फुटपाथ पर चलने का हक, सुप्रीमकोर्ट ने सरकार को लगाई फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को सोमवार को फटकार लगाई और कहा कि फुटपाथ पर चलना पैदल चलने वालों का मौलिक अधिकार है। अदालत ने सरकार को दो सप्ताह में फुटपाथ को चिह्नित करने और अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया है।

सौजन्य से:- Hindustan
फुटपाथ पर चलना एक मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को लगा दी फटकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो सप्ताह के भीतर फुटपाथ को चिह्नित किया जाए और अतिक्रमण हटाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फुटपाथ पर सुरक्षित चलना संविधान में मौलिक अधिकार है। इसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को देशभर की सभी सड़कों पर पैदल चलने वालों के लिए ठीक से चिह्नित और अतिक्रमण-मुक्त जगह मुहैया कराने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने साथ ही यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि सड़कों पर पैदल चलने वाले लोगों के लिए ‘चिह्नित जगह’ पर कोई मोटर वाहन न चले।
फुटपाथ पर ना हो अतिक्रिमण
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आलोक अराधे की पीठ ने भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज से कहा कि वे संबंधित अधिकारियों को इस बारे में निर्देश दें कि पैदल चलने वालों के लिए तय जगह पर कोई अतिक्रमण न हो और उसे मोटर गाड़ियों के रास्ते से सही ढंग से अलग रखा जाए। जस्टिस नरसिम्हा ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नटराज से कहा कि बिना किसी बड़े निवेश या निर्माण के, बस यह सुनिश्चित करें कि सड़कों पर पैदल चलने वालों की जगह को सही ढंग से चिह्नित किया जाए। जहां भी सड़क हो, वहां पैदल चलने वालों के लिए जगह हो। इसे रस्सी या किसी भी चीज से चिह्नित करें और पक्का करें कि उस पर कोई अतिक्रमण न हो।
दो सप्ताह का वक्त
शीर्ष अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को अधिकारियों को निर्देश लेने के लिए दो सप्ताह का वक्त दिया। मामले की सुनवाई दो सप्ताह बाद की तय करते हुए पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि पैदल चलने वालों को यह भरोसा होना चाहिए कि यह जगह उनके लिए है और वे वाहनों के खौफ से आजाद होकर चल सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने 19 जून को पारित महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि ‘चिह्नित फुटपाथ पर चलने का अधिकार संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि फुटपाथ पर चलने का नागरिक का मौलिक अधिकार प्राथमिक है और इसे मोटर गाड़ियों की आवाजाही पर प्राथमिकता दी जाएगी।
फार्मेंसी काउंसिल के कामकाज पर चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) के कामकाज पर सोमवार को गंभीर चिंता जताई और फार्मेसी कॉलेज को हर साल मंजूरी दिए जाने के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि मौजूदा व्यवस्था छात्रों के लिए अनिश्चितता पैदा कर रही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने पूछा कि केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित सुधारों के बावजूद पुरानी व्यवस्था क्यों जारी है। पीठ पीसीआई की ओर से फार्मेसी कॉलेज के संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा कि फार्मेसी संस्थानों के लिए मंजूरी प्रक्रिया में अनिश्चितता छात्रों के लिए ठीक नहीं है। न्यायमूर्ति बागची ने संस्थानों के पास जरूरी बुनियादी ढांचा होने के बावजूद उन्हें हर साल मंजूरी दिए जाने के औचित्य पर सवाल उठाया।
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Ankit Ojhaविद्यालयी जीवन से ही कलात्मक अभिव्यक्ति, विचारशील स्वभाव और मिलनसार व्यक्तित्व और सामान्य के अंदर डुबकी लगाकर कुछ खास खोज लाने का कौशल पत्रकारिता के लिए अनुकूल साबित हुआ। अंकित ओझा एक दशक से डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहने वाले अंकित ओझा समाचारों की दुनिया में तथ्यों के महत्व के साथ ही संवेदनशीलता के पक्ष को साधने में निपुण हैं। पिछले चार साल से हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप के 'लाइव हिन्दुस्तान' के लिए चीफ कॉन्टेंट प्रड्यूसर पद पर कार्य कर रहे हैं। इससे पहले 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'इंडियन एक्सप्रेस' ग्रुप के साथ भी कार्य कर चुके हैं।
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अकादमिक योग्यताः अंकित ओझा ने प्रारंभिक शिक्षा नवोदय विद्यालय से पूरी करने के बाद जामिया मिल्ल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता में ही ग्रैजुएशन किया है। इसके बाद भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में एमए किया है। जामिया में अध्ययन के दौरान ही इटैलियन और उर्दू भाषा में भी कोर्स किए हैं। इसके अलावा पंजाबी भाषा की भी अच्छी समझ रखते हैं। विश्वविद्यालय में NCC का 'C सर्टिफिकेट' भी प्राप्त किया है। IIMC और ऑक्सफर्ड से स्वास्थ्य पत्रकारिता का सर्टिफिकेट भी प्राप्त किया है।
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