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बच्चों की डिजिटल सुरक्षा पर कितना मजबूत है नया डेटा कानून?

डीपीडीपी अधिनियम 2023 में बच्चों के डिजिटल डेटा को लेकर विशेष सुरक्षा प्रावधान किए गए हैं, जिसमें माता-पिता की सत्यापित सहमति और बच्चों के नुकसान पहुंचाने वाली डेटा प्रोसेसिंग पर रोक शामिल है।

31 जुलाई 2026 को 01:16 pm बजे
बच्चों की डिजिटल सुरक्षा पर कितना मजबूत है नया डेटा कानून?

सौजन्य से:- etvbharat.com

DPDP अधिनियम 2023 : बच्चों की डिजिटल सुरक्षा पर कितना मजबूत है नया डेटा कानून ?, यहां जानिये

18 साल से कम उम्र के बच्चों का डिजिटल डेटा कैसे होगा सुरक्षित, जानिए...अश्वनी पारीक की रिपोर्ट...

Published : July 31, 2026 at 5:33 PM IST

जयपुर : डिजिटल दौर में बच्चों की ऑनलाइन मौजूदगी तेजी से बढ़ रही है. पढ़ाई से लेकर गेमिंग, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शॉपिंग, मनोरंजन और अलग-अलग डिजिटल सेवाओं तक बच्चों का इस्तेमाल लगातार बढ़ा है. इसके साथ ही बच्चों की निजी जानकारी के संग्रह, इस्तेमाल, प्रोसेसिंग और संभावित दुरुपयोग को लेकर चिंता भी बढ़ी है. ऐसे वक्त में डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 यानी डीपीडीपी अधिनियम भारत के डेटा संरक्षण ढांचे में एक अहम कानून है. इस कानून में बच्चों के व्यक्तिगत डेटा को लेकर सामान्य उपयोगकर्ताओं की तुलना में अलग से सुरक्षा प्रावधान किए गए हैं. इनमें माता-पिता या वैध अभिभावक की सत्यापित सहमति, बच्चों के डेटा की प्रोसेसिंग से होने वाले नुकसान पर रोक, बच्चों की ट्रैकिंग और व्यवहार की निगरानी के अलावा लक्षित विज्ञापन पर प्रतिबंध जैसे प्रावधान शामिल हैं.

हालांकि, यहां एक अहम बात समझना जरूरी है. डीपीडीपी अधिनियम को 11 अगस्त 2023 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी, लेकिन इसकी सभी धाराएं एक साथ लागू नहीं हुईं. केंद्र सरकार ने 13 नवंबर 2025 को इसके लागू होने की समय-सीमा तय की. अधिनियम की धारा 9 समेत धारा 3 से 17 के कई महत्वपूर्ण प्रावधान 13 नवंबर 2025 से 18 महीने बाद लागू होने के लिए निर्धारित किए गए हैं.

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डीपीडीपी अधिनियम 2023 क्या है ? : राजस्थान हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रतीक कासलीवाल के मुताबिक डिजिटल डेटा व्यक्तिगत अधिनियम, 2023 का मकसद डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की प्रोसेसिंग के दौरान व्यक्ति की निजी जानकारी की सुरक्षा और वैध डेटा प्रोसेसिंग के बीच संतुलन कायम करना है. कानून में डेटा प्रिंसिपल यानी जिस व्यक्ति का डेटा है और डेटा फिड्यूशियरी यानी जो संस्था यह तय करती है कि डेटा क्यों और किस तरीके से प्रोसेस किया जाएगा, दोनों की भूमिका तय की गई है. इस कानून में बच्चे की स्पष्ट परिभाषा दी गई है, जिसमें 18 साल की उम्र पूरी नहीं करने वाला व्यक्ति बच्चा माना गया है, यानी 18 साल से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा को लेकर कानून में विशेष सुरक्षा व्यवस्था की गई है.

