्नी) ने अपने बयान में कहा है कि वह अपनी वैवाहिक जिम्मेदारियां निभाने को तैयार थी, लेकिन सिर्फ कहने से काम नहीं चलेगा, जब उसका व्यवहार कुछ और ही दिखाता हो। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के एक फैसले का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि लंबे समय तक अलग रहना इस बात का पता लगाने में एक अहम कारक होगा कि क्या वैवाहिक बंधन को फिर से ठीक किया जा सकता है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने तलाक को मंजूरी देते हुए पति को महिला को स्थायी गुजारा-भत्ता (एलिमनी) के तौर पर 7 लाख रुपये देने का निर्देश दिया। पति को यह रकम तीन माह में देनी होगी।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह देखते हुए कि ट्रायल कोर्ट के सामने यह साबित हो गया था कि दोनों पक्ष दिसंबर 2005 से एक साथ नहीं रह रहे थे, हमारी राय में, हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष गलत था कि प्रतिवादी (पत्नी) का अपीलकर्ता (पति) को छोड़ने का कोई इरादा नहीं था। पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि पति अपनी पत्नी को ससुराल ले जाने गया था, लेकिन उसने बिना किसी ठोस वजह के उनके साथ जाने से इनकार कर दिया। पीठ ने इस बात पर भी गौर किया कि शादी से कोई बच्चा नहीं हुआ था और सुलह की सभी कोशिशें नाकाम रही थीं। पीठ ने कहा कि ‘ऐसे हालात में, दोनों पक्षों को शादी में बने रहने के लिए मजबूर करना न्याय के मकसद को पूरा नहीं करेगा।
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