40 साल पुराने बोफोर्स घोटाले की फाइल बंद, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की आखिरी अपील
सुप्रीम कोर्ट ने बोफोर्स घोटाले के मामले में हिंदुजा ब्रदर्स को बरी करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अंतिम अपील को खारिज कर दिया है। इससे भारत के सबसे चर्चित और लंबे समय तक चले घोटालों में से एक का कानूनी अध्याय समाप्त हुआ है।

सौजन्य से:- Amar Ujala
{"_id":"6a7565de3419e1771709a903","slug":"file-on-40-year-old-bofors-scandal-closed-supreme-court-dismisses-final-appeal-what-were-the-allegations-2026-08-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bofors Case: 40 साल पुराने बोफोर्स घोटाले की फाइल बंद, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की आखिरी अपील; क्या लगे थे आरोप?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Bofors Case: 40 साल पुराने बोफोर्स घोटाले की फाइल बंद, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की आखिरी अपील; क्या लगे थे आरोप?
Fri, 07 Aug 2026 10:28 AM IST
Pavan
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Pavan
Updated Fri, 07 Aug 2026 10:28 AM IST
सार
देश के सबसे चर्चित और लंबे समय तक चले बोफोर्स घोटाले का कानूनी अध्याय अब पूरी तरह समाप्त हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर अंतिम याचिका खारिज कर दी, जिसमें हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी गई थी। इसके साथ ही करीब 40 साल पुराने इस मामले का कानूनी अंत हो गया।
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुजा ब्रदर्स को बरी करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के फैसले के खिलाफ दायर अंतिम अपील को भी खारिज कर दिया है। इसके साथ ही भारत के सबसे चर्चित और लंबे समय तक चलने वाले भ्रष्टाचार के मामलों में से एक बोफोर्स कांड का कानूनी अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया है।
सर्वोच्च अदालत का फैसला
मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की बेंच ने याचिकाकर्ता (अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल) की स्थगन की मांग को ठुकराते हुए मामले की आखिरी याचिका को खारिज कर दिया। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने भी इस मामले में अपील की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। 1986 में हुए इस रक्षा सौदे का विवाद लगभग 40 साल तक अदालतों और भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा।
यह भी पढ़ें- क्या संसद में खत्म होगा गतिरोध?: अमित शाह पेश करेंगे FCRA बिल, नीट आंदोलन में बल प्रयोग पर दे सकते हैं बयान
विज्ञापन
क्या है पूरा मामला और इसका इतिहास?
यह पूरा मामला 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुए 1,437 करोड़ रुपये के उस समझौते से जुड़ा है, जिसके तहत भारतीय सेना के लिए 400 हॉवित्जर तोपें खरीदी जानी थीं। साल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने यह सनसनीखेज खुलासा किया कि इस सौदे को हासिल करने के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को अवैध कमीशन दिए गए थे। इस खुलासे ने भारतीय राजनीति में तहलका मचा दिया था। राजीव गांधी सरकार पर गंभीर सवाल उठे और 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक बड़ा कारण माना गया।
मामले में सीबीआई ने की जांच
सीबीआई ने जनवरी 1990 में एफआईआर दर्ज की। अक्तूबर 2000 में दायर की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट में हिंदुजा बंधुओं (श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा) का नाम भी शामिल किया गया था।
दिल्ली हाईकोर्ट का 2005 का फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मई 2005 को अपने फैसले में हिंदुजा ब्रदर्स और स्वीडिश फर्म एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था। साथ ही, हाईकोर्ट ने सीबीआई की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए यह भी टिप्पणी की थी कि इस जांच पर सरकारी खजाने के करीब 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
यह भी पढ़ें- Rajya Sabha: बांग्लादेश के साथ फरक्का जल संधि के नवीनीकरण का विरोध, JDU सांसद संजय झा की केंद्र सरकार से अपील
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस मामले के लंबे खिंचने पर हैरानी जताई। जब याचिकाकर्ता के वकील ने कुछ मृत प्रतिवादियों के नाम हटाने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा, तो जस्टिस पारदीवाला ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, 'हिंदुजा ब्रदर्स और सीबीआई को लेकर यह सब क्या चल रहा है? सभी कार्यवाही रद्द हो चुकी हैं, यह क्या है? कितने साल बीत चुके हैं?' वहीं, वकील द्वारा यह याद दिलाने पर कि यह सौदा 1986 में हुआ था, बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि अब इस मामले में और देरी या सुनवाई की कोई गुंजाइश नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम निर्णय के साथ ही बोफोर्स पे-ऑफ केस से जुड़ी सभी कानूनी लड़ाइयां अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई हैं।
विज्ञापन
सर्वोच्च अदालत का फैसला
मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की बेंच ने याचिकाकर्ता (अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल) की स्थगन की मांग को ठुकराते हुए मामले की आखिरी याचिका को खारिज कर दिया। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने भी इस मामले में अपील की थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। 1986 में हुए इस रक्षा सौदे का विवाद लगभग 40 साल तक अदालतों और भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा।
विज्ञापन
यह भी पढ़ें- क्या संसद में खत्म होगा गतिरोध?: अमित शाह पेश करेंगे FCRA बिल, नीट आंदोलन में बल प्रयोग पर दे सकते हैं बयान
विज्ञापन
क्या है पूरा मामला और इसका इतिहास?
यह पूरा मामला 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुए 1,437 करोड़ रुपये के उस समझौते से जुड़ा है, जिसके तहत भारतीय सेना के लिए 400 हॉवित्जर तोपें खरीदी जानी थीं। साल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने यह सनसनीखेज खुलासा किया कि इस सौदे को हासिल करने के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को अवैध कमीशन दिए गए थे। इस खुलासे ने भारतीय राजनीति में तहलका मचा दिया था। राजीव गांधी सरकार पर गंभीर सवाल उठे और 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक बड़ा कारण माना गया।
मामले में सीबीआई ने की जांच
सीबीआई ने जनवरी 1990 में एफआईआर दर्ज की। अक्तूबर 2000 में दायर की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट में हिंदुजा बंधुओं (श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा) का नाम भी शामिल किया गया था।
दिल्ली हाईकोर्ट का 2005 का फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मई 2005 को अपने फैसले में हिंदुजा ब्रदर्स और स्वीडिश फर्म एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था। साथ ही, हाईकोर्ट ने सीबीआई की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए यह भी टिप्पणी की थी कि इस जांच पर सरकारी खजाने के करीब 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
यह भी पढ़ें- Rajya Sabha: बांग्लादेश के साथ फरक्का जल संधि के नवीनीकरण का विरोध, JDU सांसद संजय झा की केंद्र सरकार से अपील
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस मामले के लंबे खिंचने पर हैरानी जताई। जब याचिकाकर्ता के वकील ने कुछ मृत प्रतिवादियों के नाम हटाने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा, तो जस्टिस पारदीवाला ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, 'हिंदुजा ब्रदर्स और सीबीआई को लेकर यह सब क्या चल रहा है? सभी कार्यवाही रद्द हो चुकी हैं, यह क्या है? कितने साल बीत चुके हैं?' वहीं, वकील द्वारा यह याद दिलाने पर कि यह सौदा 1986 में हुआ था, बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि अब इस मामले में और देरी या सुनवाई की कोई गुंजाइश नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम निर्णय के साथ ही बोफोर्स पे-ऑफ केस से जुड़ी सभी कानूनी लड़ाइयां अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई हैं।
Powered by Nyaya 247 News
संबंधित ख़बरें
इसी विषय की और ख़बरें →
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका दाखिल करने वाले वकील के 'जली हुई नकदी' मामले की जांच के लिए