बच्चों के डेटा पर विशेष सुरक्षा क्यों ? : कासलीवाल के मुताबिक बच्चों का डिजिटल डेटा सामान्य व्यक्तिगत के डेटा से ज्यादा संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि ऑनलाइन गतिविधियों से उनकी पसंद, व्यवहार, आदतों और रुचियों से जुड़ी जानकारी सामने आ सकती है. ऐसी जानकारी का इस्तेमाल व्यावसायिक प्रोफाइलिंग, व्यवहार की निगरानी या लक्षित विज्ञापन के लिए किया जाए तो बच्चे की निजता और उसकी डिजिटल स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है. इसी वजह से डीपीडीपी अधिनियम में बच्चों के व्यक्तिगत डेटा की प्रोसेसिंग के लिए अतिरिक्त शर्तें रखी गई हैं. इसमें माता-पिता की सत्यापित सहमति जरूरी है. डीपीडीपी अधिनियम की धारा 9 के तहत किसी बच्चे के व्यक्तिगत डेटा की प्रोसेसिंग से पहले उसके माता-पिता या वैध अभिभावक की सत्यापित सहमति लेना आवश्यक है.

इसका मतलब यह है कि केवल बच्चे का किसी वेबसाइट या ऐप पर जाकर 'मैं सहमत हूं' पर क्लिक कर देना पर्याप्त नहीं होगा. डेटा फिड्यूशियरी को यह सुनिश्चित करना होगा कि सहमति वास्तव में माता-पिता या वैध अभिभावक से मिली है. अगर कोई 15 साल का बच्चा किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खाता बनाता है तो केवल बच्चे की सहमति के आधार पर उसके व्यक्तिगत डेटा की प्रोसेसिंग नहीं की जा सकेगी. बच्चे के मामले में अभिभावक की सत्यापित सहमति की व्यवस्था लागू होगी.

बच्चे को नुकसान पहुंचाने वाली डेटा प्रोसेसिंग पर रोक : कासलीवाल के मुताबिक कानून बच्चों के डेटा की ऐसी प्रोसेसिंग पर रोक लगाता है, जिससे बच्चे के कल्याण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि किसी बच्चे की डिजिटल गतिविधियों से प्राप्त जानकारी का इस्तेमाल उसके मानसिक, शारीरिक या सामाजिक हितों के खिलाफ न हो. बच्चों की निजता की सुरक्षा सिर्फ डेटा चोरी रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि डेटा के इस्तेमाल से होने वाले संभावित नुकसान को भी कानून के दायरे में लाया गया है.

व्यवहार की ट्रैकिंग और लक्षित विज्ञापन पर बड़ा प्रतिबंध : बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक ट्रैकिंग और व्यवहार की निगरानी से जुड़ा है. कानून की धारा 9 में बच्चों की ट्रैकिंग या व्यवहार की निगरानी और बच्चों को लक्षित विज्ञापन पर रोक का प्रावधान है. मसलन, किसी बच्चे की ऑनलाइन गतिविधियों के आधार पर उसके बारे में लगातार यह पता लगाना कि वह किस तरह के गेम खेलता है, किन चीजों को देखता है या किस प्रकार की डिजिटल सामग्री में रुचि रखता है. फिर इसी व्यवहार के आधार पर उसे विज्ञापन दिखाना कानून के विशेष प्रावधानों के दायरे में आएगा.

कासलीवाल ने उदाहरण दिया कि यदि कोई बच्चा रोज शाम को ऑनलाइन गेम खेलता है. अगर किसी प्लेटफॉर्म के पास उसकी गतिविधियों से यह जानकारी आती है कि उसे खास तरह के गेम पसंद हैं. उसी व्यवहार संबंधी डेटा का इस्तेमाल करके उसे उसकी रुचि के आधार पर गेमिंग उत्पाद के विज्ञापन दिखाए जाते हैं तो बच्चों से संबंधित लक्षित विज्ञापन के प्रतिबंध का सवाल उठता है. इसी तरह यदि कोई बच्चा किसी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से रिमोट कंट्रोल कार खरीदता है और प्लेटफॉर्म को उसकी पसंद के बारे में जानकारी मिलती है तो उस जानकारी का इस्तेमाल बच्चे को व्यवहार के आधार पर लक्षित व्यावसायिक प्रचार देने के लिए करना कानून के तहत प्रतिबंधित गतिविधियों के दायरे में आ सकता है.

