सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट को फटकारा, 11 साल पुराने मुकदमे की धीमी रफ्तार पर सवाल उठाए
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित एक कमर्शियल सूट की सुनवाई की गति पर कड़ी नाराजगी जताई और कहा कि इस तरह की धीमी गति की प्रगति सोचनीय है। अदालत ने माना कि कमर्शियल विवादों का शीघ्र निस्तारण व्यापारिक वातावरण और निवेशकों के विश्वास के लिए अत्यंत आवश्यक है।

सौजन्य से:- Navbharat Times
हजारों करोड़ की 'सिंधिया विरासत' और तीन पीढ़ियों की 'कानूनी जंग' पर समझौते के संकेत, जानिए क्या है लीगल फैक्टरइसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित एक कमर्शियल सूट की सुनवाई की गति पर कड़ी नाराजगी जताई। शीर्ष अदालत ने कहा कि साल 2015 में दायर मुकदमे में 2026 तक भी वादी के साक्ष्य भी पूरे नहीं होना न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति को दर्शाता है। ऐसी धीमी गति की प्रगति सोचनीय है।
11 साल पुराने मुकदमे की धीमी रफ्तार
- साल 2013 में हुए एक प्रोफेशनल सर्विस एग्रीमेंट के जरिए LMT को स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक SCB के लिए एक मोबाइल एप्लीकेशन बनाने और उसे मैनेज करने का काम सौंपा गया था। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार बाद में आपसी विवाद शुरु हुआ, LMT ने रेवेन्यू-शेयरिंग क्लॉज़ के तहत नुकसान का दावा किया। अप्रैल 2015 में, उसने 18% सालाना ब्याज के साथ ₹4.46 करोड़ की मांग करते हुए एक कानूनी नोटिस भेजा।
- LMT ने मई 2015 में दिल्ली हाई कोर्ट में एक सिविल केस दायर किया। नवंबर 2016 में मामले के मुख्य मुद्दों को तय किया गया। जनवरी 2018 में इस मुकदमे को कमर्शियल सूट के तौर पर फिर से नंबर दिया गया। उसी दिन, हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड पर अतिरिक्त दस्तावेज़ पेश करने के लिए LMT की पहली अर्ज़ी को मंज़ूरी दे दी। LMT के पहले गवाह से पूछताछ मई 2023 में पूरी हुई।
- साल 2025 में LMT ने फिर से गवाह बुलाने और बैकएंड डेटा को पेश करने की मांग की। हाई कोर्ट ने फरवरी 2025 में इस अर्ज़ी को खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि LMT देरी के लिए कोई उचित कारण नहीं बता पाई थी। फिर यह मामला शीर्ष अदालत पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट में मामला, अवलोकन और फैसला
- सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट के फरवरी 2025 के आदेश को चुनौती देने वाली अपील के रूप में आया था। जिसकी सुनवाई जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने की।
- अदालत ने देखा कि मूल वाद मई 2015 में दायर हुआ था और जनवरी 2018 में इसे कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के तहत कमर्शियल सूट के रूप में दर्ज किया गया। लेकिन साल 2026 तक भी वादी के साक्ष्य पूरे नहीं हुए हैं।
- कोर्ट ने कहा, रुक-रुक कर या टुकड़ों में काम करने के तरीके को मंज़ूरी नहीं दी जा सकती। बहुत ज़्यादा सबूत होना भी कोई ठोस आधार नहीं है। पीठ ने कहा कि इस मुकदमे की गति पर तो एक घोंघा भी सवाल उठा सकता है।
- अदालत ने माना कि कमर्शियल विवादों का शीघ्र निस्तारण व्यापारिक वातावरण और निवेशकों के विश्वास के लिए अत्यंत आवश्यक है। बेंच ने ज़ोर देकर कहा कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट इसलिए बनाया गया था ताकि ज़्यादा कीमत वाले व्यावसायिक विवादों का तेज़ी से निपटारा हो सके।
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कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की मंशा पर अदालत ने क्या कहा?
मामले में एक बात और गौर करने वाली रही कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ दोहराया कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 का उद्देश्य उच्च मूल्य वाले व्यापारिक विवादों का त्वरित समाधान सुनिश्चित करना है। अदालत ने कहा कि कानून की कठोर समय-सीमा और प्रक्रियात्मक अनुशासन को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यदि पक्षकारों को बार-बार अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने की छूट दी जाएगी तो मुकदमे की प्रक्रिया कभी समाप्त ही नहीं होगी। साक्ष्य चाहे कितने भी विस्तृत क्यों न हों, वे कानून की स्पष्ट मंशा और कठोरता को कमजोर नहीं कर सकते।बड़ी देर कर दी जनाब आपने, FIR में 23 साल की देरी स्वीकार नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द हाईकोर्ट का फैसला
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