सुप्रीम कोर्ट ने सहयोग पोर्टल पर उच्च न्यायालयों की कार्यवाही पर रोक लगा दी

ओलंपिक पहलवान सुशील कुमार को दिल्ली हाई कोर्ट से जमानत नहीं

पेपर लीक के खिलाफ नए कानून की जरूरतें और समाधान की खोज

तरुण तेजपाल को 10 साल की सजा: बॉम्बे हाई कोर्ट ने बलात्कार मामले में दोषी ठहराया

दलबदल विरोधी कानून: मनीष तिवारी की मांग, सांसदों के पाला बदलने की प्रथा पर चर्चा जरूरी

ट्रम्प का फिर से वार: जन्म पर्यटन पर새 आदेश, विशेषज्ञ बोले- असंवैधानिक

सुप्रीम कोर्ट ने असहयोग को माना, लखीमपुर खीरी मामले में आशीष मिश्रा की जमानत शर्तों में ढील नहीं दी।
ताज़ा ख़बरें
- पूर्व मंत्री पोनमुडी के खिलाफ हेट स्पीच मामले में गैर-जमानती वारंट जारी
- सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: आसाराम को जमानत नहीं, मिली ये बड़ी राहत
- दिल्ली हाई कोर्ट का सवाल: सुप्रीम कोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद भी क्यों नहीं हुई आरोपी की गिरफ्तारी?
- विधिक शिक्षा के प्रसार के लिए नए कानूनी ढांचे की आवश्यकता
- तरुण तेजपाल को 2013 के बलात्कार मामले में दोषी ठहराने का निर्णय बरी करने के फैसले को पलट गया
- आसाराम को सुप्रीम कोर्ट से जमानत नहीं, लेकिन मिली केयरटेकर रखने की अनुमति
- तरुण तेजपाल मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला: बलात्कार पीड़ितों के प्रति अदालतों की सोच में बदलाव की जरूरत
- गन्ना श्रमिक ठेकेदारों को विनियमित करने वाला महाराष्ट्र कानून छह महीने से लंबित