डेटा फिड्यूशियरी क्या है? डीपीडीपी अधिनियम में डेटा फिड्यूशियरी उस व्यक्ति या संस्था को कहा गया है, जो यह तय करती है कि व्यक्तिगत डेटा को किस उद्देश्य से और किस तरीके से प्रोसेस किया जाएगा. आसान भाषा में डेटा फिड्यूशियरी वह संस्था है जो तय करती है कि कौन सा व्यक्तिगत डेटा लिया जाएगा. डेटा किस उद्देश्य से लिया जाएगा, उसका इस्तेमाल कैसे किया जाएगा, डेटा को कितने समय तक रखा जाएगा और डेटा की सुरक्षा कैसे की जाएगी?. बच्चों के संदर्भ में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, गेमिंग सेवाएं, एडटेक और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म परिस्थितियों के अनुसार डेटा फिड्यूशियरी की भूमिका में आ सकते हैं.

डेटा फिड्यूशियरी की जिम्मेदारियां क्या हैं ? : कानून डेटा फिड्यूशियरी पर कई जिम्मेदारियां डालता है. इनमें व्यक्तिगत डेटा को सुरक्षित रखने, कानून के अनुसार उसका इस्तेमाल करने और डेटा प्रिंसिपल के अधिकारों का सम्मान करने जैसी जिम्मेदारियां शामिल हैं. डेटा फिड्यूशियरी को डेटा की प्रोसेसिंग के उद्देश्य और उसके इस्तेमाल को लेकर निर्धारित कानूनी दायरे में काम करना होगा. डेटा उल्लंघन होने की स्थिति में भी कानून और उसके तहत बनाए गए नियमों के अनुसार सूचना और अनुपालन संबंधी जिम्मेदारियां तय की गई हैं.

बच्चों के मामले में स्कूल और एडटेक प्लेटफॉर्म भी महत्वपूर्ण : बच्चों का व्यक्तिगत डेटा सिर्फ सोशल मीडिया ऐप्स तक सीमित नहीं है. स्कूलों के डिजिटल सिस्टम, लर्निंग ऐप्स, एडटेक प्लेटफॉर्म और दूसरे डिजिटल माध्यम भी बच्चों की जानकारी प्रोसेस कर सकते हैं. मसलन, स्कूल के पास बच्चे का नाम, उम्र, फोटो, शैक्षणिक रिकॉर्ड, अभिभावक की जानकारी या अन्य डिजिटल रिकॉर्ड हो सकते हैं. ऐसे डेटा का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जा रहा है और उसे कहां साझा किया जा रहा है, यह भी डेटा संरक्षण के नजरिए से महत्वपूर्ण हो जाता है. कासलीवाल के मुताबिक, बच्चों के डेटा को लेकर कानून में विशेष महत्व दिया गया है. उनके अनुसार, किसी बच्चे के डेटा की प्रोसेसिंग के लिए माता-पिता या वैध अभिभावक की सत्यापित सहमति महत्वपूर्ण कड़ी है.

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डेटा प्रिंसिपल और डेटा फिड्यूशियरी को ऐसे समझें : प्रतीक कासलीवाल के मुताबिक, डिजिटल डेटा की पूरी व्यवस्था में दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं. इसमें डेटा प्रिंसिपल वह व्यक्ति है, जिससे संबंधित व्यक्तिगत डेटा है, जबकि डेटा फिड्यूशियरी वह संस्था है जो उस डेटा की प्रोसेसिंग के उद्देश्य और तरीके को निर्धारित करती है. उदाहरण के तौर पर अगर कोई बच्चा किसी ऐप या वेबसाइट का इस्तेमाल करता है तो बच्चे से जुड़ी डिजिटल जानकारी डेटा प्रिंसिपल से संबंधित होगी और उस जानकारी को प्रोसेस करने वाला प्लेटफॉर्म डेटा फिड्यूशियरी की भूमिका में हो सकता है. ऐसी स्थिति में डेटा फिड्यूशियरी की जिम्मेदारी है कि बच्चे के डेटा का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य और कानून के अनुरूप हो.

