SC ने CEC ज्ञानेश कुमार के ‘एकतरफा’ निर्णयों पर अंतरिम आदेश नकारा, सर्वसम्मति का आदेश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ निलंबन की मांग करने वाली दो याचिकाओं पर अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया और मामले को अगले हफ्ते के लिए स्थगित किया। कोर्ट ने 2023 के कानून की धारा 18 के तहत चुनाव आयोग से सर्वसम्मति से निर्णय लेने की मांग की और यह जांच करेगी कि इस नियम का पालन हुआ है या नहीं।

सौजन्य से:- ThePrint Hindi
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया. याचिकाओं में उनकी निलंबन की मांग की गई थी और उन फैसलों को लेकर उनके आचरण को चुनौती दी गई थी, जो कथित तौर पर उन्होंने अकेले लिए थे.
भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी और उसने दोनों याचिकाओं पर नोटिस जारी किया. मामले को अगले हफ्ते के लिए रखा गया है.
एक याचिका सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह ने दायर की है. इसमें आरोप लगाया गया है कि 2023 के कानून ने CEC को कानूनी कार्रवाई से मिलने वाली सुरक्षा का दायरा बढ़ा दिया है. दूसरी याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दायर की है. इसमें ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व जज की अध्यक्षता में स्वतंत्र, उच्च-स्तरीय न्यायिक जांच आयोग या विशेष जांच दल (SIT) बनाने की मांग की गई है.
दोनों याचिकाएं
सोमवार की सुनवाई में याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने अंतरिम आदेश जारी करने की मांग की. उन्होंने कहा कि जब तक मामले पर पूरी तरह फैसला नहीं हो जाता, तब तक चुनाव आयोग (ECI) केवल सर्वसम्मति से फैसले ले. सिंह ने यह भी कहा कि अब तक ECI ने 23 सितंबर को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट का “खंडन” करते हुए कोई जवाब नहीं दिया है. उन्होंने चुनाव आयोग की प्रेस रिलीज को “अस्पष्ट” बताया.
सिंह ने पीठ के सामने अंतरिम आदेश की मांग करते हुए कहा, “यह किसी रिटायर व्यक्ति की पेंशन का मामला नहीं है… यह ECI की विश्वसनीयता का मामला है.” उन्होंने आगे कहा कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो “यह देश जल उठेगा”.
CJI ने कहा कि कानून के अनुसार ECI से उम्मीद की जाती है कि वह फैसले सर्वसम्मति से ले. ECI को नोटिस जारी करके और मामले को अगले हफ्ते के लिए रखते हुए अदालत ने कहा कि वह यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कानून का पालन हुआ या नहीं.
CJI सूर्यकांत ने कहा, “अगर हमें पता चलता है कि कानून का पालन नहीं हुआ है, तो आप हमारी शक्तियों को जानते हैं.”
पीठ में शामिल जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भी कहा कि अगर ECI के जवाब के बाद उसके कामकाज में अनियमितताएं पाई जाती हैं, तो अदालत “उन फैसलों पर रोक लगाएगी”. उन्होंने कहा कि “हम उम्मीद करते हैं कि वे स्पष्ट और पारदर्शी तरीके से जवाब देंगे”.
अदालत ने कहा कि यह मामला केवल 2023 के कानून की धारा 18 से जुड़ा है. इसमें कहा गया है कि ECI को जहां तक संभव हो, अपने “कामकाज की प्रक्रियाओं को सर्वसम्मति से तय करना चाहिए, हालांकि अलग-अलग राय को बहुमत के वोट से हल किया जाता है”. अदालत यह पता लगाने की कोशिश करेगी कि धारा 18 का पालन हुआ या नहीं.
अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की दूसरी याचिका में मतदाताओं के नाम हटाए जाने और CEC ज्ञानेश कुमार के आचरण की SIT से जांच कराने की मांग की गई है.
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील और TMC की राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी ने अपने तर्कों की शुरुआत विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के लिए ECI द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया से की.
उन्होंने कहा, “कृपया देखें कि दिल्ली में SIR कैसे किया गया.” उन्होंने फॉर्म 6 में जोड़ी गई दो नई शर्तों की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा, “मुझे भी इसके तहत नोटिस मिला था.” उन्होंने पश्चिम बंगाल में अपीलीय न्यायाधिकरण के सामने लंबित लाखों अपीलों की ओर भी इशारा किया, जबकि एक चुनाव हो चुका है और दूसरा होने वाला है.
CJI ने तब स्पष्ट किया कि बदले हुए फॉर्म 6 को अदालत ने मंजूरी नहीं दी है. उन्होंने कहा कि जब रिकॉर्ड अगले हफ्ते पेश किया जाएगा, तो अदालत यह देखना चाहेगी कि इसे किसने बदला है.
गुरुस्वामी ने कहा, “जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में वोट देने के अधिकार खतरे में हैं और SIR लागू किया जा रहा है, और मुख्य चुनाव आयुक्त का कामकाज कम से कम कहें तो पक्षपातपूर्ण है.”
अदालत ने कहा कि याचिका में की गई बड़ी चुनौती ठीक है, लेकिन याचिका में मांगी गई राहत सभी राज्यों से जुड़ी हुई है. कुछ मांगें दिल्ली में SIR से जुड़ी हैं और कुछ पश्चिम बंगाल से. अदालत ने गुरुस्वामी से कहा कि वह खुद को याचिका में की गई मांगों तक सीमित रखें.
इसके जवाब में उन्होंने कहा कि वह “याचिका में की गई हर एक मांग के साथ खड़ी हैं.” उन्होंने कहा, “यह CEC, चुनाव आयुक्तों और चुनाव आयोग की संस्था के राष्ट्रीय स्तर के कामकाज से जुड़ा है. उस गैरकानूनी काम को एक असंवैधानिक कानून से सुरक्षा दी जा रही है. इस तरह के पक्षपातपूर्ण आचरण की सजा क्या है? क्या यह आधिकारिक कर्तव्य निभाना है? मैं खुद से यह सवाल पूछती हूं. हम इस देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के साथ बड़े हुए हैं. आज वे मौजूद नहीं हैं. मैं इन मांगों में से हर एक के साथ खड़ी हूं. यह एक राष्ट्रीय समस्या है,” उन्होंने कहा.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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