प्रदर्शनों पर पुलिस बल प्रयोग: भारतीय कानून और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय
संविधान देता है प्रदर्शन का अधिकार, लेकिन शर्तों के साथ। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस बल प्रयोग पर महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं, जिसमें 'न्यूनतम बल' का सिद्धांत शामिल है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
संविधान देता है प्रदर्शन का अधिकार, लेकिन शर्तों के साथ
संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्ण एवं निःशस्त्र सभा करने का अधिकार दिया गया है। लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। अनुच्छेद 19(2) और 19(3) राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के हित में उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने Mazdoor Kisan Shakti Sangathan बनाम Union of India (2018) में भी कहा है कि विरोध लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन इससे दूसरों के अधिकार प्रभावित नहीं होने चाहिए।पुलिस कब और कैसे बल प्रयोग कर सकती है?
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत मजिस्ट्रेट निषेधाज्ञा लागू कर सकते हैं।
- यदि कोई सभा अवैध घोषित हो जाए या आदेश के बावजूद न हटे, तो BNSS की धाराएं 148 से 151 पुलिस और कार्यपालक मजिस्ट्रेट को उसे तितर-बितर करने की शक्ति देती हैं।
- आवश्यकता पड़ने पर सशस्त्र बलों की सहायता भी ली जा सकती है। हालांकि BNSS यह नहीं बताता कि कितना बल प्रयोग उचित होगा।
- कानून में केवल ‘आवश्यक बल’ की बात कही गई है। यही कानूनी अस्पष्टता विवादों का कारण बनती है और हर मामले में अदालतों को परिस्थितियों के आधार पर फैसला करना पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने तय किए 'न्यूनतम बल' के सिद्धांत
- पुलिस बल प्रयोग पर सबसे महत्वपूर्ण फैसला Ramlila Maidan Incident v. Home Secretary (2012) माना जाता है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस का उद्देश्य प्रदर्शनकारियों को दंडित करना नहीं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था बहाल करना होना चाहिए।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी कार्रवाई में Necessity (आवश्यकता), Proportionality (अनुपातिकता) और Minimum Force (न्यूनतम बल) के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है।
- जहां संभव हो, पहले चेतावनी दी जानी चाहिए और शांतिपूर्ण तरीके अपनाने चाहिए। अत्यधिक बल प्रयोग अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
- अदालत ने उस मामले में पुलिस कार्रवाई को शक्ति का दुरुपयोग बताते हुए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई और पीड़ितों को अंतरिम मुआवजा देने का भी आदेश दिया था।
पुलिसिया जवाबदेही की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
दरअसल, भारत में अभी तक ऐसा कोई केंद्रीय कानून नहीं है जो हर दंगा नियंत्रण अभियान में पुलिस कर्मियों के लिए अनिवार्य पहचान संख्या, बॉडी कैमरा या वीडियो रिकॉर्डिंग की बाध्यता तय करता हो। यह व्यवस्था अधिकांश राज्यों में पुलिस मैनुअल और प्रशासनिक निर्देशों पर निर्भर है। यही वजह है कि देश में एक समान मानक नहीं बन पाया है। वैसे अदालतें लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग के महत्व को स्वीकार करती रही हैं। CJP प्रदर्शन से जुड़े मामलों में भी दिल्ली हाई कोर्ट ने उपलब्ध वीडियो फुटेज सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है।‘पेपर लीक दोषियों को कड़ी सजा मिलेगी - बोले पीएम मोदी’, ऐसे में जानें नए कानूनों के तहत कड़ी सजा का पूरा प्रावधान
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