माता-पिता के लिए क्या मायने रखता है? : डीपीडीपी व्यवस्था में डेटा प्रिंसिपल को कई अधिकार दिए गए हैं. इनमें व्यक्तिगत डेटा से जुड़ी जानकारी हासिल करने, उसमें सुधार कराने और निर्धारित परिस्थितियों में उसे मिटाने की मांग करने जैसे अधिकार शामिल हैं. सहमति आधारित प्रोसेसिंग के मामलों में सहमति को वापस लेने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है. इसके अलावा शिकायत निवारण का रास्ता भी कानून में रखा गया है. बच्चों के मामले में इन अधिकारों को समझना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कानून की व्यवस्था में बच्चे के लिए माता-पिता या वैध अभिभावक की भूमिका विशेष है.

क्या डेटा हमेशा के लिए रखा जा सकता है? : नहीं. डेटा संरक्षण व्यवस्था में उद्देश्य से जुड़ा डेटा रखने की अवधि महत्वपूर्ण सिद्धांत है. जिस मकसद के लिए व्यक्तिगत डेटा लिया गया था, वह उद्देश्य समाप्त हो जाता है और किसी अन्य कानून के तहत डेटा को रखना आवश्यक नहीं है, तो डेटा को हटाने की जरूरत हो सकती है. इसका मूल विचार यह है कि किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत डेटा बिना जरूरत अनिश्चितकाल तक सिर्फ इसलिए नहीं रखा जाना चाहिए कि वह भविष्य में कभी काम आ सकता है.

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भारत का डेटा संरक्षण बोर्ड क्या करेगा ? : डीपीडीपी अधिनियम के तहत भारत के डेटा संरक्षण बोर्ड की व्यवस्था की गई है. कानून के अनुसार बोर्ड की स्थापना, उसकी संरचना, शक्तियां और कार्य निर्धारित किए गए हैं. बोर्ड की भूमिका में कानून के तहत आने वाली शिकायतों और मामलों का निस्तारण, डेटा फिड्यूशियरी के अनुपालन से जुड़े मामलों पर कार्रवाई और कानून के तहत निर्धारित दंडात्मक कार्रवाई जैसे विषय शामिल हैं. केंद्र सरकार ने 13 नवंबर 2025 को भारत के डेटा संरक्षण बोर्ड की स्थापना से संबंधित अधिसूचना भी जारी की थी.

शिकायत से अपील तक क्या है व्यवस्था ? : अगर डेटा संरक्षण से जुड़े किसी मामले में शिकायत या विवाद सामने आता है तो कानून के तहत निर्धारित शिकायत निवारण और बोर्ड की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी. कासलीवाल के मुताबिक, यदि शिकायत का समाधान निर्धारित प्रक्रिया में नहीं होता है तो आगे बोर्ड के समक्ष मामला उठाया जा सकता है. इसके बाद बोर्ड के आदेश के खिलाफ अपील की व्यवस्था भी है. डीपीडीपी अधिनियम की धारा 29 के मुताबिक बोर्ड के आदेश या निर्देश से प्रभावित व्यक्ति अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष अपील कर सकता है. कानून में अपीलीय न्यायाधिकरण के रूप में दूरसंचार विवाद निपटान और अपीलीय न्यायाधिकरण यानी टीडीसैट का प्रावधान किया गया है. इस पूरी व्यवस्था को आसान भाषा में शिकायत - डेटा फिड्यूशियरी का शिकायत निवारण - डेटा संरक्षण बोर्ड - अपीलीय न्यायाधिकरण की प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है.

