सुप्रीम कोर्ट का फैसला: SC आयोग को अदालत की तरह काम करने की अनुमति नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग केवल सिफारिश दे सकता है, न्यायिक आदेश नहीं। यह फैसला अन्य आयोगों पर भी बड़ा असर डाल सकता है। आयोग अब केवल सलाह दे सकते हैं, उनके आदेश बाध्यकारी नहीं होंगे।

सौजन्य से:- livehindustan.com
'आप अदालत नहीं, सिर्फ सलाह दें', सुप्रीम कोर्ट ने तय की SC आयोग की शक्तियां; होगा बड़ा असर
सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) कोई अदालत नहीं है। वह केवल सिफारिश दे सकता है, न्यायिक आदेश नहीं। जानें इस फैसले का अन्य आयोगों पर क्या असर पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) की शक्तियों को स्पष्ट करते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि यह आयोग केवल सिफारिश करने और सलाह देने वाला निकाय है। इसके पास अदालत की तरह न्यायिक आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं है।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने?
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए साफ किया कि आयोग अपने कामकाज के दौरान राज्यों या केंद्र सरकार को अपनी सिफारिशें भेज सकता है। हालांकि, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि नौकरी से जुड़े मामलों में आयोग की तरफ से दिया गया कोई भी आदेश बाध्यकारी नहीं है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, बेंच ने कहा, "NCSC को दी गई शक्तियां सीमित हैं। अनुच्छेद 338A और 338B के तहत यह और ऐसे अन्य आयोग सामाजिक भलाई के उद्देश्य से बनाए गए संवैधानिक निकाय हैं। विधायिका ने इनकी भूमिका सलाह और सिफारिश देने वाली तय की है, न कि फैसले सुनाने वाली। इन्हें अदालती कामकाज अपने हाथ में लेने के लिए नहीं बनाया गया है।"
इन आयोगों पर भी पड़ सकता है असर
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का असर समाज के विभिन्न वर्गों की भलाई के लिए बनाए गए अन्य वैधानिक और संवैधानिक निकायों पर भी पड़ सकता है। इसका मतलब है कि महिलाओं, अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों के लिए बने आयोगों के आदेशों और शक्तियों पर भी यह नियम लागू हो सकता है।
जांच कर सकते हैं, पर आदेश नहीं दे सकते
सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रावधान को भी विस्तार से समझाया जिसके तहत आयोग को 'अनुसूचित जातियों के अधिकारों और सुरक्षा के हनन से जुड़ी विशेष शिकायतों की जांच' करने की शक्ति मिली है। बेंच ने कहा कि आयोग के पास दस्तावेज मंगाने और सबूत स्वीकार करने का अधिकार तो है, लेकिन वह उन सबूतों के आधार पर कोई आदेश पारित नहीं कर सकता। आसान शब्दों में कहें तो, NCSC सिर्फ तथ्यों के आधार पर अपना निष्कर्ष निकाल सकता है और फिर संबंधित केंद्र या राज्य सरकार को उस पर कार्रवाई करने के लिए कह सकता है।
आयोग की यह दलील हुई खारिज
सुनवाई के दौरान NCSC की ओर से यह दलील दी गई थी कि नियमों में 'सुरक्षा' शब्द का जिक्र है, जिसका मतलब कानून को लागू कराना भी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि कानून की भाषा बिल्कुल स्पष्ट है। यह किसी भी तरह से न्यायिक शक्तियां प्रदान नहीं करती, बल्कि यह ज्यादा से ज्यादा सिफारिशी प्रकृति की है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में जोर देकर कहा कि आयोग किसी अदालत या ट्रिब्यूनल की भूमिका नहीं निभा सकता और न ही वह दो पक्षों के अधिकारों पर फैसला सुना सकता है।
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