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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: आवारा पशुओं से हादसों के पीड़ितों को 15 लाख मुआवजा

सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशुओं से हादसों पर सख्त रुख अपनाते हुए पीड़ित परिवार को 15 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से ऐसी घटनाओं की रोकथाम और मुआवजा व्यवस्था के लिए ठोस नीति बनाने को कहा है।

31 जुलाई 2026 को 08:15 pm बजे
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: आवारा पशुओं से हादसों के पीड़ितों को 15 लाख मुआवजा

सौजन्य से:- Jagran

आवारा पशुओं से हादसों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, पीड़ित परिवार को 15 लाख मुआवजा देने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशुओं से होने वाले हादसों पर बड़ा फैसला सुनाते हुए पीड़ित परिवार को 15 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। ...और पढ़ें

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

माला दीक्षित, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सड़क और सार्वजनिक स्थानों पर आवारा पशुओं से होने वाले हादसों पर महत्वपूर्ण फैसला देते हुए पीड़ित परिवार को 15 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने पशुओं से होने वाले हादसों पर चिंता जताते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को आवारा पशुओं से होने वाली दुर्घटनाओं के पीड़ितों को मुआवजा देने और आवारा पशुओं से संबंधित कानूनों के बेहतर कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए एक तंत्र स्थापित करने को कहा है।

शीर्ष अदालत ने सरकारों से ऐसी घटनाओं की रोकथाम और मुआवजा व्यवस्था के लिए ठोस नीति बनाने को कहा है। दूरगामी प्रभाव वाला यह फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और एन. कोटीश्वर सिंह की पीठ ने पंजाब के एक मामले में दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशु हादसों पर दिया अहम फैसला

पंजाब के संगरूर में 21 सितंबर 2007 को सड़क पर टहलते समय विजय पर एक आवारा सांड़ ने हमला कर दिया। इससे उसके सिर पर गहरी चोट लगी और बाद में उसकी मृत्यु हो गई।

घटना की पुलिस में रिपोर्ट हुई। जब वह घायल था तभी उसके मुआवजा दावे पर अथारिटीज के साथ समझौता बातचीत हुई लेकिन कोई हल नहीं निकला। उसकी मौत के बाद उसकी पत्नी निशा ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर मुआवजे की मांग की।

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हाई कोर्ट की एकलपीठ ने मोटर वाहन अधिनियम के तहत तय सिद्धांत को लागू करते हुए 29.32 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया लेकिन हाई कोर्ट की खंडपीठ ने फैसला पलट दिया और कहा कि रिट याचिका में मुआवजा नहीं दिया जा सकता। याचिकाकर्ता को इसके लिए सिविल कोर्ट में मुकदमा करना चाहिए। जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट आया था।

15 लाख मुआवजा देने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए कहा कि इतने लंबे समय बाद पीड़ित परिवार को सिविल कोर्ट भेजना न्यायोचित नहीं होगा। ऐसा करने से पीड़ित बिना किसी प्रभावी कानूनी उपाय के रह जाएंगे। कोर्ट ने पीड़ित परिवार को 15 लाख रुपये मुआवजा चार सप्ताह में देने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ये आदेश मौजूदा मामले की परिस्थितियों को देखते हुए दिया गया है इसे भविष्य के लिए नजीर नहीं माना जाएगा। साथ ही कहा कि हर मामले में एकल पीठ द्वारा अपनाए गए वाहन दुर्घटना में मुआवजा तय करने के सिद्धांत को नहीं लागू किया जा सकता ये हर केस की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

हालांकि पंजाब सरकार ने 2020 में मुआवजा नीति बना दी है जो कि लागू हो चुकी है। इसलिए वहां इससे पहले के मामलों में ही मुआवजा तय करने की बात है।

कोर्ट ने आवारा पशुओं पर जताई चिंता

फैसले में कोर्ट ने आवारा पशुओं से होने वाले हादसों पर चिंता जताई है। कोर्ट ने सड़कों, राजमार्गों पर आवारा पशुओं से होने वाले खतरे को रेखांकित करते हुए कहा कि ये घटना कोई अनोखी और अनसुनी नहीं है। अखबारों में आये दिन आवारा पशुओं के कारण दुर्घटना की खबरें दिखती हैं। इस बड़े मुद्दे पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

आखिर आवारा पशुओं से वाहन टकराने की दुर्घटनाओं में लोगों की जान जाने और ऐसी टक्कर में पशुओँ की जान जाने के मामलों से निबटने के लिए क्या तंत्र है। पीड़ित परिवारों को कैसे मुआवजा मिलेगा। ये दुर्घटनाएं पैदल और वाहन दोनों के लिए घातक हैं।

ऐसी दुर्घटनाओं के सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि देश भर में 2018 में पशु हमलों में 1130 लोगों की मौत हुई, 2019 में 1425 की और 2020 में 1305 मौतें हुईं।

इसे ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से आवारा पशुओं से होने वाली दुर्घटनाओं के पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए एक तंत्र स्थापित करने को कहा है। इसके साथ ही कोर्ट पशुओं में टैगिंग अनिवार्य करने और आवारा पशुओं से संबंधित कानूनों के बेहतर कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने को कहा है।

केंद्र-राज्यों को मुआवजा देने के निर्देश

कोर्ट ने फैसले में पशु कल्याण के प्रति राज्यों के संवैधानिक दायित्व को उल्लेखित किया है। कोर्ट ने फैसले में नोट किया कि पहले से ही कम से कम 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पशु कल्याण के लिए समर्पित कानून लागू हैं।

पशुओं के आर्थिक रूप से उपयोगी न रहने पर उन्हें छोड़ देने की प्रवृत्ति का उल्लेख करते हुए फैसले में कहा कि इस वास्तविकता से इनकार नहीं किया जा सकता कि अनुपयोगी या आर्थिक उद्देश्य पूरा न कर पाने वाले पशुओं को छोड़ दिया जाता है।

कहा कि ऐसा करने वाले मालिकों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसे पशुओं को उचित अथारिटी द्वारा संचालित आश्रयों में सुरक्षित रूप से स्थानांतरित किया जाए। कोर्ट ने उन सभी राज्यों को निर्देश दिया है जिन्होंने पशु कल्याण संबंधी कानून बनाए हैं, कि उनका कार्यान्वयन सुनिश्चित करें।

इसमें आवारा पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं, में मुआवजे के लिए एक तंत्र तैयार करना, सभी पशुओं की टैगिंग अनिवार्य करने, टैगिंग और आश्रयों के देखरेख के लिए नोडल अधिकारियों की नियुक्ति करने और ये सुनिश्चित करने की भी सिफारिश की गई है कि परित्यक्त पशुओँ को उचित रिकार्ड के साथ अधिकृत आश्रयों में सुरक्षित रूप से स्थानांतरित किया जाए।

कोर्ट ने कहा कि फैसले की प्रति सभी राज्यों के मुख्य सचिवों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों और राज्य विधि सेवा प्राधिकरणों के सदस्य सचिवों को उचित कार्रवाई के लिए भेजी जाए।

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