कानून तोड़ने पर कितना जुर्माना : डीपीडीपी अधिनियम में उल्लंघनों के लिए आर्थिक दंड का प्रावधान काफी बड़ा रखा गया है. अनुसूची के अनुसार अलग-अलग उल्लंघनों पर अधिकतम जुर्माने की सीमा अलग है. इसमें डेटा सुरक्षा उपायों में लापरवाही पर 250 करोड़ तक का जुर्माना लग सकता है. इसी तरह से व्यक्तिगत डेटा उल्लंघन की सूचना से संबंधित उल्लंघन पर 200 करोड़ तक, बच्चों के व्यक्तिगत डेटा से जुड़े प्रावधानों का उल्लंघन पर 200 करोड़ तक, महत्वपूर्ण डेटा फिड्यूशियरी के दायित्वों का उल्लंघन पर 150 करोड़ तक और अन्य प्रावधानों का उल्लंघन करने पर 50 करोड़ रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.

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क्या सरकार और कुछ संस्थाओं को छूट मिल सकती है ? : डीपीडीपी अधिनियम में कुछ परिस्थितियों और कुछ प्रकार की डेटा प्रोसेसिंग के लिए छूट का प्रावधान है. राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, अपराधों की रोकथाम या जांच, न्यायिक कार्यवाही तथा कानून में निर्धारित अन्य परिस्थितियों से जुड़े मामलों में अलग प्रावधान लागू हो सकते हैं. यही कारण है कि बच्चों के डेटा की सुरक्षा को समझते समय यह भी देखना जरूरी है कि संबंधित डेटा प्रोसेसिंग किस उद्देश्य से हो रही है और क्या वह कानून में दी गई किसी विशेष छूट के अंतर्गत आती है. कासलीवाल के मुताबिक, आज के डिजिटल दौर में डेटा किसी शक्ति से कम नहीं है. व्यक्तिगत डेटा के गलत इस्तेमाल को रोकना ,इसीलिए बेहद महत्वपूर्ण हो गया है.

उनका कहना है कि डीपीडीपी अधिनियम में बच्चों को लेकर विशेष प्रावधान किए गए हैं. 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चे की श्रेणी में रखा गया है और उसके डेटा की प्रोसेसिंग के लिए माता-पिता या वैध अभिभावक की सत्यापित सहमति महत्वपूर्ण है. बच्चे के डेटा का इस्तेमाल सिर्फ उस उद्देश्य तक सीमित रहना चाहिए, जिसके लिए उसे लिया गया है. डेटा से बच्चे की पसंद, व्यवहार या रुझान के बारे में जानकारी मिलने के बाद उसका इस्तेमाल व्यावसायिक प्रोफाइलिंग या लक्षित प्रचार के लिए करना बच्चों से संबंधित डेटा संरक्षण प्रावधानों के लिहाज से महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है. उन्होंने यह भी बताया कि कानून में शिकायत और अपील की व्यवस्था रखी गई है, जिससे डेटा संरक्षण से जुड़े विवादों के निस्तारण का रास्ता उपलब्ध होता है.

स्कूल की वेबसाइट पर बच्चे की फोटो लगाने का क्या ? : किसी बच्चे की फोटो या अन्य व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल किस परिस्थिति में किया जा रहा है? इसका उद्देश्य क्या है? संबंधित संस्था किस कानूनी आधार पर डेटा प्रोसेस कर रही है और क्या कोई विशेष छूट लागू है? इन सभी बातों पर स्थिति निर्भर करेगी. ऐसे में यह कहना सही नहीं होगा कि हर परिस्थिति में स्कूल को बच्चे की किसी भी फोटो के लिए एक ही तरह की सहमति प्रक्रिया अपनानी होगी, लेकिन बच्चों के व्यक्तिगत डेटा को डिजिटल माध्यम पर प्रकाशित या प्रोसेस करते समय निजता और डेटा संरक्षण संबंधी दायित्वों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

