पुलिस के जोर में कानून का शासन: विचार करना होगा
दिल्ली में पुलिस की कार्रवाई के दौरान कई विवादास्पद मामले सामने आये हैं, जिसमें अधिकारियों के प्रदर्शनकारियों पर हमले करने के वीडियो सामने आये हैं। सरकार को इन मामलों की जाँच के लिए एक स्वतंत्र जाँच बोर्ड का गठन करना चाहिए। पुलिस बल को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए जवाबदेह होना चाहिए और साथ ही अपने कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करना चाहिए।

सौजन्य से:- The Hindu
दिल्ली में छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जारी पुलिसिया कार्रवाई का विस्तार और उसकी प्रकृति भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट इस मामले को देख रहा है, लेकिन उसने पुलिस को संयमित रखने के लिए कुछ खास नहीं किया है। जबकि, पुलिस कानून के बाहर जाकर काम करती दिख रही है। लगाये जा रहे आरोपों के परीक्षण के लिए एक स्वतंत्र जांच करवाना — जैसा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा विचार किया जा रहा है — एक बात है। लेकिन एक जवाबदेह पुलिस बल ने अपने सम्मान और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए खुद ही तेजी से कदम उठाये होते, खासकर उन चीजों को देखते हुए जो पहले ही सार्वजनिक दायरे में उपलब्ध हैं। वर्दी में उसके पुरुष अधिकारी वीडियो में एक महिला प्रदर्शनकारी को थप्पड़ मारते दिख रहे हैं और एक लड़की के गुप्तांगों पर लाठी चलाने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस सक्रियतापूर्वक उन प्रदर्शनकारियों के पीछे लगी है जो कथित तौर पर प्रदर्शन स्थल पर मौजूद थे। इसके लिए चेहरा-पहचान और दूसरी सर्विलांस तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिनकी वैधानिकता संदिग्ध और विवादास्पद है। दूसरी तरफ, एक सार्वजनिक मजमे में एक युवती पर खुलेआम हमला करते दिखे अधिकारी की पहचान के बारे में अभी तक कोई जवाब नहीं दिया गया है। अपने कर्मियों की शिनाख्त करने और जवाबदेह ठहराने के लिए दिल्ली पुलिस को किसी सॉफ्टवेयर या अदालती हस्तक्षेप की जरूरत नहीं पड़ेगी। उसे जरूरत है केवल पेशेवर रवैये की और कानून के शासन के सिद्धांत का सख्ती से पालन करने की।
सरकार के आलोचकों को निशाना बनाते हुए, ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगह अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ कानून-प्रवर्तन अभियान भी साथ-साथ चल रहा है। पुलिस लोगों के खिलाफ इतने भर के लिए कार्रवाई करने को उत्सुक लग रही है कि उन्होंने कुछ कहा है। यह सही है कि कुछ कंटेंट क्रिएटरों ने सरकार के पदाधिकारियों के खिलाफ गाली-गलौज वाली भाषा का इस्तेमाल किया है। अगर उसके लिए पुलिस कार्रवाई की जरूरत बनती है, तो लागू होने वाले कानून का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए और उचित प्रक्रिया का पारदर्शी ढंग से पालन होना चाहिए। इसके बजाय, प्रदर्शनकारियों, उनके परिवारों और, कुछ मामलों में, सोशल मीडिया मंचों को भी निशाना बनाते हुए, ऐसी मनमाना पुलिसिया कार्रवाई की खबरें हैं जिनका मकसद कानून प्रवर्तन कम और डराना ज्यादा लगता है। ठीक उसी समय, पुलिस की दिलचस्पी उस ऑनलाइन भीड़ के खिलाफ कार्रवाई में नहीं दिखती, जो प्रदर्शनकारियों को धमका और गरिया रही है। दिल्ली पुलिस इस पर कायम है कि प्रदर्शनकारियों के बीच अपराधी घुस आये थे। जो हिंसा में शामिल थे यकीनन उनकी शिनाख्त होनी चाहिए और उन्हें कानून के मुताबिक न्याय तक लाया जाना चाहिए। पुलिस बल ने यह सफाई भी नहीं दी है कि किन हालात में प्रदर्शनकारियों पर छर्रे दागे गये। पुलिस का आचरण स्थापित कानूनों और मानकों से बंधा होना चाहिए, और किसी भी नियम-भंग से सख्ती से निपटा जाना चाहिए। यह केंद्र और सुप्रीम कोर्ट दोनों के लिए इस बुनियादी संवैधानिक सिद्धांत को रेखांकित करने का एक मौका है कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है, पुलिस भी नहीं। सरकार को उन आंदोलनकारी छात्रों से किये गये अपने वादों से पीछे हटता नहीं दिखना चाहिए, जिन्होंने अपनी मांगें पूरी होते ही विरोध-प्रदर्शन खत्म कर दिया था। इससे उन युवाओं के बीच संदेहवाद ही पुख्ता होगा और असंतोष ही गहरायेगा जो हजारों की तादाद में जंतर-मंतर पहुंचे थे।
Published - August 01, 2026 10:35 am IST
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