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यूट्यूब किड्स, इंस्टाग्राम और गेमिंग ऐप्स पर क्या असर? : बच्चों के डेटा से जुड़े प्रावधानों का महत्व उन डिजिटल सेवाओं में ज्यादा दिखाई देता है, जहां बच्चों की गतिविधियों, रुचियों या व्यवहार से जुड़ी जानकारी प्रोसेस हो सकती है. इनमें परिस्थितियों के अनुसार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म, शैक्षणिक और लर्निंग ऐप्स, एडटेक प्लेटफॉर्म, स्कूल ईआरपी सिस्टम, बच्चों के लिए डिजिटल कंटेंट प्लेटफॉर्म, ई-कॉमर्स और अन्य डिजिटल सेवाएं शामिल हैं. किसी विशेष कंपनी या ऐप पर डीपीडीपी अधिनियम की कोई खास बाध्यता लागू है या नहीं, यह उसकी सेवा, डेटा प्रोसेसिंग और संबंधित कानूनी परिस्थितियों पर निर्भर करेगा. ऐसे में केवल किसी प्लेटफॉर्म का नाम देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसके ऊपर हर स्थिति में एक समान दायित्व लागू होगा.

2025 में क्या बदलाव ? : डीपीडीपी अधिनियम 2023 के बाद इसके क्रियान्वयन ढांचे को स्पष्ट करने के लिए डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण नियम, 2025 बनाए गए. केंद्र सरकार ने 13 नवंबर 2025 को नियम अधिसूचित किए. नियम भी अलग-अलग चरणों में लागू होने के लिए निर्धारित किए गए हैं. इसी के साथ केंद्र सरकार ने अधिनियम के प्रावधानों के लिए भी अलग-अलग शुरुआत की समय-सीमा जारी की. इसका मतलब यह है कि 2023 में कानून बनने और 2025 में नियम अधिसूचित होने के बावजूद सभी दायित्व एक ही तारीख से लागू नहीं हुए.

बच्चों की डिजिटल सुरक्षा कितनी मजबूत होगी ? : कासलीवाल के मुताबिक डीपीडीपी अधिनियम की सबसे बड़ी ताकत यह है कि बच्चों को सामान्य डेटा प्रिंसिपल से अलग संवेदनशील श्रेणी मानते हुए अतिरिक्त सुरक्षा दी गई है. इसमें 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सत्यापित माता-पिता की सहमति, नुकसान से बचाव, ट्रैकिंग/व्यवहार की निगरानी पर रोक और लक्षित विज्ञापन पर रोक का ढांचा तैयार किया गया है, लेकिन कानून की वास्तविक प्रभावशीलता केवल प्रावधानों पर निर्भर नहीं करेगी. इसका बड़ा हिस्सा इस बात पर निर्भर करेगा कि डेटा फिड्यूशियरी इन नियमों को व्यवहार में कैसे लागू करते हैं. माता-पिता की सहमति का सत्यापन किस तरह होता है? बच्चों की पहचान कैसे की जाती है? डेटा कितना समय रखा जाता है और डेटा संरक्षण बोर्ड उल्लंघनों पर कितनी प्रभावी कार्रवाई करता है?

आम तौर पर जाहिर होता है कि बच्चों की डिजिटल दुनिया अब सिर्फ पढ़ाई या मनोरंजन तक सीमित नहीं हैं. गेमिंग, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शॉपिंग और लर्निंग प्लेटफॉर्म के जरिए बच्चे बड़ी मात्रा में डिजिटल फुटप्रिंट छोड़ते हैं. इन फुटप्रिंट से उनकी पसंद, व्यवहार और रुचियों का अंदाजा लगाया जा सकता है. डीपीडीपी अधिनियम 2023 इसी चुनौती के बीच बच्चों के डिजिटल व्यक्तिगत डेटा को अतिरिक्त सुरक्षा देने की कोशिश करता है. कानून का साफ पैगाम है कि बच्चे के डेटा को सिर्फ एक व्यावसायिक संपत्ति की तरह नहीं देखा जा सकता. उसकी निजता, सुरक्षा और कल्याण भी काफी अहम है. माता-पिता की सत्यापित सहमति, बच्चों की ट्रैकिंग और व्यवहार की निगरानी पर रोक तथा लक्षित विज्ञापन पर प्रतिबंध जैसे प्रावधान बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच तैयार करते हैं.

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